हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ११६ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- संडाकी भारी है, चिकनी है, दुर्जर है, अति शीतल है, पित्तको और कफको करती है, बलमें हित है और धातुओंके बलको देती है ॥ १७ ॥ अथ उड़द आदिके बड़ोंका गुण । दुर्जरा मधुरा रुच्या वटिका माषकादिभिः ॥ १८ ॥ उड़द आदिके बड़े दुर्जर हैं, मधुर हैं, रुचिमें हित हैं ॥ १८ ॥ अथ शिखरनका गुण । गुडदधिप्रमुदिता हिता शिखरिणी नृणाम् ॥ धातुवृद्धिकरा वृष्या वातपित्तविनाशिनी ॥ १९ ॥ गुड़ और दहीसे बनी हुई शिखरन मनुष्योंको हित है, धातुओंको बढ़ाती है, वीर्यमें हित है, वातको और पित्तको नाशती है ॥ १९ ॥ अथ घृतयुक्त दहीके पतले शिखरनके गुण । शीतलः पित्तशमनो भ्रममूर्च्छातृषापहः ॥ खण्डेन संयुक्तः श्रेष्ठो घृतयुक्तो जलाधिकः॥ २० ॥ यह शीतल है, पित्तको शांत करता है और भ्रम, मूर्च्छा, तृषाको नाशता है, खांड तथा घृतसे संयुक्त और पानीकी अधिकतासे संयुक्त ऐसा शिखरन श्रेष्ठ है ॥ २० ॥ अथ मन्थका लक्षण और गुण । सक्तवः सर्पिषाभ्यक्ताः शीतवारिपरिप्लुताः॥ नातिद्रवा नाति- सान्द्रा मन्थ इत्यभिधीयते॥२१॥ मन्थः सद्यो बलच्छर्दिपि- पासादाहनाशनः॥साम्लस्नेहश्च सगुडो मूत्रकृच्छ्रस्य साधनः२२ घृतमें भुने हुए सत्तूओमें पानी मिलाके ऐसा बनावे जो न अति पतला और न अति कठिन हो तिसको मन्थ कहते हैं ॥२१॥ तत्कालका बनाया मन्थ बल, छर्दि, पिपासा और दाहको नाशता है, तेल, खटाई और गुड़युक्त मन्थ मूत्रकृच्छ्रको साधता है ॥ २२ ॥ अथ सिद्धमांसका गुण । सिद्धं मांसं वेसवारेण युक्तं बाल्यं श्रेष्ठं स्वादु संदीपनं च ॥ त्रिदोषशमनं गुरु लवणस्नेहयुक्तं दुर्जरं दीपनं स्मृतम् ॥ २३ ॥ सिद्ध किया और वेसवारसंज्ञक मसालासे संयुक्त किया मांस बलमें हित है, श्रेष्ठ है, स्वादु है, अग्निको जगाता है, त्रिदोषको शांत करता है, भारी है, नमक और स्नेहसे संयुक्त किया मांस दुर्जर है और अग्निको जगाता है ॥ २३ ॥ १ आर्षत्वेनात्र छंदोभङ्गत्वदोषो नास्ति ।