भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १२७ ) घातेन पक्षहा ॥ वामनः स्वप्रशंसायां परद्वेष्टातिपिङ्गलः ४३ ॥ परस्य कृत्यकर्त्ता च जायते विकृतात्मकः॥ एते महारोगाश्चान्ये जायन्ते पापसम्भवाः ॥४४॥ यदि वात्र न सिध्येत्तु परभावो भवेन्न च ॥ अतो हि प्रायश्चित्तं तु कारयेद्भिषजां वरः ॥४५॥ भूयो जन्मान्तरे यावत्पापं रोग्यथ भुञ्जति ॥ प्रायश्चित्ते कृते वापि न पुनर्जायते भवे ॥ ४६ ॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतो- त्तरे द्वितीयस्थाने पापदोषप्रतीकारो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥१॥ मनुष्योंके शरीरमें प्राप्त हुए अन्य रोगोंको भी कहूँगा । परायी निंदा करनेवाला मनुष्य लाज- वाला होता है, दूसरेको तर्क करनेवाला मनुष्य काणा होता है ॥४२॥ गधाको मारनेवाला टेढ़ी नासिकासे संयुक्त होता है, दूसरेके पक्षको काटनेवाला मनुष्य अर्द्धांगरोगसे पीड़ित होता है, अपनी प्रशंसा करनेमें मनुष्य वामनाकी योनिको प्राप्त होता है, दूसरोंसे वैर करनेवाला मनुष्य अतिपिंग शरीरवाला होता है ॥ ४३ ॥ दूसरेके कृत्यको करनेवाला मनुष्य विकृत शरीरवाला होता है ये सब और भी अन्य महारोग पापसे उपजनेवाले हैं ॥४४॥ यदि रोग सिद्ध न होवें तो वैद्यवर रोगीको प्रायश्चित्त करावे ॥ ४५ ॥ किये हुए पापको दूसरे जन्ममें भी रोगी भोगता है परन्तु प्रायश्चित्तके करनेमें फिर वह पापरूपी रोग नहीं उपजता है ॥ ४६ ॥ इति वेरीनिनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां द्वितीयस्थाने पापदोषप्रतीकारो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ द्वितीयोऽध्यायः २. अथ स्वप्नाध्यायका वर्णन । आत्रेय उवाच ॥ शृणु पुत्र समासेन यथा वत्स प्रकाश्यते ॥ तथारिष्टपरिज्ञानं भेषजं संप्रवक्ष्यते ॥ १ ॥ आत्रेय जी कहते हैं-हें पुत्र ! विस्तारसे जैसे प्रकाशित किया जाता है वैसे ही अरि- ष्टके परिज्ञानको और औषधको सुनो ॥ १ ॥ अथ वर्ज्य स्वप्न । वातिकाः पैत्तिकाश्चैव भयाद्धीनबलादपि ॥ मूत्रान्विष्टे सपित्ते च षट्स्वप्नानि च वर्जयेत् ॥ २ ॥