हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ३ ] भाषाटीकासमेता । ( १३३ ) जो मनुष्य किरणोंसे व्याप्त हुआ द्वितीयाका चंद्र नहीं देखें और जिसके दंत गिर पड़े उस मनुष्यकी तीन महीनोंमें मृत्यु जानना ॥ ३ ॥ अथ कर्णघोष न सुननेका अरिष्ट । यः कर्णघोषं न शृणोति हृप्ता मृताश्च यूकाः प्रपतन्ति लाभात्॥ यो वैपरीत्यं विशृणोति शब्दं मासद्वयं प्राप्य जहाति जीवम् ४॥ जो मनुष्य कानमें शब्दको न सुने और गर्वित हुई और मृत हुई जूस और लीख शरीरमें पड़ जावे और जो विपरीतपनेसे शब्दको विशेष करके सुने वह दो महीनोंमें मृत्युको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥ अथ मुखश्वासादिकका अरिष्ट । यः स्वस्थदेहः श्वसते मुखेन नेत्रेऽरुणे श्यावमथैव वक्त्रम् ॥ जिह्वा विशीर्णा दशनाश्च कृष्णाःस्वस्थोऽपि शीघ्रं यमलोकगन्ता ५ जो स्वस्थ शरीरवाला मनुष्य मुख करके श्वासको लेवे और लाल नेत्र हो जावें और काला- मुख हो जावे और फटी हुई जीभ हो जावे और काले दंत हो जावें ऐसा स्वस्थ भी मनुष्य मृत्युको शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है ॥ ५ ॥ अथ प्रभातमें मस्तकशूलका अरिष्ट । यस्य प्रभाते च शिरोव्यथा स्याद्दीपे परिवेषमवेक्षमाणः ॥ विपश्यते यः पटलं च रेणोः स वै मृतिं याति न दीर्घमायुः॥६॥ प्रभातमें जिसके शिरमें पीड़ा हो और जो दीपककी ज्योतिमें मंडलको देखे और जो आकाशमें धूलीके समूहको विशेष करके देखे वह शीघ्र मरजाता है, दीर्घायु नहीं पाता ॥६ ॥ अथ सूर्य्यबिंबादिकके दर्शनका अरिष्ट । यः सूर्य्यबिम्बे शशिनं प्रपश्येद्विना परीवेषमवेक्षमाणः ॥ धूमावृतं वा रविमण्डलं च प्रपश्यते शीघ्रमृतिं स गन्ता ॥७ ॥ जो सूर्यके बिंबमें चंद्रमाको देखे और बिना चंद्र हुए ही मंडलको देखे और धूमोंसे आच्छा- दित हुआ सूर्यका मंडल दीखे उसकी शीघ्र मृत्यु जानना ॥ ७ ॥ अथ इंद्रधनुष देखनेका अरिष्ट । स्वच्छे निरभ्रे गगने च पश्येद्यः शक्रचापं विदिशादिशासु ॥ तथैव विद्यान्नयनाग्रतो यः स शीघ्रमेव यमलोकगन्ता ॥ ८ ॥ जो स्वस्थ और बादलोंसे रहित हुए आकाशमें और दिशा तथा दक्षिणमें इंद्रके धनु- षको देखें अथवा नेत्रोंके आगे इन्द्रके धनुषको देखें वह मृत्युको प्राप्त होता है ॥ ८ ॥ १ विदिशाया उज्जयिन्या दिशास्त्वर्थाद्दक्षिणदिशासु । २ अत्राख्यानकीवृत्तम्, परंतु तुर्यपादे तगणस्याभा- वोऽस्ति वर्णस्यादीर्घत्वादतो वृत्तच्छेदः ।