हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १२० ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- परिश्रमसे थका हुआ और कसरतसे थका हुआ मनुष्य भोजनको करे नहीं और विषम आसनपर बैठके भोजनको करे नहीं ये अनेक प्रकारके रोगोंको करते हैं ॥ ४१ ॥ भोजनमें फलादिकोंका नियम। आदौ फलानि भुञ्जीत वर्जयित्वा तु कर्कटीम् ॥ न नक्तं दधि भुञ्जीत भोजनाद्धे न धावनम् ॥४२ ॥ काकडीके बिना सब फलोंको आदिमें खावे रात्रिमें दहीको नहीं खावे और भोजनके बीचमें उठकर नहीं भागे ( अर्थात् आधा भोजन करके उठना फिरना फिर भोजन करना उचित नहीं ) ॥ ४२ ॥ भोजनके पीछे बैठनेका नियम । भोक्तोपविशति स्थौल्यं बलमुत्तानशायिनः ॥ आयुर्वामकटिस्थितस्य मृत्युर्धावति धावतः ॥ ४३ ॥ जो भोजनको करके बैठता है वह स्थूलपनेको प्राप्त हो जाता है और भोजन करके सीधा शयन करनेवालेका बल बढ़ता है, भोजन करके बायें करवट शयन करनेसे आयु बढता है और भोजन करके दौड़नेसे मृत्यु दौड़ती है ॥ ४३ ॥ भोजनमें पानीका नियम । नचादौ सलिलं पेयं भोजने पानमाचरेत्॥अर्द्धाहारेण भुञ्जीत तृ- तीयं व्यञ्जनेन तु॥४४॥चतुर्थं तोयपानेन पूर्णाहारःसुजायते॥४५॥ भोजनके आदिमें पानीको नहीं पीवे भोजन करते हुए पानीको पीवे दो भागके कोष्ठको भोजनसे पूरित करे और तीसरे भागको व्यंजनसे पूरित करे ॥ ४४ ॥ और चौथे भागको पानीसे पूरित करे ऐसे पूर्ण भोजन होता है ॥ ४५ ॥ भोजनके ऊपर व्यायाम । भोजनोध्वं चंक्रमेत शतपादं शनैः शनैः ॥ पश्चादुत्तानशयनं ततो वामे क्षणं स्वपेत् ॥ ४६ ॥ और भोजन करके सौ १०० पैर हौले हौले चले, पीछे सीधा शयन कर पीछे बायें करवट दो घडी शयन करे ॥ ४६ ॥ अथ भोजनके उपरांत नेत्रादिकोंका मार्जन। भुक्त्वोपरि समाचम्य मार्जयेद्दक्षिणाकरैः ॥ पुनर्दक्षिणहस्तेन मार्जयेदुदरं सुधीः ॥ ४७ ॥ भोजन करके पीछे आचमन ले, दाहिने हाथसे मुखको शुद्ध कर पीछे दाहिने हाथ करके बुद्धिमान् पेटको शोधित करे ॥ ४७ ॥