भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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शींगवालोंमें हरिण श्रेष्ठ है, बलमें हित है, रुचिको देता है, अग्निको जगाता है, त्रिदोषको हरता है, हलका है, पाककालमें मधुर है, ज्वरवालोंको हित है ॥ १७ ॥ अथ कृष्णमृगके मांसका गुण । क्षते क्षयार्शसोः पाण्ड्वावरोचकनिपीडिते ॥ कासश्वासातुराणां च एणमांसं सुखावहम् ॥ १८ ॥ छातीका फटजाना, क्षय, बवासीर, पांडु, अरुची, खाँसी और श्वास इनसे पीडित रोगि- योंको कृष्णमृगका मांस हित है ॥ १८ ॥ अथ चित्रांगके मांसका गुण । चित्राङ्गो वातशमनो बृंहणो बलकृन्मतः ॥ श्लेष्मलः कथितो वापि दुर्जरो मेदवर्द्धनः ॥ १९ ॥ चित्तलका मांस वातको शांत करता है, धातुओंको पुष्ट करता है, बलको बढ़ाता है, कफको करता है, दुर्जर है और मेदको बढ़ाता है ॥ १९ ॥ अथ छिक्करके मांसका गुण । छिक्करो लघु वृही च मधुरो दोषनाशनः ॥ तुल्यो हरिणमांसस्य ज्वरेष्वपि प्रशस्यते ॥ २० ॥ छिकरका मांस हलका है, धातुओंको पुष्ट करता है, मधुर है, दोषको नाशता है, मृगके मांसके समान है और ज्वरमें भी श्रेष्ठ है ॥ २०॥ अथ रक्तमृगके मांसका गुण । रोहितो बृंहणश्चैव विबन्धी दुर्जरो घनः ॥ ज्वरिणां विषमाग्नीनामतीसारेण त्रासयते ॥ २१ ॥ रक्त मृगका मांस धातुओंको बढ़ाता है, विशेष करके कब्ज करता है, दुर्जर है, कठिन है और ज्वर, विषमज्वर, अग्नि, इन रोगवालोंको अतीसार करके त्रासित करता है ॥ २१ ॥ अथ गेंडा, रोझ, भैंसा, ऊट, घोड़ा इनके मांसोंके गुण । तथैव गण्डगवय महिषोष्ट्रतुरङ्गमाः ॥ विबन्धिगुरवः स्निग्धा वातालस्ये प्रकीर्त्तिताः ॥ २२ ॥ गेंडा, नीलीगाय, भैंसा, ऊंट, घोड़ा इन पाँचोंके मांस विशेष करके कब्ज करते हैं, भारी हैं चिकने हैं, वातमें और आलस्यमें हित हैं ॥ २२ ॥