हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 155, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १ ] भाषाटीकासमेता । ( १२३ )
नृणां स्युः ॥९॥ ज्वरो जीर्णं तथा छर्दिभ्रममोहाग्निमान्द्यताः॥ यकृत्प्लीहार्शःशोषाश्च एते चैवोपदूषकाः ॥ १० ॥ व्रणं शूलं शिरःशूलं रक्तपित्तं तथोर्द्धगम्॥एते रोगा महाप्राज्ञ अभिशा- पाद्भवन्ति हि ॥११॥ अन्येऽपि बहुधा रोगा जायन्ते दोषस- म्भवाः ॥ अतो वक्ष्य समासेन शृणु त्वं च महामते ॥१२ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-शरीरधारियोंके कर्मसे उपजनेवाली सब व्याधियां हैं और सब दुःखरूप हैं साध्य और असाध्य होती हैं ॥५॥ बिना जाने जो किये हुए पापके पीछे कृच्छ्र चांद्रायण करे, क्योंकि प्रायश्चित्तके बलसे वह पाप साध्य हो जाता है॥६॥जानके पाप करनेके पीछे कृच्छ्रचांद्रायण करनेसे कष्टसाध्य रोग हो जाता है ॥ ७ ॥ ब्राह्मणको मारनेवाला, गायको मारनेवाला, राजाको मारनेवाला और बाग तथा जलके स्थानको नाशनेवाला और पराई स्त्रीको अपनी स्त्री बनानेवाला और स्वामीकी भार्या, गुरुकी भार्या,अपने कुलमें उपजी ऐसी स्त्रियोंसे भोग करनेवाला ऐसे मनुष्योंके तेरह प्रकारके रोग होते हैं॥ ८ ॥ पांडु, कुष्ठ, राजरोग, अतीसार, प्रमेह, मूत्ररोग, पथरीरोग, मूत्रकृच्छ्र, शूल, श्वास, खांसी, शोजा, घाव ये पापरूपरोग उन मनुष्योंके उपजते हैं ॥ ९ ॥ और ज्वर,अजीर्ण छर्दि,भ्रम,मोह,मंदाग्नि, यकृतरोग,तिल्लीरोग, बवासीर, शोष ये उपरोग कहाते हैं ॥ १० ॥ घाव,शूल, शिरका शूल, शरीरके ऊपरले अंगोंमें प्राप्त हुआ रक्तपित्त ये रोग हे महाप्राज्ञ ! अभिशापसे होते हैं ॥ ११ ॥ अन्य भी बहुतसे रोग दोषोंसे उपजते हैं इसवास्ते विस्तारसे मैं कहूँगा । हे महामते तुम सुनो ॥ १२ ॥ अथ कर्मविपाक । ब्रह्मघ्नो जायते पाण्डुः कुष्ठी गोवधकारकः॥राजघ्नो राजयक्ष्मी स्यादतिसार्योपघातकः ॥ १३ ॥ स्वाम्यङ्गनाभिगमने मेहा रोगा भवन्ति हि॥गुरुजायाप्रसङ्गेन मूत्ररोगोऽश्मरीगदः ॥१४॥ स्वकुलजाप्रसङ्गाच्च जायते च भगंदरः॥शूली परोपतापी च पैशू- न्याच्छ्वासकासिनः॥१५॥मार्गे विघ्नकरा ये तु जायन्ते पादरो- गिणः ॥ अभिशापाद्व्रणोत्पत्तिर्यकृद्धापि प्रजायते ॥ १६ ॥ सुरालये जले चापि शकृद्दृष्टिं करोति यः॥गुदरोग़ा भवन्त्यस्य पापरूपातिदारुणाः ॥१७॥ परतापिद्विजानां च जायन्ते हि