हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 145, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंमण्डूकादिसरीसृपादिगणा येऽन्ये मता ईदृशस्ते भक्ष्या न शुभावहा ननु नृणां वर्ज्या भिषग्भिर्बुधैः ॥ ९ ॥ गृहचटकच- कोराः काकजात्याः खगाश्च पिकशुकमघशारीभृङ्गदात्यूहमा- ङ्गाः ॥ जलकरंटकपोताः पोटकीखअरीटाः कुकुरमघमलिङ्गन यूकपिङ्गादयश्च ॥ १० ॥ एते भक्ष्या नैव भक्ष्या नचेष्टा ये चान्येऽप्यज्ञातनामाण्डजाश्च ॥ अन्ये चापि श्वापदा ये च निंद्यास्ते खाद्ये वै वर्जिताश्चात्र सर्वे ॥११॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे मांसवर्गो नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥ काक, बाज, शिकरा, सारस, तोता, यूक, कलिङ्ग और बक पक्षी तथा रीछ, ऊंट, सूकर, बैल, भेडिया और गर्दभ तथा मण्डूक आदि सरीसृप जीवोंका समूह तथा और भी जो इन्हींकी भांति माने गयेहैं वे सब भक्ष्य मनुष्योंका कल्याण करनेवाले नहीं इसी लिये पंडित वैद्योंको अवश्य इनका त्याग करना चाहिये ॥ ९ ॥ घरमें रहनेवाली चिड़िया, चकोर, काककी जातिके पक्षी, शिकराकी जातिके पक्षी, कोयल, तोताकी जातिके पक्षी, मघा, शारी, भंवरा, करढौकपक्षी, मांग, शंखका जीव, कबूतर, पोटकी, खंजना कुत्ता, मघ, मलिंग, जूम, पिंगापक्षी ॥१०॥ इनके मांस खानेके योग्य नहीं हैं और श्रेष्ठ भी नहीं हैं तथा जो जो हिंसक तथा निंदित जीव हैं उनके भी मांस वर्जने चाहिये॥ ११ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवा- दितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने मांसवर्गो नाम द्वाविंशोध्यायः ॥ २२ ॥ त्रयोविंशोऽध्यायः २३. ———————— अथ अन्नपानवर्ग । प्रथम मँडका गुण । मण्डः परिस्रवो भक्तस्तर्पणो वातनाशनः ॥ मूत्रमेहसमीरघ्नो रुचिकृन्मूत्रलो मतः ॥ १ ॥ आशुमण्डो भवेद्ग्राही मधुरो वा कफात्मकः ॥ तर्पणः क्षयदोषघ्नः शुक्रवृद्धिकरः परः ॥ २ ॥ मण्ड झरनेवाला है, खानेयोग्य हैं तृप्तिको करता है, वातको नाशता है, मूत्र, मेह और वातको नाशता है, रुचिको करता है और मूत्रको उपजाता है ॥१॥ शीघ्र किया मण्ड कब्जको करता है, मधुर है, कफकी प्रकृतिवाला है, तृप्तिको करता है, क्षय दोषको नाशता है और वीर्यको बढ़ाता है २ ८