भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 166

( १३४ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने- अथ विपरीत देखने सुननेका अरिष्ट । यो नेत्रे मीलितेऽपि द्युतिमथ चपलां पश्यते यः पुरस्तात्कर्णे रन्ध्रं निरुध्याद्ध्वनिमथ मनुजो न शृणोति कथञ्चित्॥तिक्ता- दीनां रसानां कथमपि रसनास्वादमात्रं न वेत्ति रौद्रं वैवस्व- तस्य प्रतिगमनमथो पश्यते मानुषश्च ॥ ९ ॥ जो नेत्रोंके मूंदनेपर भी चपल ज्योतिको आगे देखता है, कानके छेद मूँदकर जो अनहद नाद नहीं सुनता, कडुवा आदि रस जिसे नहीं समझ पड़ते वह मनुष्य भयंकर यमराजकी ओर अपनेको जाता हुआ समझे ॥ ९ ॥ अथ शरीरके स्पर्शसे अरिष्टकथन । यस्यात्युष्णं शरीरं शिशिरमथ मनुजस्य यस्याविलं च शीतं नो चेति यस्य हिमजलसिकते रोमहर्षो न यस्य॥ दण्डाघातेन राजी न भवति स पुनः श्राद्धदेवस्य लोके लोकानां दर्शनाय द्रुतमतिरुचिरां स्वस्थतां न प्रयाति ॥ १० ॥ जिस मनुष्यका शरीर अतिशय गरम हो और तुरंत ही ठंडा और धूमिल हो जाय, जो पुरुष ठंढीको और गर्मीको जान सकता नहीं, जिस मनुष्यके शरीरको शीतल जलके बिन्दु- ओंका या ठंढेबालूरेतके स्पर्श होनेसे रोमांच नहीं होता और दंड (वेत) मारनेसे रेखा न हो तो वह मनुष्य यमराजके लोकको देखनेके लिये जल्दी करता है और स्वस्थताको वह पुरुष प्राप्त नहीं होता है ॥ १० ॥ अथ प्रतिबिंब न देखनेसे अरिष्ट । तैले जले दर्पणके घृते वा परस्य नेत्रे प्रतिबिम्बमात्मनः ॥ पश्येत्र योऽसौ यमलोकगन्ता जानीहि तं जीवविहीनमेव॥११॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे द्वितीयस्थाने स्वास्थ्यारिष्टं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ जो मनुष्य तेल, पानी, शीशा, दूसरोंके नेत्र, इनमें अपने प्रतिबिंबको नहीं देखता है उसकी मृत्यु जाननी ॥ ११ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहा- रीतसंहिताभाषाटीकायां स्वास्थ्यारिष्टं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥


१-२ छन्दोभंगः ।