भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 136

(१०४) हारीतसंहिता। [प्रथमस्थाने- ग्रामारण्यानिवासिनः ॥ अनूपा जाङ्गला जीवास्तथा साधार- णोऽपरः ॥ २ ॥ मृगरुरुचित्राङ्गास्तथा गण्डश्च वनगवयमहषि- षाः ॥ सूकराद्याश्च येऽपि भवन्ति विविधवर्णा ग्रामवासिनश्च ॥ ३ ॥ ये ये वनगजाद्याश्च ग्रामकाद्याश्च शृङ्गिणः ॥ शूकरच्छिक्कराद्याश्च शूरिणो वा भवन्त्यमी ॥ ४ ॥ शूलवाले, शींगवाले, नखवाले, श्वापद, पक्षी, मच्छ, सर्प ये जो कहे हैं ॥ १ ॥ जलमें विचरनेवाले, जलके आश्रित हुए, ग्राममें बसनेवाले, वनमें बसनेवाले, आनूपदेशमें रहनेवाले, जांगलदेशमें रहनेवाले, सावारणदेशमें रहनेवालें ॥ २ ॥ मृग, लाल हरिण, विलावभेद, गेंडा नीलीगाय, भैंसा, शूकर आदि ये सब अनेक प्रकारके वर्णवाले ग्राममें वसनेवाले हैं ॥ ३ ॥ जो जो वनमें रहनेवाले हस्ती आदि हैं और जो ग्राममें रहनेवाले शींगवाले हैं और शूकर, छिक्कर और शूरी आदि भी ग्रामवासी हैं ॥ ४ ॥ अथ सरीसृपवर्णन । शशकः शल्लकी गोधा मार्जाराद्या नखायुधाः ॥ सर्पमत्स्यादिका ये च ते विज्ञेयाः सरीसृपाः ॥ ५ ॥ शशा, साही, गोह, बिलाव, आदि नखरूपी शस्त्रोंवाले हैं । सर्प और मत्स्य आदि सरी- सृप संज्ञक जानने ॥ ५ ॥ अथ आनूपवर्णन । मत्स्यमंकुरकाद्या ये कच्छपा दुर्जरादयः ॥ हंससारसचक्राद्याः कपिञ्जलकुकूदकाः ॥ ६ ॥ आनूपास्ते च विज्ञेयाः श्लेष्मला वात- कोपनाः ॥ ७ ॥ मत्स्य, मंकुरक आदि कच्छप, दुर्जर आदि और हंस, सारस, चकवा आदि और पपैय्या, पंडेरिआ पक्षी ॥ ६ ॥ ये सब आनूपदेशमें रहनेवाले हैं, कफको करते और बातको कोपते हैं ॥ ७ ॥ अथ जांगलवर्णन । शशलावकवातादा गोधाहरिणकूटकाः ॥ छिक्कराद्यास्तथान्येऽपि तित्तिराद्याश्च कूर्चकाः ॥ ८ ॥ भारद्वाजास्तथा श्येना मूषका वरवारणाः ॥ इत्येता जाङ्गला जीवा ये जलेन विना स्थिताः ॥ ९ ॥