भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 548 में से

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पृष्ठ 128

( ९६ ) हारीतसंहिता। [ प्रथमस्थाने- रम् ॥ हृद्यं वर्णकरं रुच्यं रक्तमांसबलप्रदम् ॥ १० ॥ शूलाजीर्ण- विरुद्धेषु मन्दाग्नौकफमारुते॥अरुचौ श्वासकासे च स्वरसोऽस्यो- पदिश्यते ॥११॥ रसोऽतिमधुरो हृद्यो वीर्य्यं पित्तानिलापहम्॥ कफकृद्दुर्जरः पाके मातुलुङ्गकटाहकः ॥ १२ ॥ चेतोहारी पृथ- गति कटुत्वं च धत्तेऽभितोऽयं हृद्रोगानाहगुल्मश्वसनकफकरो ग्रीष्मकालेऽपहन्ता ॥ १३ ॥ वीर्य्यकृच्चार्शहृत्काले स्यात्तथा क्रिमिहन्मतम्॥तिक्तं पुष्पं च बीजं च गुल्मनुत्स्यात्तथापरम् १४ बिजौरा कफको और वातको नाशता है और कृमिरोगको हरता है और पेटके रोगको दूर करता है, दूषित हुए रक्तविकारको और पित्तको दूर करता है अग्निको जगाता है, और शूल- विकारको नाशता है ॥ ६ ॥ और विजौराका फल श्वास, खांसी, अरुचि इनको नाशता है, तृषाको हरता है, कंठको शोधता है, अग्निको जगाता है, हलका है, रुचिमें हित है ॥ ७ ॥ विजौराकी छाल कडुई है, दुर्जर है, खट्टी है और कृमि, वात, कफ इनको नाशती है और बिजौराकी कोंपल स्वादु है, शीतल है, भारी है, चिकनी है, वातको और पित्तको जीतती है ॥ ८ ॥ और बिजौराका गूदा कफको नाशता है, छर्दिको और कफ और अरोचकको नाशता है और बिजौराका केसर अग्निको जगाता है, हलका है, कब्जको करता है, गुल्मको और बवा- सीरको नाशता है॥ ९ ॥ पित्तको और वातको हरता है और केसरसे संयुक्त हुआ बिजौराका फल पित्तको और वातको करता है, सुन्दर है, वर्णको करता है, रुचिमें हित है और रक्त, मांस, बल इनको देता है ॥ १० ॥ और बिजौराका स्वरस शूल, अजीर्ण, मन्दाग्नि, कफ, वात, अरुचि, श्वास, खांसी इनमें उत्तम है ॥ ११ ॥ और बिजौराका रस अति मधुर है, सुन्दर है, वीर्य्यको देता है, पित्तको और वातको नाशता है, कफको करता है और पाकका- लमें दुर्जर है ॥ १२ ॥ और चित्तको हरता है, तिससे पृथक् अति चरचरापनाको धरता है और हृद्रोग, अफारा, गुल्म, श्वास इनको अन्य कालमें करता है और गरमकालमें नाशता है ॥ १३ ॥ बिजौराके फूल और बीज सुन्दर कालमें वीर्य्यको करते हैं बवासीरको दूर करते हैं, कृमिको हरते हैं, कडुवे हैं और गुल्मको नाशते हैं ॥ १४ ॥ अथ निंबूका गुण। निम्बुकं क्रिमिसमूहनाशनं तीक्ष्णमुष्णमुदरग्रहापहम् ॥ वातपि- त्तकफशूलिनां हितं नष्टधान्यरुचिशोधनं परम् ॥ १५ ॥ त्रिदो- षसद्योज्वरपीडितानां दोषाश्रितानां च सवज्जलानाम् ॥ मल- ग्रहे बद्धगुदे हितं च विषूचिकायां मुनयो वदन्ति ॥ १६ ॥ १ " आहतातत्क्षणाकृष्टद्रव्यात्क्षुण्णात् समुद्धरेत् । वस्त्रनिष्पीडितो यः स रसः स्वरस उच्यते" ॥ २ चरणद्वयात्मकस्यास्य श्लोकस्य प्रथमे पादे मन्दाक्रान्ता द्वितीये स्रग्धरेति ।

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