भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० २३] भाषाटीकासमेता । (११७) अथ मांसकी श्रेष्ठता । नहि मांससमं किञ्चिदन्यद्देहमहत्त्वकृत् ॥ मांसादमांसं मांसेन संभृतत्वाद्विशिष्यते ॥ २४ ॥ शरीरके बढानेके वास्ते मांससरीखा दूसरा कोई पदार्थ नहीं है, उस मांसमें भी जो प्राणी मांस खाते हैं उन प्राणियोंका मांस मांससे भरा रहता है, इसलिये वह बहुत अच्छा होता है ॥ २४ ॥ अथ भूंजेहुए मांसका गुण । अङ्गारैः परिपक्वं च दीपनं श्लेष्मनाशनम्॥ बल्यं च स्नेहसंयुक्तं घनं घनगुणात्मकम् ॥ २५ ॥ शूल आदिके द्वारा अंगारोंसे पकाया मांस दीपन है, कफनाशक है, बलमें हित है, स्नेह- युक्त रहता है कड़ा है, और कड़े गुणवाला है ॥ २५ ॥ अथ मंडका गुण । अत्युष्णं मण्डकं पथ्यं लघु चैव यथोत्तरम् ॥ त्रिकशूलपार्श्वशू- लपरिणामापहं तथा॥तृष्णामारुतछर्द्दिघ्नमामाशयकरं तथा॥२६॥ मंड अति गर्म है, पथ्य है और हलका है, यह त्रिकशूल, पसलीशूल, परिणामशूलको नाशता है, तृष्णा, वायु, छर्दि इनको नाशता है, आमको बढ़ाता है ॥ २६ ॥ अथ मांडका गुण । तप्तकर्परपक्वा या रोचनी मधुरा घना ॥ कफवृद्धिकरी बल्या पित्तरक्तप्रदायिनी ॥ २७ ॥ तप्त किये तवेपर पकाया मांडा रुचिको करता है, मधुर है, कठिन है, कफको बढ़ाता है, बलमें हित है, पित्त और रक्तको देता है ॥ २७ ॥ अथ पूरी और घेवरका गुण । पूरिका घृतपूरन्तु त्रिदोषशमनं परम् ॥ वृष्यं संबृंहणं स्वादु क्षतक्षयनिवारणम् ॥ २८ ॥ पूरी और घेवर त्रिदोषको शांत करता है, वीर्यमें हित है, धातुओंको पुष्ट करता है, स्वादु है, क्षत और क्षयको नाशता है ॥ २८ ॥ अथ मालपुवाका गुण । गुरूष्णो दुर्जरो ज्ञेयो वातश्लेष्मकरो गुरुः ॥ पूपकः श्लेष्मको हृद्यो वृष्यो वातानुलोमकः ॥ २९ ॥ १ मांसमत्ति भक्षयति असौ मांसादः तस्य मांसमिति मांसभक्षकस्य मांसम् ।