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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

( १३४ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने- अथ विपरीत देखने सुननेका अरिष्ट । यो नेत्रे मीलितेऽपि द्युतिमथ चपलां पश्यते यः पुरस्तात्कर्णे रन्ध्रं निरुध्याद्ध्वनिमथ मनुजो न शृणोति कथञ्चित्॥तिक्ता- दीनां रसानां कथमपि रसनास्वादमात्रं न वेत्ति रौद्रं वैवस्व- तस्य प्रतिगमनमथो पश्यते मानुषश्च ॥ ९ ॥ जो नेत्रोंके मूंदनेपर भी चपल ज्योतिको आगे देखता है, कानके छेद मूँदकर जो अनहद नाद नहीं सुनता, कडुवा आदि रस जिसे नहीं समझ पड़ते वह मनुष्य भयंकर यमराजकी ओर अपनेको जाता हुआ समझे ॥ ९ ॥ अथ शरीरके स्पर्शसे अरिष्टकथन । यस्यात्युष्णं शरीरं शिशिरमथ मनुजस्य यस्याविलं च शीतं नो चेति यस्य हिमजलसिकते रोमहर्षो न यस्य॥ दण्डाघातेन राजी न भवति स पुनः श्राद्धदेवस्य लोके लोकानां दर्शनाय द्रुतमतिरुचिरां स्वस्थतां न प्रयाति ॥ १० ॥ जिस मनुष्यका शरीर अतिशय गरम हो और तुरंत ही ठंडा और धूमिल हो जाय, जो पुरुष ठंढीको और गर्मीको जान सकता नहीं, जिस मनुष्यके शरीरको शीतल जलके बिन्दु- ओंका या ठंढेबालूरेतके स्पर्श होनेसे रोमांच नहीं होता और दंड (वेत) मारनेसे रेखा न हो तो वह मनुष्य यमराजके लोकको देखनेके लिये जल्दी करता है और स्वस्थताको वह पुरुष प्राप्त नहीं होता है ॥ १० ॥ अथ प्रतिबिंब न देखनेसे अरिष्ट । तैले जले दर्पणके घृते वा परस्य नेत्रे प्रतिबिम्बमात्मनः ॥ पश्येत्र योऽसौ यमलोकगन्ता जानीहि तं जीवविहीनमेव॥११॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे द्वितीयस्थाने स्वास्थ्यारिष्टं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ जो मनुष्य तेल, पानी, शीशा, दूसरोंके नेत्र, इनमें अपने प्रतिबिंबको नहीं देखता है उसकी मृत्यु जाननी ॥ ११ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहा- रीतसंहिताभाषाटीकायां स्वास्थ्यारिष्टं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥


१-२ छन्दोभंगः ।

अ० ४ ] भाषाटीकासमेता । ( १३५ ) चतुर्थोऽध्यायः अथ व्याध्यरिष्टका लक्षण । आत्रेय उवाच॥उपद्रवैश्च ये पुष्टा व्याधयो यान्ति वार्यताम्॥ रसायनादिना वत्स तान्मेदेकमनाः शृणु ॥ १ ॥ उपद्रवोंसे युक्त हुए रोग रसायन आदिसे निवारण किये जाते हैं। हे पुत्र ! उन रोगोंको एकमन होके सुनो ॥ १ ॥ अथ अष्ट महाव्याधियोंका नाम । वातव्याधिः प्रमेहश्च कुष्ठमर्शो भगन्दरम्॥ अश्मरी मूढगर्भश्च तथा चोदरमष्टमम् ॥ २ ॥ अष्टावेते प्रकृत्यैव दुश्चिकित्स्या महागदाः ॥ ३ ॥ वातव्याधि, प्रमेह, कुष्ठ, बवासीर, भगंदर, पथरी, मूढगर्भ, आठवाँ उदररोग ॥ २ ॥ ये आठों प्रकृति करके महारोग दुश्चिकित्स्य हैं ॥ ३ ॥ अथ आठ महारोगोंके उपद्रव । प्राणमांसक्षयश्वासतृष्णाशोषवमिज्वरैः॥मूर्च्छातिसारहिक्काभिः पुनरेतैरुपद्रुताः ॥ ४ ॥ वर्जनीया विशेषेण भिषजा सिद्धि- मिच्छता ॥ ५ ॥ बलक्षय, मांसक्षय, श्वासरोग, तृषा, शोष, छर्दि, ज्वर, मूर्च्छा, अतिसार, हिचकी इन उपद्रवोंसे युक्त हुए पूर्वोक्त महारोग ॥ ४ ॥ सिद्धिकी इच्छा करनेवाले मनुष्यको वर्जने चाहिये ॥ ५ ॥ अथ ज्वररोगीके अरिष्ट । यस्य जिह्वा भवत्तीव्रा पीता वा नीलसम्भवा॥श्वासो भवत्य- तीवोष्णः शरीरं पुलकांकितम् ॥ ६ ॥ नीलनेत्रेऽरुणे पीते कण्ठो घुरघुरायते॥न जीवति ज्वरार्त्तस्तु लक्षणं यस्य चेदृशम् ॥७॥ मुखे श्वासो भवेद्यस्य श्वावा दन्तावली पुनः॥ स्तब्ध- नेत्रो बलाद्यः स्याज्ज्वरात नैव जीवति ॥ ८॥ बहुमूत्री बहु- श्वासी क्षामोऽरोचकपीडितः ॥ हतप्रभेन्द्रियो यश्च ज्वरी

( १३६ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने- शीघ्रं विनश्यति ॥ ९ ॥ यस्यास्ये श्रूयते रक्तं शिरोर्तिर्यस्य दृश्यते ॥ अन्तर्दाहो बहिःशीतो ज्वरस्तु मृत्युमृच्छति॥१०॥ यस्ताम्यति विसंज्ञस्तु शेत विपतितोऽपि वा॥शीतार्दितोऽन्त- रुष्णश्च ज्वरेण म्रियते नरः ॥११॥ यो हृष्टरोमा रक्ताक्षो हृदि संघातशूलवान्॥नित्यं च वक्रेणोच्छ्वासः स ज्वरो हन्ति मान- वम् ॥१२ ॥ हिक्काश्वासपिपासार्त्तं मूढं विभ्रान्तलोचनम् ॥ सन्ततोच्छ्वासिनं क्षीणं नरं क्षपयति ज्वरः ॥ १३ ॥ आविलाक्षं प्रताम्यं च तन्द्रायुक्तमतीव च॥ क्षीणशोणितमांसं च नरं नाश- यति ज्वरः ॥ १४॥ घनं निष्ठीवनं नेत्रं प्लावा रोचकपीडितम्॥ अन्तर्दाहोऽसिता जिह्वा शीघ्रं नाशयति ज्वरः ॥१५ ॥ जिसकी खरखरी, पीली और नीली ऐसी जीभ हो जाय और अत्यंत गरम श्वास आवे और हर्षित हुए रोमोंकरके युक्त शरीर हो ॥ ६ ॥ नीले, लाल और पीले नेत्र हो जावें और कंठ घुर्घुर करे ऐसे लक्षण जिस ज्वररोगीके होवें उसका जीवना नहीं है ॥ ७ ॥ जिसके मुखमें शीघ्र श्वास आव और दंतोंकी पंक्ति काली हो जावे और वरबस स्तंभित नेत्र हो जावें ऐसा ज्वरसे पीडित रोगी नहीं जीता है ॥ ८ ॥ बहुत मूत्रको करनेवाला और बहुत श्वासको लेनेवाला और कृश और अरुचिसे पीडित और नष्ट हुई इन्द्रियोंकी कांतिवाला ऐसा ज्वररोगी शीघ्र मर जाता है ॥ ९ ॥ जिसके मुखसे रक्त गिरे और जिसके शिरमें पीड़ा होवे और भीतर दाह और बाहर शीत लगे ऐसे ज्वरवाला मर जाता है ॥ १० ॥ जो मोहको प्राप्त होवे और संज्ञासे रहित हुआ सोवे अथवा निरंतर पतित हुआ करे और बाहर शीतसे और भीतर गर्मीसे पीडित होवे ऐसा मनुष्य ज्वरसे मर जाता है ॥ ११ ॥ जो हर्षित हुए रोमोंवाला हो और लालनेत्रोंवाला हो और हृदयमें दारुण शूलवाला हो और निरंतर मुखसे ऊंचे श्वासको लेता हो ऐसा ज्वररोगी मर जाता है ॥ १२ ॥ हिचकी और श्वाससे पीडित और मूढ़ और विशेष करके भ्रमते हुए नेत्रोंवाला और निरंतर ऊंचे श्वासको लेनेवाला और क्षीण ऐसे रोगीको ज्वर मार देता है ॥ १३ ॥ धूम्रवर्णवाले नेत्रोंवाला और मोहको प्राप्त हुआ और तंद्रासे अत्यंत युक्त हुआ, क्षीण हुए रक्त और मांसवाला ऐसे मनुष्यको ज्वर मार देता है ॥ १४ ॥ बहुत छर्दिवाला और नेत्रोंसे पानीको गिरानेवाला और अरोचकसे पीडित और भीतर दाह तथा काली जीभसे युक्त ऐसे मनुष्यको ज्वर शीघ्र मार देता है ॥ १५ ॥ १ 'इन्द्रियार्थेष्वसंवित्तिर्गौरवं जृम्भणं क्लमः। निद्रार्तस्येव यस्येहा तस्य तंद्रा विनिर्दिशेत् ॥'

अ० ४ ] भाषाटीकासमेता । ( १३७) अथ दारुण उपद्रवका अरिष्ट । यस्यैकोपद्रवस्यापि शाम्यता नोपदृश्यते ॥ दारुणोपद्रवा- श्चान्ये भूयिष्ठं बहुरूपवान् ॥ १६ ॥ तेन मृत्योर्वशं याति सिद्धिं नेच्छति दारुणः ॥ १७ ॥ जिसके एक उपद्रव भी शांत नहीं होवे किंतु अन्य भी बहुतसे उपद्रव उपजते रहें और बहुतसे रूपोंको धारण करे ॥ १६ ॥ ऐसा मनुष्य मृत्युके वशको प्राप्त हो जाता है, अच्छा नहीं होता ॥ १७ ॥ अथ अतीसारका अरिष्ट । यस्यादौ दृश्यते चैवाप्यतीसारस्तथापरः ॥ श्वासः शोषश्च यस्य स्यात्सोऽपि शीघ्रं मृतिं व्रजेत् ॥ १८ ॥ श्वासशूलपिपासार्त्तं क्षीणं ज्वरनिपीडितम् ॥ विशेषेण नरं वृद्धमतीसारो विनाशयेत् ॥ १९ ॥ यस्यातिसारशोफाः स्युस्तथारोचकशूलवान् ॥ सोऽपि शीघ्रं मृतिं याति बहुभिः प्रतिकर्मभिः ॥ २० ॥ जिसके आदिमें अतीसार उपजे, पीछे श्वास और शोष उपजे वह मनुष्य शीघ्र मर जाता है ॥ १८ ॥ श्वास, शूल, तृष्णा इन करके पीडित, क्षीण और ज्वरसे त्रास पाया हुआ विशेष करके वृद्ध अतीसारसे नष्ट हो जाता है ॥ १९ ॥ जिसके अतीसार, शोजा, अरुचि, शूल ये उपजें उस मनुष्यकी बहुतसी चिकित्सा करनेसे भी मृत्यु हो जाती है ॥ २० ॥ अथ सूजनका अरिष्ट । बालस्य चातिवृद्धस्य विकलस्य नरस्य च ॥ सर्वाङ्गे जायते शोफः शोफी स म्रियते ध्रुवम् ॥ २१ ॥ बालक, अतिवृद्ध, विकल ऐसे मनुष्योंके संपूर्ण अंगमें शोजा उपजे तो वह निश्चय मर- जाता है ॥ २१ ॥ अथ शूलका अरिष्ट । यस्याध्मानं च शूलं च श्वासस्तृष्णा विमूर्च्छना ॥ शिरोऽर्त्तिर्यस्य दृश्येत शूली मृत्युमवाप्नुयात् ॥ २२ ॥ जिसके अफारा, शूल, श्वास्रोग, तृषा, मूर्छा, शिरमें पीड़ा ये उपजें उसकी मृत्यु हो जाती है ॥ २२ ॥

( १३८ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने-

