भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० २३] भाषाटीकासमेता । (११९) अथ यवपोलिकाका गुण । पोलिका कथिता बल्या कफदोषकरी मता ॥ वृष्या वीर्य्यप्रदा ज्ञेया दोषला वीर्य्यवर्द्धिनी ॥ ३५ ॥ विदलान्नस्य या पर्णा सिद्धा कर्परकेण तु ॥ रुच्या वान्नविशेषेण दोषान् सर्वान् विभावयेत् ॥ ३६ ॥ जवोंकी पोली बलमें हित है, कफदोषको करती है, वीर्यमें हित है, वीर्यको देती है, दोषोंको उपजाती है और वीर्य्यको बढ़ाती है ॥ ३५ ॥ और तंदूरपर पकायी हुई रोटी रुचिमें हितहै, ऐसे ही अन्नके दोषके अनुसार सब पदार्थोंको विचारे ॥ ३६ ॥ अथ अन्नके गुणोंका उपसंहार । अन्यानि चान्नपानानि नैवोक्तानि महामते ॥ ग्रन्थविस्तारभीरुश्च लोको वक्तुं न च क्षमः ॥ ३७ ॥ हे महामते ! अन्य अन्न और पान नहीं कहे हैं, क्योंकि ग्रन्थके बढ़ जानेसे संसारके लोक विचारनेको समर्थ नहीं हो सकेंगे ॥ ३७ ॥ अथ थके हुए मनुष्यका भोजननिषेध । श्रमात्तु भोजनं यस्तु पानं वा कुरुते नरः ॥ ज्वरः संजायते तस्य छर्दिर्वा तत्क्षणाद्भवत् ॥ ३८ ॥ जो मनुष्य परिश्रम करके शीघ्र भोजनको अथवा पानको करता है, उसके शीघ्र ही ज्वर अथवा छर्दि उपजती है ॥ ३८ ॥ अथ भोजनके उपरांत मेहनत और सुरतका निषेध । कृत्वा तु भोजनं सद्यो व्यायामं सुरतं तथा ॥ यः करोति विपत्तिः स्यात्तस्य गात्रस्य निश्चितम्॥ ३९॥ जो मनुष्य भोजनको करके तत्काल कसरतको अथवा मैथुनको करता है उसके शरीरमें निश्चय दुःख हो जाता है ॥ ३९ ॥ अथ ठंडा और गरम भोजनका निषेध । न चातिशीतं भुञ्जीत नात्युष्णं भोजने हितम् ॥ कुर्य्याद्वातकफौ शीतमुष्णं भवति सारकम् ॥ ४० ॥ अतिशीतल पदार्थको खावे नहीं और अति गरम भोजन भी हित नहीं है, क्योंकि शीतल भोजन वातको और कफको करता है, गरम भोजन दस्तावर है ॥ ४० ॥ श्रमित आदिकोंके भोजनका निषेध । न श्रान्तो भोजनं कुर्य्यान्न व्यायामसमाकुलः ॥ विषमासने न भोक्तव्यं करोति विविधान्गदान् ॥ ४१ ॥