हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(१०२) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने अथ मत्स्यंडी मदिराका गुण । हरति मलमियं संदीपनी पाण्डुमेहांल्लघुमधुरसुशीता रोचना पित्तहन्त्री॥जरयति सकलं वा पीतमम्लातिमात्रं श्वसनरुधि- रकासान्हन्ति वा कामलां च ॥ ७ ॥ रावकी मदिरा मलको हटाती है, अग्निको जगाती है, पांडुरोग, प्रमेह इनको हरती है, हलकी है, मधुर है, सुंदर शीतल है, रुचिको करती है, पित्तको हरती है, सब चीजोंको जलाती है, पीनेमें अति खट्टी है और श्वासरोग, रक्त, खांसी, कामला, इनको नाशती है ॥ ७ ॥ अथ माध्वीक मदिराका गुण । माध्वीकं शीतलाम्लं मधुरमपि तथा सत्कषायोष्णकं च ह- न्यात्पित्तामयार्शःश्वसनमपि तथा चातिसारं प्रमेहान् ॥ शूला- नाहोपमर्दं जरयति सकलं दीपयत्यग्निसात्म्यं तस्माद्वातामवातं वमनमपि तथा हन्ति सर्वांश्च रोगान् ॥ ८ ॥ माध्वीक मदिरा शीतल है, खट्टी है, मधुर है, पीनेमें उत्तम है, कसैली है, गरम है और पित्त- रोग, बवासीर, श्वासरोग, अतीसार, प्रमेह, शूल, अफारा और हड़फूटन इनको नाशती है, सब चीजोंको जराती है, अग्निको जगाती है इसलिये वात आमवात और वमन सब प्रकारके रो- गोंको नाशती है ॥ ८ ॥ अथ मदिराका गुण । कषाया मधुरा चाम्ला सुरा संदीपनी मता ॥ कासार्शोग्रहणीस्तन्यमूत्ररोगविनाशिनी ॥ ९ ॥ मदिरा कसैली है, मीठी है, खट्टी है, अग्निको जगाती है और खाँसी, बवासीर, ग्रहणीदोष, दुग्धरोग, मूत्ररोग इनको नाशती है ॥ ९ ॥ अथ पैष्टीमदिराका गुण । पैष्टी संदीपनी रुच्या कफकृद्वातनाशिनी ॥ पित्तला पाण्डुरोगाणां कारिणी बहुधा मता ॥ १० ॥ पैष्टी मदिरा अग्निको जगाती है, रुचिमें हित है, कफको करती है, वातको नाशती है, पित्तको उपजाती है और बहुधा के पांडुरोगोंको करती है ऐसा माना गया है ॥ १० ॥ अथ महुआ वृक्षकी मदिराका गुण । वातपित्तकरो रूक्षः कषायो विशदो गुरुः ॥ श्लेष्मलो भेदनो ग्राही मूत्रकृच्छ्रशिरोऽर्त्तिनुत् ॥ ११ ॥