पाण्डुरोगीका अरिष्ट । पाण्डुदन्तनखो यश्च पाण्डुनेत्रश्च मानवः ॥ पाण्डुसङ्घातवां- श्चैव पाण्डुरोगी विनश्यति ॥२३॥ पाण्डुत्वक्पाण्डुनेत्रे च मूत्रं वा पाण्डुरं भवेत्॥पाण्डुसंघातवांश्चैव पाण्डुरोगी विनश्यति॥२४॥ पीले दंत और नखोंवाला और पीले नेत्रोंवाला और पीलेपनको सब जगह देखे ऐसा पांडु- रोगी नष्ट हो जाता है ॥ २३ ॥ पीली खाल होवे,पीले नेत्र होवें और मूत्र भी पीला ही होवे और पीलेपनको सब जगह देखे ऐसा पांडुरोगी मर जाता है ॥ २४ ॥ अथ क्षयरोगका अरिष्ट । शुक्लाक्षमन्नद्वेष्टारमूर्ध्वश्वासनपीडितम् ॥ कृच्छ्रेण बहुमेहंतं यक्ष्मा हन्तीह मानवम् ॥२५॥ धातुहीनो भवेद्यस्तु शोफश्वा- सैर्निपीडितः॥बहुभोज्यो घृणीवांश्च राजयक्ष्मी विनश्यति॥२६ सफेद नेत्रोंवाला और अन्नसे वैर करनेवाला और ऊंचे श्वाससे निरंतर पीडित हुआ और कष्टसे बहुतवार मूत्रको करता हुआ ऐसा राजरोगी मर जाता है ॥ २५ ॥ धातुओंसे हीन हुआ, शोजा और श्वाससे पीडित हुआ और बहुतसे भोजनको करता हुआ और दयावाला ऐसा राजरोगी मर जाता है॥ २६ ॥ अथ श्वासस्रोगका अरिष्ट । हुंकारः शीतलो यस्य फूत्कारस्योष्णता भवेत्॥शीघ्रनाडी न निर्वाहः शीघ्रं याति यमालयम् ॥ २७ ॥ अंगकम्पो गतेर्भंगो मुखं वा कुङ्कुमप्रभम्॥ उच्चारैन्च भवेद्वायुः स च याति यमा- लयम् ॥ २८ ॥ जिसके मुखसे हुंकारी निकलनेमें शीतलता होवे और फूत्कारमें गरमाईपना होवे और नाडी शीघ्र चले, चलनेकी सामर्थ्य नहीं होवे ऐसा रोगी शीघ्र मरजाता है ॥ २७ ॥ जिसके अंग कांपे और चला जावे नहीं और केसरके समान मुख हो जावे और दस्त जानेके समय वायु निसरे वह मर जाता है ॥ २८ ॥ अथ बहुत दिनतककें रोगका आरिष्ट । चिरं प्रवृद्धरोगस्तु भोजनेऽप्यसमर्थकम् ॥ भग्नगात्रमुपेक्षेत भेषजोऽप्यरहस्यकम् ॥ एतादृशं नरं ज्ञात्वोपचारः क्रियते बुधैः ॥ २९ ॥


१ 'घृणा जुगुप्साकृपयो' इति मेदिनी ।

अ० ४ ] भाषाटीकासमेता । ( १३९ ) बहुत दिनोंसे बढ़े हुए रोगवाला और भोजनको नहीं करनेवाला और भग्न हुए अंगोंको देख- नेवाला और औषधको नहीं लेनेवाला ऐसे रोगीको जानकर उपचार करना ॥ २९ ॥ अथ उदररोगका अरिष्ट । विध्वंसश्वासशोफाच्च तथा ज्वरनिपीडनात् ॥ गम्भीरं सघनं तस्य तदुरः क्षयते नरम् ॥ ३० ॥ विष्ठाके क्षयसे, श्वास और शोजासे तथा ज्वरकी पीड़ासे गंभीर और कठिन हुई छाती उसको मार देती है ॥ ३० ॥ अथ गुल्मरोगका अरिष्ट । श्वासशूलपिपासार्त्तिर्विद्वेषो ग्रन्थिगूढता ॥ दुर्बलत्वं च भवति गुल्मिनो मृत्युमेष्यतः॥ ३१ ॥ श्वास, शूल, अत्यंत तृषा ये उपजें और अन्नमें वैर रहे और गाढ़ तथा मूढ़पना हो और दुर्ब- लपना हो ऐसा गुल्मरोगी मर जाता है ॥ ३१ ॥ अथ रक्तपित्तका अरिष्ट । नेत्रे जिह्वाधरौ यस्य रक्तौ वा रुधिरं वमेत् ॥ रक्तमूत्री रक्तसारी रक्तपित्ती विनश्यति ॥ ३२ ॥ लोहितं छर्दयेद्यस्तु बहुशो लो- हितेक्षणः ॥ रक्तानां च दिशां द्रष्टा रक्तपित्ती विनश्यति ॥ ३३॥ जिसके जीभ, दोनों ओष्ठ, नेत्र ये लाल हो जावें अथवा रक्तको गिरावै ऐसा रक्तमूत्रवाला और रक्तातीसारवाला और रक्तपित्तवाला मनुष्य मरजाता है ॥ ३२ ॥ जो लोहूकी छर्दि करे और बहुत करके लाल नेत्रोंवाला हो और लाल दिशाओंको देखें ऐसा रक्तपित्तरोगी मरजाता है ॥ ३३ ॥ अथ बवासीररोगका अरिष्ट । मुखशोफो भवेद्यस्य भ्रमारोचकपीडितः ॥ विबन्धोदरशूली च उदयाञ्च विनश्यति ॥ ३४ ॥ जिसके मुखपर शोजा हो, भ्रम और अरुचिसे जो पीड़ित हो,बंधा और उदरशूलसे संयुक्त हो ऐसा रोगी मर जाता है ॥ ३४ ॥ अथ विद्रधिरोगका अरिष्ट । आध्मानबद्धनिष्पन्दं छर्दिहिकारुगन्वितम् ॥ रुजाश्वाससमाविष्टं विद्रधिर्नाशयेन्नरम् ॥ ३५ ॥

( १४० ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने- जो अफारा हो, स्राव रुक जावे और छर्दि, हिचकी, शूल, इनसे समन्वित हो और श्वास- रोगसे संयुक्त हो ऐसे मनुष्यको विद्रधिरोग नाशता है ॥ ३५ ॥ अथ भ्रमरोगका अरिष्ट । यस्य तृष्णा भवेद्घोरा दाहो वापि वमिर्भवेत् ॥ भ्रमोपपन्नो भवति न स जीवति मानवः ॥ ३६ ॥ जिसके दारुण तृषा और दाह तथा छर्दि उपजे और भ्रमसे संपन्न हो वह रोगी जीवता नहीं है ॥ ३६ ॥ अथ आर्तवका अरिष्ट । अपूर्णे दिवसे नारी ज्वरार्त्ता पुष्पमाप्नुयात् ॥ सा न जीवेन्महाप्राज्ञ यस्या हि सारणो भवेत् ॥ ३७ ॥ जो ज्वरसे पीडित हुई नारी नहीं पूर्ण हुए दिनमें पुष्प अर्थात् योनिसे रक्तके बहनेको प्राप्त होवे हे महाप्राज्ञ ! जो वह रक्त गिरता ही रहे तो वह नारी जीवे नहीं ॥ ३७ ॥ अथ कामला और पांडुरोगका अरिष्ट । यः शोफश्वाससंयुक्तस्तृष्णायुक्तोऽथ शूलवान् ॥ कामलापाण्डुरोगात्तो नरश्च स विपद्यते ॥ ३८ ॥ जो शोजा और श्वाससे पीडित हो, तृषा और शूलसे संयुक्त हो, कामला और पांडुरोगसे संयुक्त हो वह मनुष्य जीवता नहीं है ॥ ३८ ॥ अथ भगंदरका अरिष्ट । वातमूत्रपुरीषाणि कृमयः शुक्रमेव च ॥ भगन्दरात्प्रस्रवन्ति यस्य तं परिवर्जयेत् ॥ ३९ ॥ जिसके भगंदरके घावसे अधोवात, मूत्र, विष्ठा, कीड़े वीर्य ये गिरते हों उस रोगीको असाध्य जानो ॥ ३९ ॥ अथ अश्मरीरोगका अरिष्ट । प्रसूननाभिवृषणं रुद्धमूत्रं रुगन्वितम् ॥ अश्मरी क्षपयत्याशु सिकताशर्करान्विता ॥ ४० ॥ नाभि और पोतोंपर शोजासे संयुक्त हो, मूत्र रुक जावे, शूल चले ऐसे मनुष्यको पथरी, सिकता, शर्करा ये रोग मार देते हैं ॥ ४० ॥

