हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[अ० ८ ] भाषाटीकासमेता । ( ६५ )
बकरीका तक्र हलका चिकना, त्रिदोषको नाशनेमें उत्तम है और गुल्म, बवासीर, संग्रह- णीरोग, शूल, पांडुरोग इन्होंको नाशता है ॥ ५२ ॥ अथ तक्रका वर्णन । तथा च त्रिविधं तक्रं कथ्यते शृणु पुत्रक ॥ यथा योगेन त- त्सम्यक्शस्यते येषु रोगिषु ॥५३॥ समुद्धृतघृतं तक्रमर्द्धोद्धृत- घृतं च यत् ॥ अनुद्धृतघृतं चान्यदित्येतत्त्रिविधं मतम्॥५४॥ सव लघु च पथ्यं च त्रिदोषशमनं परम् ॥ ततः परं वृष्यतरं क्रमेण समुदीरितम् ॥ ५५ ॥ अनुद्धृतघृतं सान्द्रं गुरु विद्या- त्कफात्मकम् ॥ बलप्रदं तु क्षीणानामामाशोफातिसारकृत्॥५६॥ तक्र ३ प्रकारका है, हे पुत्र ! जिस उत्तमयोगसे जिन रोगियोंमें उचित है सो कहता हूँ, सुनो ॥ ५३ ॥ बिना घीका, आधे घीका और पूर्ण इस तरह तीन प्रकारका तक्र कहा गया है ॥ ५४ ॥ घृतसे वर्जित तक्र हलका है, पथ्य है, त्रिदोषको शांत करता है। घृतसहित तक्र वीर्यमें हित कहा है ॥ ५५ ॥ अनुद्धृतघृतसंज्ञक तक्र कठिन है, भारी है, कफकी प्रकृतिवाला है, क्षीणमनुष्योंको बल देता है और आमदोष, शोजा, अतीसार इनको करता है ॥ ५६ ॥ अथ साधारण तक्रके गुण । गरोदराशोग्रहणीपाण्डुरोगे ज्वरातुरे ॥ वर्चोमूत्रग्रहे वापि प्लीह- व्यापद्मेहिषु ॥ ५७ ॥ हितं संप्रीणनं बल्यं पित्तरक्तविरोध- कृत् ॥ मधुरं पित्तरक्तघ्नमत्युष्णं रक्तपित्तकृत् ॥ ५८ ॥ कृत्रिमविष, उदररोग, बवासीर, ग्रहणीदोष, पांडुरोग, ज्वर, दिशापेशाबकी रोकपर, तिल्लीरोग, प्रमेह इन रोगवालोंको ॥ ५७॥ साधारण तक्र हित है, प्रीतिको करता है, बलमें हित है, पित्तरक्तका विरोधी है, मधुर है, पित्तरक्तको नाशता है, अतिगरम है, रक्त और पित्तको करता है॥ ५८ ॥ अथ बहुत पानीवाले तक्रका गुण । बहूदकं दीपनीयं रक्तपित्तप्रकोपनम् ॥ पीनसे श्वासकासे च न शस्तमिह कथ्यते ॥ ५९ ॥ बहुत पानीवाला तक्र अग्निको जगाता है, रक्तपित्तको कुपित करता है और पीनस खांसी, श्वास इन रोगोंमें अच्छा नहीं है ॥ ५९ ॥ अथ विशेषवर्णन । आर्द्धोदकमुदश्वित्स्यात्तक्रं पादजलान्वितम् ॥ वातं कफं हरेद्घोरमुदश्विच्छ्लेष्मलं भवेत् ॥ ६० ॥ ५