भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० २० ] भाषाटीकासमेता । ( १०३ ) महुआकी मदिरा वातको और पित्तको करती है, रूखी है, कसैली है, सुंदर है, भारी है, कफको करती है, मलको पतला करती है, कब्जको करती है, मूत्रकृच्छ्रको और शिरके रोग- को नाशती है ॥ ११ ॥ अथ ताड़की मदिराका गुण । श्लेष्मदोषकरा वृष्या वातला श्लेष्मवर्द्धिनी ॥ कासहृल्लासविध्वंसकरणा ताडमण्डिका ॥ १२ ॥ ताड़की मदिरा कफको करती है, वीर्य्यमें हित है, वायुको उपजाती है, कफको बढ़ाती है और खाँसीको तथा जीकी मिचलाहट नाशती है ॥ १२ ॥ अथ मदिराकी विशेषता । पूर्णे कषायपित्ते च योगयुक्ता सुरा हिता॥ बहुदोषहरा चैव श्लेष्म- रोगे विशेषतः॥१३॥ श्रमज्वरातुरे शोषे शोफपाण्ड्वामये क्षये ॥ मतेः क्लमेऽपस्मारे च यक्ष्मणां च भ्रमेषु च ॥ १४ ॥ श्रान्ते वा विषपीते वा सर्पदष्टे जलोदरे ॥ रक्तपित्ते तथा श्वासे वारुणी न हिता मता ॥ १५ ॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे मद्यवर्गो नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥१९॥ कषायपनेसे युक्त हुआ पित्त जब पूर्ण हो तब योगसे युक्तकरी मदिरा हित है, यह बहुत दोषोंको हरती है और विशेष करके कफके रोगमें हित है ॥ १३॥ परिश्रम और ज्वरसे पीडित और शोष, शोजा, पांडुरोग, क्षय, बुद्धिकी ग्लानि, मृगीरोग, यक्ष्माआदिसे उपजा श्रम इनसे पीडितको ॥ १४ ॥ थकेको और विष खानेवालेको और सर्पसे डसेको और जलोदर, रक्तपित्त और श्वासरोगसे पीडितको मदिरा हित नहीं है ॥ १५ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥ विंशोऽध्यायः २०. अथ चौपायोंका और दुपायोंका मांसवर्ग । शूलिनः शृङ्गिणश्चैव नखिनोऽन्ये प्रकीर्तिताः ॥ श्वापदाः पक्षि- णश्चान्ये मत्स्याश्चान्याः सरीसृपाः ॥ १ ॥ जलेचरा जलाधारा