भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 156

( १२४ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने- महाज्वराः॥परान्नविघ्नजननादजीर्णमपि जायते ॥१८॥ गरद्- श्चर्दिरोगी स्यात्पादाष्टविभ्रमी तथा॥धूर्त्तोऽपस्माररोगी स्या- त्कदन्नदेऽग्निमान्द्यकम्॥१९॥यकृत्प्लीहो भवेद्रोगो भ्रूणपातकपा- तकात्॥व्रणं शूलं शिरःशूलं परतापोपकारणात्॥२०॥अपेयपा- नरतको रक्तपित्ती प्रजायते ॥ दावाग्निदायको यस्तु जायते च विसर्पवान्॥२१॥बहुवृक्षोपच्छेदी च जायते च बहुव्रणः ॥ पर- द्रव्यापहाराच्च जायते ग्रहणीगदः ॥२२ ॥ कुनखी स्वर्णस्तेयाच्च प्रसूतिस्तस्य जायते ।। रौप्यस्तेयाच्चित्रकुष्ठं ताम्रचौराद्विपा- दिका ॥२३॥ त्रपुश्चौरः सिध्मलश्च मुखरोगी च सीसहृत्॥वर्वरो लोहचौरः स्यात्क्षारचौरोऽतिमूत्रलः ॥२४॥ घृतचौरोऽन्तरोगी च तैलचौरोऽतिकण्डुकः॥एतैश्चिह्नैस्तु काणाक्षो वक्रोक्तो वक्र- लोचनः॥२५॥ दोषवान्स्याच्छ्यावदन्तो दुष्टवाक्कुष्ठदूषणः ॥ रसनाशाज्जिह्वारोगी गोत्रहा लूतिकाव्रणी॥२६॥एते चैव महा- दोषा अतो वक्ष्यामि निष्कृतिम् ॥कृच्छ्रेण येन सिध्यन्ति पाप- रूपा इमे गदाः ॥ २७ ॥ ब्राह्मणको मारनेवाला पांडुरोगी होता है,गायको मारनेवाला कुष्ठी होता है, राजाको मारने- वाला राजरोगी होता है, मनुष्यको मारनेमें सलाह देनेवाला अतीसाररोगी होता है ॥१३॥ स्वामीकी स्त्रीसे भोग करनेसे प्रमेह रोग उपजता है और गुरुकी स्त्रीसे भोग करनेमें मूत्ररोग और पथरी रोग उपजता है॥१४॥ अपने कुलसे उपजी स्त्रीके संग भोग करनेसे भगंदर रोग उपजता है, पराये सुखको देख दुःख पानेवालेको शूलरोग होता है, चुगली करनेसे श्वास रोग और खांसी उपजती है ॥१५॥ मार्गमें विघ्न करनेवालोंके पैरोंमें रोग उपजता है,अभिशापसे घावकी उत्पत्ति अथवा यकृत् रोग उपजता है ॥ १६ ॥ देवताओंके स्थानमें और पानीमें जो विष्ठाको गेरता है उसके पापरूपी और दारुण ऐसे गुदाके रोग उपजते हैं ॥१७॥ ब्राह्मणको दुःख देनेसे महा- ज्वर उपजता है और पराये भोजनमें विघ्नको करनेसे अजीर्ण रोग उपजता है ॥ १८॥ विषको देनेवालेके छर्दिरोग उपजता है अथवा वह रोगी घुटनोंसे आठ दिशातक भ्रमनेवाला होता है, धूर्त मनुष्यके मृगीरोग उपजता है और कुत्सित अन्नको देनेवाला मन्दाग्निसे पीडित होता है ॥ १९ ॥ गर्भको गिरानेवाला यकृत्रोगसे और तिल्लीरोगसे पीडित होता है, ॥ दूसरेको देख दुःख पानेसे घाव, शूल, शिरका शूल ये उपजते हैं ॥२०॥ नहीं पीनेके योग्य चीजको पीनेवाला रक्तपित्तसे पीडित होता है और वनमें अग्निको