हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 157, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १ ] भाषाटीकासमेता । ( १२५ ) लगानेवाला विसर्परोगी हो जाता है ॥ २१ ॥ बहुतसे वृक्षोंको छेदनेवाला बहुत घावोंसे पी- ड़ित होता है और पराये द्रव्यको हरनेसे ग्रहणी रोग उपजता है ॥ २२ ॥ सोनेकी चोरी कर- नेसे कुत्सित नखोंवाला हो जाता है, चांदीको चोरनेसे चित्रकुष्ठ उपजता है, तांबको चुरानेसे वि- पादिका कुष्ठ उपजता है ॥ २३ ॥ रांगको चुरानेसे सेपरोग होता है, सीसाके चुरानेसे मुखरोग उपजता है, लोहाको चुरानेसे बर्बर संज्ञक रोगको प्राप्त होता है, क्षारको चोरनेवालेको अति- मूत्ररोग उपजता है ॥ २४ ॥ घृतको चोरनेसे आंतरोग होता है, तेलको चोरनेसे खाजरोग उप- जता है, दूसरोंमें छिद्रको काढ़नेवाला नेत्रोंसे काणा होता है और टेढ़ा बोलनेवाला टेढ़े नेत्रों- वाला होता है ॥ २५॥ दोषवालेके काले दंत होते हैं, दुष्टकर्मको करनेवाला कुष्ठरोगी होता है, रसको नाशनेवाला जीभरोगी होता है, गोत्रके मनुष्योंको नाशनेवाला भूत और घावसे पीड़ित होता है ॥ २६ ॥ ये सब महादोष हैं इसलिये इनकी निष्कृतिको कहता हूँ जिस कृच्छ्रसे ये पापरूपी रोग सिद्ध होते हैं ॥ २७ ॥ अथ पाप दोषोंका प्रतिकार । गोदानं भूमिदानं च स्वर्णदानं सुरार्चनम् ॥ कृत्वा पश्चात्प्रती- कारं कुर्यात्पाण्डूपशान्तये ॥२८॥ महापापेषु सर्वस्वं तदर्द्ध- मुपदोषजे॥ आत्रेयाद्दशषष्ठांशात्कल्प्यं व्याधिबलाबलम्॥२९॥ नवषष्टिकृतं कर्म कुष्ठरोगोपशान्तये ॥ गोभूहिरण्यदानं च तथा मिष्टान्नभोजनम् ॥ ३० ॥ चतुर्विधं दानमिदं दत्त्वा कुर्यात्प्र- तिक्रियाम्॥ कदाचिदपि सिध्येत आयुषश्च बलक्रियाम्॥३१॥ मेहे सुवर्णदानं च शूले श्वासे भगन्दरे॥आश्वानडुहदानेन श्वास- कासाद्विमुच्यते॥३२॥ज्वरे चेश्वरपूजा च रुद्रजाप्यं समाचरेत् ॥ अतिपानान्नदानं च शस्त्रदानं अमातुरे ॥ ३३ ॥ अग्निहोमं चाग्निमान्द्ये कन्यादानं च गुल्मके॥ मेहाश्मरीविनाशाय लवणं च प्रदीयते ॥ ३४ ॥ बहुभोजनदानेन शूलरोगाद्विमु- च्यते ॥ महाज्वरे शान्तिकं च सहस्रं गण्डुकं शिवम् ॥३५ ॥ स्नापयेत्तेन सिद्धिः स्याज्ज्वररोगाद्विमुच्यते॥ घृतमधुप्रदानेन रक्तपित्तं प्रशाम्यति ॥ ३६ ॥ वनस्पतिसिञ्चनेन विसर्पात्परि- मुच्यते ॥ विटपिसिञ्चनेनाथ नात्र याति बहुव्रणः ॥ ३७ ॥ चतुर्विधेन दानेन साध्यः स्याद्ग्रहणीगदः ॥ सुवर्णदानात्कुनखी