भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 120

( ८८ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- अथ कुलथीका गुण । उष्णो जयेन्मारुतपीनसं तु कासप्रतिश्यायविबन्धगुल्मान् ॥ हिक्कां सरक्तं तु बलाशपित्तं निहन्ति मेदश्च कुलत्थकोऽयम्॥२८॥ कुलथी गर्म है, वात, पीनस, खांसी, खेहर, बंधा, गुल्म, हिचकी इनको नाशती है और लाल कुलथी कफ, पित्त, मेद इनको हरती है ॥ २८ ॥ अथ चौलाका गुण । रूक्षो विशोषी मधुरः प्रदिष्टः स्नायुं करोत्यस्थिगतं बलिष्ठम् ॥ विबन्धशूलभ्रमशोफकर्ता दाहार्शहृद्रोगविकारकारी ॥२९॥ चौला रूखा है, विशेष करके शोषता है, मधुर है, हड्डीके नसको बलवाला बनाता है और शूल, बँधा, भ्रम और शोजा इनको करता है और दाह,हृद्रोग, बवासीर इनको करता है॥२९॥ अथ मटरका गुण । किञ्चित्कषाया मधुराः प्रदिष्टा रक्तप्रशान्तिं जनयन्ति बल्याः॥ किञ्चित्सवातं विनिहन्ति पित्तं कलायका मुद्गसमानरूपाः॥३०॥ मटर कछुक कसैला है, मधुर है,रक्तको शांत करता है,बलमें हित है, वातको और पित्तको कछुक नाशता है, यह मूंगके समान रूपवाला होता है ॥ ३० ॥ अथ मसूरका गुण । रूक्षो विशोषी मधुरः प्रदिष्टः शूलार्त्तिगुल्मग्रहणीविकारान् ॥ करोति वातामयवर्द्धनं च पित्तासृजं ग्राहहरो मसूरः ॥३१॥ मसूर रूखा है,शोषी है,मधुर है और शूल,गुल्म और ग्रहणीदोष इनको करता है,वातरोगको बढ़ाता है, पित्त रक्तको उपजाता है, कब्जको नाशता है ॥ ३१ ॥ अथ धान्यवर्गका उपसंहार । इति प्रदिष्टो बहुधान्यवर्गो ग्रन्थस्य विस्तारभयाच्च किञ्चित् ॥ ये ये प्रसिद्धाःसुतरां हि लोके तेषां गुणाः श्रेष्ठतमाः प्रदिष्टाः ॥३२॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे प्रथमस्थाने धान्यवर्गो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ इस तरह धान्यवर्ग बहुत है किन्तु विस्तारके भयसे जो जो प्रसिद्ध और श्रेष्ठ हैं उन्हींके गुण कहे हैं ॥ ३२ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथम- स्थाने धान्यवर्गो नाम पंचदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