भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 140

( १०८ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- अथ मूषाके मांसका गुण । स्निग्धो बलकरः शुक्रवर्द्धनो मधुरो लघुः॥ दुर्नामकृमिदोषघ्नो वातहारी च मूषकः ॥ २९ ॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे चतुष्पदानां मांसवर्गो नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥ मूसेका मांस चिकना है, बलको करता है, वीर्य्यको बढ़ाता है, मधुर है, हलका है और बवासीरको और कृमिदोषको हरता है और वातको भी नाशता है ॥ २९ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने मांसवर्गो नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥ एकविंशोऽध्यायः २१. ───❧~☙─── अथ स्थलमें विचरनेवाले जीवोंका मांसवर्ग । ( प्रथम लावापक्षीके मांसका गुण ) पक्षिणां च महाश्रेष्ठो लावको जाङ्गलात्मजः ॥ संग्राही दीपनः प्रोक्तः कषायो मधुरो लघुः ॥ १ ॥ तथा विपाके मधुरः सन्नि- पातेऽतिपूजितः ॥ २ ॥ जांगलदेशमें विचरनेवाले लावापक्षीका मांस अन्य पक्षियोंके मांससे श्रेष्ठ है । यह कब्जको करता है, अग्निको जगाता है, कसैला है, मधुर है और हलका है ॥ १ ॥ और पाककालमें मधुर है और सन्निपातमें अतिपूजित है ॥ २ ॥ अथ तीतरके मांसका गुण । तथैव तित्तिरो वृष्यो मेधाग्निबलवर्द्धनः॥सर्वदोषहरो बल्यो ब- लाका समता गुणैः ॥३॥वार्त्ताको विशदो वृष्यो यथा लावस्त- थैव च ॥ कृष्णगौरप्रभेदाश्च श्रेष्ठो गौरश्च तित्तिरः॥४॥ तृती- यतित्तिरोऽन्योऽपि सामान्यो गुणलक्षणैः॥सवातलोऽतिबलकृ- द्धनः किञ्चिद्रसायनः ॥ ५ ॥ तीतरका मांस वीर्य्यमें हित है और बुद्धि, अग्नि, और बल, इनको बढ़ाता है, सब दोषोंको हरता है, बलमें हित है और बगलाके मांसके समान गुणोंवाला है ॥ ३ ॥ वार्त्ताकसंज्ञक तीतरका मांस सुन्दर है, वीर्य्यमें हित है और लावाके मांसके समान गुणोंवाला है, कृष्ण और