हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ११८ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- मालपुआ भारी है, दुर्जर है, वातकफको करता है और कफको करता है, सुंदर है, वीर्यमें हित है, वातको अनुलोम करता है ॥ २९ ॥ अथ सोमालिकाका गुण । सोमालिका घना स्वादू रोचनी बलवर्द्धनी ॥ दुर्जरा दोषशमनी वृष्यानुकरणी मता ॥ ३० ॥ सोमालिका (पक्वान्न) कठिन है, स्वादु है, रुचिको उपजाती है, बलको बढ़ाती है, दुर्जर है, दोषको शांत करती है और वीर्यमें हित है ॥ ३० ॥ अथ फेनिका गुण । बृंहणी वातपित्तघ्नी पथ्या लघुतरा मता ॥ फेनिका रोचनी बल्या सर्वधातुबलप्रदा ॥ ३१ ॥ फेनी बल बढाती है, वात पित्तको शांत करती है, पथ्य है, बहुत हलकी है, रुचिको उप- जाती है, बलमें हित है और सब धातुओंमें बलको देती है ॥ ३१ ॥ अथ भिन्न वड़ाका गुण । विष्टम्भी मधुरो हृद्यो घनो वातकफात्मकः ॥ ससिक्तो वा त्रिदोषघ्नो दुर्जरो जायते पुनः ॥ ३२ ॥ भिन्न किया बड़ा विष्टंभको करता है, मधुर है, सुंदर है, कठिन है,वातकी और कफकी प्रकृ- तिवाला है, सेचित किया बड़ा त्रिदोषको नाशता है, फिर दुर्जर हो जाता है ॥ ३२ ॥ अथ अभिन्न वड़ाका गुण । अभिन्नो दुर्जरो बल्यो घनतृष्णाप्रदः स्मृतः ॥ तीक्ष्णो विपाके विष्टम्भी दुर्जरो जायते पुनः ॥ ३३ ॥ नहीं भिन्न किया बड़ा दुर्जर है, बलमें हित है, अधिक तृषाको देता है, तेज है, पाककालमें विष्टंभी है, फिर दुर्जर हो जाता है ॥ ३३ ॥ अथ लड्डूकां गुण । कटुकास्तर्पणा बल्या दुजराः शोषकारकाः॥ मन्दाग्नौ न प्रश- स्यन्ते मोदका बहुवर्णकाः ॥ द्रव्यं गुणविशेषेण सारस्वादेन वा पुनः॥ ३४ ॥ लड्डू चर्चरे हैं, तृप्तिको करते हैं,बलमें हित हैं,दुर्जन हैं,शोषको करते हैं और मन्दाग्निमें हित नहीं हैं, बहुत वर्णवाले हैं, अथवा द्रव्यका गुणविशेष करके व सारस्वाद करके लड्डू कहे हैं ३४