भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 139

अ० २० ] भाषाटीकासमेत। ( १०७ ) अथ शूकरके मांसका गुण । वातघ्नं रोचनं वृष्यं दुर्जरं श्रमनाशनम्॥ सौकरं पित्तशमनं रुचिदं धातुवर्द्धनम् ॥ २३ ॥ सुअरका मांस वातको नाशता है,रुचिमें हित है, वीर्यमें हित है, दुर्जर है, परिश्रमको नाश- ता है, पित्तको शांत करता है, कांतिको देता है,धातुओंकों बढ़ाता है, ॥ २३ ॥ अथ शशाके मांसका गुण । शशको जाङ्गलश्रेष्ठो लघुर्वृष्यश्च दीपनः॥रुचिकृत्तर्पणो बल्य- स्त्रिदोषशमनो मतः ॥ २४ ॥ ज्वरे च पाण्डुरोगे च क्षये कासे गुदामये॥राजयक्ष्मणि पाण्डौ च तथातीसारिणां हितः॥२५॥ शशाका मांस जांगलजीवोंके मांसोंमें श्रेष्ठ है, हलका है, वीर्यमें हित है, अग्निको जगाता है, रुचिको करता है, तृप्तिको करता है, बलमें हित है और त्रिदोषको शांत करता है ॥ २४ ॥ और ज्वर, पांडुरोग, क्षय, खांसी बवासीर, राजरोग, पांडुरोग, अतीसार, इन रोगवालोंको हित है ॥ २५ ॥ अथ साहीके मांसका गुण । शल्लकी बृंहणो बल्यः स्निग्धो वष्यो रुचिप्रदः ॥ वातश्लेष्महरो हृद्यो मधुरो धातुवर्द्धनः ॥२६ ॥ साहीका मांस धातुओंको पुष्ट करता है, वीर्यमें हित है, बलको करता है, चिकना है, रुचिको देता है, वातको और कफको हरता है, सुन्दर है, मधुर है और धातुओंको बढ़ाता है ॥२६॥ अथ गोह सरीखे शल्यकनामवाले जीवके मांसका गुण शल्यको बृंहणो बल्यःस्निग्धो वृष्यो रुचिप्रदः ॥ वातलः किञ्चिद्धातूनां वर्द्धनो मधुरो घनः॥ २७ ॥ गोह सरीखे जीवका मांस धातुओंको पुष्ट करता है, बलमें हित है, चिकना है, वीर्यमें हित है,रुचिको देता है, वातको करता है, धातुओंको कुछ बढ़ाता है, मधुर है और कठिन है ॥ २७ ॥ अथ गोहके मांसका गुण । रक्तपित्तहरा वृष्या स्निग्धा मधुरशीतला ॥ श्वासकासहरा प्रोक्ता गोधा चार्शोहिता बला॥२८॥ गोहका मांस रक्तपित्तको हरता है, वीर्यमें हित है, चिकना है,मधुर है, शीतल है, श्वासको और खांसीको हरता है और बवासीरमें हित है बलप्रद है ॥ २८ ॥