भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 158

( १२६ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने- श्यावदन्तः सुखी भवेत् ॥ ३८ ॥ रौप्यदानाच्चित्रकुष्ठं साध्यं वापि प्रदिश्यते॥सिध्मले त्रपुदानं च बर्बरे लोहदानकम्॥३९॥ मुखव्रणे नागदानं गोदानं बहुपुत्रके॥नेत्ररोगे घृतं दद्यात्सुगन्धं नासिकागदे ॥४० ॥ तैलदानं च कण्डूके रसदानं च जिह्वके॥ श्यावदन्तेन देवानां सत्कृतिः प्रविधीयते॥ ओष्ठरोगेऽपि तद्वच्च लूतारोगे ददेत गाः ॥ ४१ ॥ गोदान,पृथिवीदान,सोनादान, देवताओंकी पूजा इनको करके पीछे पांडुरोगकी शांतिके लिये चिकित्साको करे ॥ २८ ॥ महापापोंमें सर्वस्वका दान करे और उपदोषमें घरके धनसे आधा दान करे । आत्रेयके मतसे व्याधिके बल और अबलको देख घरके धनसे सोलहवां हिस्सा दानको करे ॥ २९ ॥ कुष्ठरोगकी शांतिके लिये उनहत्तर ६९ प्रकारका कर्म्म करना लिखा है परंतु गाय भूमि सोनेका दान और मिष्टअन्नका भोजन ॥ ३० ॥ इन चार प्रकारके दानोंको देकर पीछे कुष्ठकी चिकित्सा करनी,क्योंकि आयुकी शेषतासे कदाचित् चिकित्सा सिद्ध भी हो जाती है ॥ ३१ ॥प्रमेह,श्वास रोग, खांसी,भगंदर इन रोगोंमें सोनेका दान करना, घोड़ा और बैलके दानको करनेसे मनुष्य श्वासरोग और खांसीसे छुट जाता है॥ ३२॥ ज्वररोगमें महादेवकी पूजा और महा- देवके स्तोत्रका पाठ करावे और भ्रमरोगमें पानीका और अन्नका दान श्रेष्ठ है ॥ ३३॥ मंदाग्नि में अग्निमें होम करे, गुल्मरोगमें कन्याका दान करे और प्रमेह तथा पथरीरोगको दूर करनेके लिये नमकका दान करना ॥ ३४ ॥ बहुतसे भोजनका दान कर- नेसे मनुष्य शूलरोगसे मुक्त होता है, महाज्वरमें शांतिकर्म करावे और हजारधारावाले कलशेसे शिवको स्नान करावे ॥ ३५ ॥ इससे सिद्धि होती है और महाज्वर दूर होता है, घृत और शहदके दानसे रक्तपित्त दूर होता है ॥ ३६ ॥ वनस्पतिको सींचनेसे विसर्परोग दूर होता है, वृक्षको सींचनेसे घावरोग दूर होता है ॥ ३७॥ चार प्रकारके दानसे ग्रहणी रोग साध्य हो जा ता है, सोनेके दानसे कुनखी और काले दांतोंवाला सुखी होता है ॥ ३८ ॥ चांदीके दानसे श्वित्रकुष्ठ साध्य कहा है, सीपरोगमें रांगका दान और बर्बररोगमें लोहेका दान श्रेष्ठ है ॥ ३९ ॥ मुखके घावमें हस्तीका दान हित है और पापडीरोगमें गौका दान हित है, नेत्ररोगमें घृतको देवे,नासिकाके रोगमें सुगंधका दान करना ॥ ४० ॥ खाजमें तेलका दान और जीभके रोगमें रसका दान करना, कालें दांतोंके रोगमें देवताओंका सत्कार करना और ओष्ठरोगमें भी यही विधि है और लूतारोगमें गौका दान देना ॥ ४१॥ अथ अन्यान्य रोगोंका कारण । अन्यांश्च कथयिष्यामि मनुष्याणां शरीरगान्॥लज्जितः परनिं- न्दायां परतर्केण काणगः ॥ ४२ ॥ खरहा स्याद्वक्रनासः पक्षा-