हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १३२ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने- मनुष्य. स्वप्नमें देवतासे रहित मंदिरको और पानीसे रहित कलशोको और टूटी हुई शाखाओं- वाले वृक्षको देखे अथवा स्थानके नाशको देखे उस रोगी मनुष्यकी मृत्यु हो जाय और सुखी मनुष्य रोगको प्राप्त होवे ॥ २४ ॥ स्वप्नमें जिसको दक्षिणदिशामें आश्रितहुए पितर बुलाते हों तब उस मनुष्यकी मृत्यु जानो और जिसको स्वप्नमें शूल, लाठी, फांसी इनको हाथमें धारनेवाला मनुष्य बुलाता है उसकी शीघ्र मृत्यु जाननी ॥ २६ ॥ जो स्वप्नमें कपास, हड्डी, भस्म, खोपरी, शूल, चक्र, फांसी, इनको देखे उस मनुष्यके रोग, दुःख, धनका नाश ये उपजते हैं और ऐसा स्वप्न रोगीको आवे तो मृत्यु अथवा अत्यंत कष्ट होता है ॥ २७॥ रात्रिमें सोते हुए मनुष्यको विशेषकरके ऐसे अशुभ स्वप्न भी कहे हैं. हे महामते ! तैसे ही जानके रोगके नाशके लिये मंत्रविधिको करना उचित है ॥ २८ ॥ स्नान, दान, देवताकी पूजा, होम इनसे भाग्यके विधान करके दुःस्वप्न नाशको प्राप्त होता है शुभ और सुख शीघ्र प्राप्त होता है ॥ २९ ॥ इति बेरीनिवासिबुधाशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिता- भाषाटीकायां द्वितीयस्थाने स्वप्नाध्यायो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ तृतीयोऽध्यायः ३. अथ स्वास्थ्यारिष्टम् । आत्रेय उवाच । शृणु पुत्र महाप्राज्ञ सर्वदेहार्थसाधकम् ॥ वैद्यशास्त्रस्य सारं यत्स्वास्थ्यारिष्टं च मानवे ॥ १ ॥ स्वस्थमनुष्यको अरिष्टवर्णन-आत्रेयजी कहते हैं-हे महाप्राज्ञ ! हे पुत्र ! संपूर्ण देहके प्रयोजनको साधनेवाला और वैद्यकशास्त्रका सार ऐसे स्वस्थ मनुष्यके अरिष्टको सुनो ॥ १ ॥ अथ ध्रुवादिकें न देखनेका अरिष्ट । यो न पश्येद् ध्रुवं सम्यक्स्वर्णं वा मनुजो बुधः ॥ तस्य षण्मासमध्ये तु मृतिश्चैवोपपद्यते ॥ २ ॥ जो मनुष्य ध्रुवताराको अथवा ध्रुव अर्थात् नासिकाके अग्रभागको और सोनाको अच्छी- तरह नहीं देखता है, उसका छः महीनोंके मध्यमें मृत्यु होता है ॥ २ ॥ अथ द्वितीयाचंद्रके अदर्शनका अरिष्ट । यो वै द्वितीयां हिमधामलेखां नरो न पश्येद्विजहानिरस्य ॥ मासत्रयं प्राप्य शरीरमाशु जीवो व्रजेत्तस्य यमस्य लोकम् ३॥