भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 146

( ११४ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-

अथ भातका गुण । अप्रसाधितभक्तो युगन्धराणां भक्तश्च घनो विशदमधुरश्च ॥ कफे त्रिदोषशमनश्च कथ्यते कासश्च श्वासात्मक एव स स्मृतः॥३॥ नहीं साधित किया ऐसा युगन्धर चावलोंका भात कठिन है, सुन्दर है, मधुर है, कफमें हित है, त्रिदोषको नाशता है, खांसीको और श्वासरोगको हरता है ॥ ३ ॥ अथ यवागूका गुण । सन्दीपनो स्वेदकरा यवागूः सम्पाचनी दोषमलामयानाम् ॥ सन्तर्पणी धातुबलेन्द्रियाणां शस्ता भवेत्स्याज्ज्वररोगिणां च॥४॥ यवागू पसीनाको लाती है, अग्निको जगाती है, दोष, मल और रोग इनको पकाती है और धातु, बल और इन्द्रियोंको तृप्त करती है और ज्वररोगवालोंको श्रेष्ठ है ॥ ४ ॥ अथ यवागूका लक्षण । भागैकञ्च भवेद्द्रव्यं द्विभागन जलं क्षिपेत् ॥ चित्रकं पिप्पली- मूलं पिप्पलीचव्यनागरम् ॥५॥ धान्यकस्य समांशानि पिष्ट्वा श्वेतांश्च तण्डुलान्॥संशुद्धा शिथिला किञ्चित् सा यवागूर्निग- द्यते ॥ ६ ॥ यवागूमुपभुञ्जानो जनो नारुचिमाचरेत्॥ शाक- माषफलैर्युक्ता यवागूः स्याच्च दुर्जरा ॥ ७ ॥ एक भाग द्रव्य और दो भाग पानी मिलावे और चीता, पीपलामूल, पीपल, चव्य, सोंठ ॥ ५ ॥ धनियां ये सब समभाग लेने, सफेद और दूसरे रंगके चावल इन सबोंको पीस मिलाके पकावे कुछ पतली रहे तिसको यवागू कहते हैं ॥ ६ ॥ यवागूका भोजन करता हुआ मनुष्य अरुचिको नहीं प्राप्त होता और शाक, उड़द, फलसे युक्त यवागू दुर्जर होती है ॥ ७ ॥ अथ मंडका गुण । पञ्चकोलैकधान्याकैर्युक्तो रास्नान्वितः पुनः ॥ मण्डस्त्रिदोषशमनो ज्वराणां पाचनः परः॥ ८ ॥ पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीता, सोंठ, धनिया, रायसनसे युक्त किया मंड त्रिदोषको नाशता है और ज्वरोंको पकाता है ॥ ८ ॥ अथ खीरका गुण । पायसं गुरु विष्टम्भजननं श्लेष्मवातलम् ॥ पित्तसंशमनं बल्यं वृष्यं श्रेष्ठं रसायनम् ॥ ९॥ खीर भारी है, विष्टंभको करती है, कफ और वातको करती है, पित्तको शांत करती है, बलमें और वीर्यमें हित है, श्रेष्ठ है और रसायन है ॥ ९ ॥


१ “पिप्पली चव्य विश्वाह्वा पिप्पलीमूलचित्रकैः। पञ्चकोलमिति ख्यातं सद्यो दीपनपाचनम्”॥ शार्ङ्गधरे ।