हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० १९ ] भाषाटीकासमेता । ( १०१ ) एकोनविंशोऽध्यायः १९. अथ मद्यवर्ग । गौडी माध्वी तथा पैष्टी निर्यासा कथितापरा ॥ इति चतुर्विधा ज्ञेयाः सुरास्तासां प्रभेदकाः ॥१॥ भेदेन द्वादश प्रोक्ताः सुराः सौवीरकारसैः ॥ सीधुर्गौडी च मत्स्यण्डी गुडेन प्रभवास्त्रयः ॥२॥ माध्वीकं मधुकं माध्वं मधुना संयुताः सुराः ॥ पैष्टीष्व- रिष्टजातं तु तण्डुलप्रभवास्त्रयः ॥३॥ मृद्वीकारससम्भूता ताडमा- डरसोद्भवा॥ निर्यासा सा तु विज्ञेया तासां वच्मि गुणागुणम्४॥ गौडी, माध्वी, पैष्टी, निर्यासा, इन भेदोंसे मदिरा ४ प्रकारकी है उनके भेद ॥ १ ॥ बारह १२ कहे हैं। सीधु, गौडी, मत्स्यंडी ये तीन मदिरा गुड़से बनती हैं ॥ २ ॥ माध्वीक, मधुक, माध्व, ये तीन मदिरा शहदसे बनती हैं। पैष्टी, अरिष्ट, जात ये तीन मदिरा चाव- लोंसे बनती हैं ॥ ३ ॥ और मृद्वीका द्राक्षाके रससे बनती है, ताड़ मदिरा ताड़के रससे बनती है, और माड़ वृक्षके रससे भी मदिरा बनती है, वही निर्यास मदिरा जाननी । उनके गुण और दोषोंको कहता हूं ॥ ४ ॥ अथ सीधुमदिराका गुण । सीधुः कषायाम्लकमाधुरो वा सन्दीपनी मेदमलापमर्दः ॥ आमातिसारानिलपित्तशूलश्लेष्मामयार्शोग्रहणीगदघ्नः ॥ ५ ॥ सीधु मदिरा कसैली है, खट्टी है, कोई कोई मीठी होती है अग्निको जगाती है, मेदको और मलको नाशती है और आमातीसार, वात, पित्त, शूल, कफका रोग, बवासीर, ग्रहणीदोष इनको नाशती है ॥ ५ ॥ अथ गौडी मदिराका गुण । गौडी कषाया मधुराम्लशीता सन्दीपनी शूलमलापहन्त्री ॥ हृद्या त्रिदोषं शमयत्यजीर्णं पाण्ड्वामयार्शःश्वसनं निहन्ति॥६॥ गौडी मदिरा कसैली है, मधुर है, खट्टी है, शीतल है, अग्निको जगाती है, शूलको और अफाराको हरती है, सुंदर है और त्रिदोष, अजीर्ण, पांडुरोग, बवासीर, श्वास रोग इनको शांत, करती है ॥ ६ ॥ १ ( ताडमाडरसोद्भवा ) ताडनामक-वृक्षरससंभूता तथा माडनामक वृक्ष्ररसतो जाता अपि मदिरा माड- नामको वृक्षः कोंकणदेशे प्रसिद्धः । इति औषधकोशः ।