भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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( १०० ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-

नाशं कुरुते च पुष्टिं कासक्षये वा क्षतजे च छर्दों ॥ हिक्काभ्रमे शोषणपीनसानां रक्तप्रमेहे सरलातिसारे ॥३॥ रक्तातिसारे च सपित्तरक्ते तृणमोहहत्पार्श्वगदेऽपि शस्तः ॥ नेत्रामये वा ग्रहणी- गदे वा विषे प्रशस्तं भ्रमरैश्चितं यत्॥४॥ आमरं सघनं जाड्यं भूयिष्ठं मधुरं च यत् ॥ शहद शीतल है, कसैला है, मधुर है, हल्का है, अग्निको जगाता है, स्वादु है, सुन्दर शोधता है, घावको शुद्ध करता है, घावपे अंकुरको लाता है, हृदयको परमहित है, बलमें हित है ॥ २ ॥ त्रिदोषको नाशता है, पुष्टिको करता है, खांसीमें, क्षयमें, छातीके फटनेमें, छर्दीमें और हिचकी, श्रम, शोष, पीनस, रक्तप्रमेह, सीधे अतीसार इनमें हित है ॥ ३ ॥ और रक्तातिसार, पित्तरक्त, तृषा, मोह, हृद्रोग, और पसलीरोग इनमें श्रेष्ठ है, आमर शहद नेत्ररोगमें अथवा संग्रहणीमें और विषमें हित है॥४॥ यह भ्रामर शहद बहुत गाढ़ा और भारी होता है तथा अतिमधुर होता है । अथ शहदकी विशेषता । क्षौद्रं विशेषतो ज्ञेयं शीतलं लघु लेहनम् ॥ ५ ॥ तस्माल्लघुतरं रूक्षं सारघं नातिशीतलम्॥कासे क्षये प्रशस्तं स्यात्कामलार्शो- विनाशनम् ॥६॥ नातिशीतं न च रूक्षं दीपनं बलकृन्मतम् ॥ अतीसारे नेत्ररोगे क्षते वा क्षतजे हितम् ॥ ७ ॥ आमरं वृक्षसं- स्थाने विटपे सारघं भवेत्॥रन्ध्रे तु कोटरे वापि क्षौद्रं तत्र प्रश- स्यते ॥८॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे मधुवर्गो नाम अ- ष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ और क्षौद्रसंज्ञक शहद विशेषपनेसे शीतल है, हल्का है, स्वादु है॥५॥इससे भी अति हलका सारघ शहद है, यह रूखा है, अति शीतल नहीं है, खांसीमें और क्षयमें अतिश्रेष्ठ है, कामलाको और बवासीरको नाशता है॥६॥क्षौद्र शहद अतिशीतल नहीं है, रूखा भी नहीं है, अग्निको जगाता है, बलको करता है और अतीसार, नेत्ररोग, घाव, क्षतसे उपजारोग इनमें हित है॥७॥वृक्षपे आमर शहद होता है, तृणके गुच्छेमें सारघ शहद होता है, वृक्षके छिद्रमें अथवा कोटरमें क्षौद्र शहद होता है, सो अच्छा होता है॥८॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविन्दत्तशास्त्र्यनुवादिताहा- रीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने मधुवर्गो नाम अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