अ० ४ ] भाषाटीकासमेता । ( १४१ ) अथ मूढगर्भका अरिष्ट । गर्भकोशसमापन्नो मकुष्ठो योनिसंगतः ॥ हन्ति स्त्रियं मूढगर्भे यथोक्ताश्चाप्युपद्रवाः ॥ ४१ ॥ गर्भकोशमें समापन्न हुआ बालक योनिके छिद्रको बंधकरे और यथोक्त सब उपद्रव भी उपजे तब मूढगर्भ स्त्रीको मार देता है ॥ ४१ ॥ अथ अपस्माररोगका अरिष्ट । पार्श्वभंगान्नविद्वेषशोफातीसारपीडितम् ॥ बहुशोऽपस्मरं तं तु क्षीणं च वलितध्रुवम् ॥४२॥ नेत्राभ्यां च विकुर्वाणमपस्मारो विनाशयेत् ॥ ४३ ॥ पसलीका भंग, अन्नसे वैर, शोजा, अतीसार इनसे पीड़ित हुआ और बहुतवार विस्मरणको प्राप्त हुआ और क्षीण और टेढ़ी भ्रुकुटियोंवाला ॥ ४२॥ और नेत्रोंको फाड़कर देखनेवाले मनु- ष्योंको मृगीरोग मार देता है ॥ ४३ ॥ अथ वातव्याधिका अरिष्ट । शूलं सुप्तत्वचं भग्नमाध्मानेन निपीडितम् ॥ रुजार्त्तिमन्तं च नरं वातव्याधिर्विनाशयेत् ॥ ४४ ॥ शूल और सोती हुई खालसे संयुक्त हो और भग्न हो और अफारासे निरंतर पीड़ित हो और पीड़ासे संयुक्त हो ऐसे मनुष्यको वातव्याधि नाशती है ॥ ४४ ॥ अथ प्रमेहका अरिष्ट । यथोक्तोपद्रवाविष्टमतिप्रस्रुतमेव च ॥ पिडकापीडितं गाढं प्रमेहो हन्ति मानवम् ॥ ४५ ॥ यथोक्त उपद्रवोंसे व्याप्त हो और अत्यंत गिरता हो और फुन्सियोंसे अत्यंत पीडित हो ऐसे मनुष्यको प्रमेहरोग नाशता है ॥ ४५ ॥ अथ कुष्ठरोगका अरिष्ट । प्रभिन्नं प्रस्रुतांगं च रक्तनेत्रं हतस्वरम् ॥ पञ्चकर्मगुणातीतं कुष्ठं हन्तीह कुष्ठिनम् ॥ ४६ ॥ प्रभिन्न हुआ और बहते अंगोंवाला और लाल नेत्रोंवाला और नष्ट हुए स्वरवाला और वमन, विरेचन, नस्य, निरूहबस्ति, अनुवासनबस्ति इन पंचकर्मोंके गुणोंसे वर्जित ऐसे कुष्ठीको कुष्ठ- रोग मार देता है ॥ ४६ ॥

( १४२ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने- अथ उन्मादरोगका अरिष्ट । अवाङ्मुखस्त्वून्मुखो वा क्षीणमांसबलोत्तरः ॥ जागरूकस्त्वसंदे- हमुन्मादेन विनश्यति ॥४७॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे द्वितीयस्थाने व्याध्यरिष्टं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ नीचेको मुख रखनेवाला अथवा ऊपरको मुख रखनेवाला और क्षीण हुए मांसवाला और बलसे युक्त हुआ अथवा उत्तरोत्तर जिसका मांस और बल क्षीण होता जावे और दिन रात जागनेवाला ऐसा उन्मादरोगी निश्चय मर जाता है ॥ ४७ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां द्वितीयस्थाने व्याध्यरिष्टं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ पंचमोऽध्यायः ५. अथ पञ्चेन्द्रियविकार वर्णन । आत्रेय उवाच ॥ यः शीलवान्क्रोधनतामुपैति यः क्रोधवाञ्छी- लगुणं च धत्ते ॥ द्वावेव मृत्युं तनुतो विधिज्ञ स्थूलो नरः शीघ्र- तरं कृशाङ्गः ॥१॥ आत्रेयजी कहते हैं-जो शीलवान मनुष्य क्रोधपनेको प्राप्त होवे और जो क्रोधी मनुष्य शीलपनेको धारण करे हे विधिज्ञ ! ये दोनों मनुष्य मृत्युको शीघ्र प्राप्त होते हैं और जो मोटा मनुष्य शीघ्र कृशाङ्ग हो जावे और कृशाङ्ग मनुष्य शीघ्र मोटा हो जावे ये भी दोनों मृत्युकों प्राप्त हो जाते हैं ॥ १ ॥ यो धर्मशीलो भवतीह पापी पापात्मको धर्मरतो यदि स्यात् ॥ स मृत्युभाजी भवतीह शीघ्रं यश्च प्रकृत्या विकृतिं प्रयाति ॥२॥ जो धर्मशील मनुष्य पापी हो जावे और जो पापी धर्मको करने लगजावे और जो प्रकृति करके विकारको प्राप्त हो जावे ये मनुष्य शीघ्र मृत्युको प्राप्त होते हैं ॥ २ ॥ यो गौरवर्णो विदधाति काष्ण्यं कृष्णोऽतिगौरत्वमुपैति यश्च ॥ तथा मृतिं याति नरः प्रकृत्या शीघ्रं विकृत्या भजते वियोगम्३ जो गौरवर्णवाला मनुष्य काले वर्णको प्राप्त हो जावे और जो काले वर्णका मनुष्य गौर- पनेको प्राप्त हो जावे और जो अपनी प्रकृतिको शीघ्र त्याग देवे ऐसे मनुष्य शीघ्र मृत्युको प्राप्त होते हैं ॥ ३ ॥

अ० ६ ] भाषाटीकासमेता । (१४३) यो वैपरीतं श्रवणेऽपि शब्दं गृह्णाति वा न शृणुते स शीघ्रम् ॥ स वै मृतिं पश्यति यो न पश्येच्छायां स्वकीयां धरणीप्रपन्नाम्॥४॥ जो शब्दको विपरीतपनेसे ग्रहण करे अथवा शब्दको नहीं सुने और जो पृथिवीमें प्राप्त हुई अपनी छायाको नहीं देखे वे मनुष्य मृत्युको शीघ्र प्राप्त होते हैं ॥ ४ ॥ यो वेन्द्रियैः प्रतिहतः कृशतां प्रयाति स्थूलोऽतिनिष्प्रभवपुर्मरणं विपश्येत्॥यः क्वापि वेत्ति न कुगन्धिरसौ नरस्तु स वै मृतिं प्रिय- तमां भजते मनुष्यः ॥ ५ ॥ जो इन्द्रियोंसे प्रतिहत हुआ कृशपनेको प्राप्त होजावे और जो कृश मनुष्य अत्यंत मोटेपनको प्राप्त होवे व जिसका शरीर कृशपनेको प्राप्त होवे, जो दुर्गंधको और रसको कहीं भी नहीं जाने वह मृत्युको प्राप्त होता है ॥ ५ ॥ यस्यास्यगन्धमाघ्राय भजन्ते नीलमक्षिकाः॥नासिकायां शरीरे वा स चैव यमलोकगः ॥६॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे द्वितीयस्थाने पञ्चेन्द्रियविकारो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ जिसके मुखके गन्धको सूंघके नीलमक्षिका अर्थात् भौरे नासिकामें अथवा शरीरमें वास करने लग जावे उसकी मृत्यु होती है ॥ ६ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवा- दितहारीतसंहिताभाषाटीकायां द्वितीयस्थाने पंचेन्द्रियविकारो नाम पंचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ षष्ठोऽध्यायः ६. अथ नक्षत्रज्ञानवर्णन । आत्रेय उवाच ॥ अथ नक्षत्रयोगेन व्याधिर्यस्य प्रजायते ॥ साध्यासाध्यञ्च याप्यं च वक्ष्यामि शृणु पुत्रक ॥ १ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-जिसके नक्षत्रके योगसे व्याधि उपजे उसको साध्य, असाध्य और याप्य इन भेदोंसे कहता हूँ । हे पुत्र ! सुनो ॥ १ ॥ अथ मृत्युयोगोंका वर्णन । आदित्ययोगेन मघा विशाखा चन्द्रेण युक्ता कुज आर्द्रया तु॥ मूलं प्रबुद्धे गुरुकृत्तिका च शुक्रेण रोहिण्यसितेन हस्तः ॥ २ ॥ एतान्वदन्ति निपुणा यमघंटयोगान्व्याधिप्रपन्नमनुजो यदि

( १४४ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने पुण्ययोगात्॥ जीवेद्यदा कथमसौ घनदत्तयन्त्रघोरान्तरेण तप- नेन कथं सुखं स्यात् ॥ ३ ॥ आदित्येनानुराधा वसति हिम- रुचिश्चोत्तरासंप्रयुक्तो भौमः पित्रीशयुक्तो बुध इति तुरगीयुक्त एतत्सुखं ना॥ तस्माज्जीवेन युक्तो मृगशिरसहितोऽश्लेषया भार्ग- सूनुर्युक्तोऽर्किर्हस्तसंज्ञैर्न तु वदति शुभं शास्त्रवियोगयुक्तः ॥४॥ रविवारसे युक्त मघानक्षत्र और सोमवारसे युक्त विशाखा नक्षत्र और मंगलवारसे युक्त आद्र्रानक्षत्र और बुधवारसे युक्त मूलनक्षत्र और बृहस्पतिवारसे संयुक्त कृत्तिकानक्षत्र और शुक्र- वारसे युक्त रोहिणी और शनिवारसे युक्त हस्तनक्षत्र ॥२॥ इन्होंको पंडित यमघंटयोग कहते हैं, इसमें रोगको प्राप्त हुआ मनुष्य पुण्यके योगसे कदाचित् जीता है अन्यथा सुखकी प्राप्ति नहीं है, क्योंकि भयंकर वह यन्त्र जिसमें आग भी लगी हो उससे कैसे कोई बच सकता है ? ॥ ३ ॥ रविवारसे संयुक्त अनुराधा और चंद्रवारसे संयुक्त उत्तरानक्षत्र और मंगलवारसे युक्त मघा और बुधवारसे युक्त अश्विनी और बृहस्पतिवारसे युक्त मृगशिर और शुक्रवारसे युक्त आश्लेषा और शनिवारसे संयुक्त हस्तनक्षत्र ये मृत्युयोग हैं। इनमें रोगोंकी उत्पत्ति होवै तो शुभ नहीं होता है॥४॥ अथ अमृतयोगकथन । दिनकरकरयुक्तः सोमसौम्येन वा पि तुरगसहितभौमः सोमपुत्रोऽ- नुराधा ॥ सुरगुरुरपि पुष्ये रेवती शुक्रवारे दिनकरसुतयुक्ता रोहिणी सौख्यहेतुः ॥ ५ ॥ रविवारसे युक्त हस्त और सोमवारसे युक्त मृगशिर और मंगलवारसे संयुक्त अश्विनी और बुधवारसे संयुक्त अनुराधा और बृहस्पतिवारसे युक्त पुष्य और शुक्रवारसे युक्त रेवती और शनिवारसे संयुक्त रोहिणी ये शुभयोग हैं इनमें रोग उपजे तो सुख होता है ॥ ५ ॥ अथ क्रूरयोगवर्णन । शूले वज्रेऽतिगण्डे वा व्याघाते व्यतिपातके॥ विष्कम्भयोगयुक्ते च नक्षत्रे क्रूरदैवते ॥ ६ ॥ एतैरसाम्ध्या ज्वरिणस्तस्माद्योगान् परीक्षयेत् ॥ योगे ऋक्षे तथा वारे क्रूरे प्राप्ते न जीवति ॥ ७ ॥ शूल, वज्र, अतिगंड, व्याघात, व्यतीपात, निष्कंभ इन योगोंमें जब क्रूरदेवताओंवाले अर्थात् आश्लेषा मघाआदिनक्षत्र होवें उन्हें क्रूरयोग कहते हैं ॥ ६ ॥ इनमें ज्वर उपजे तो रोगी असाध्य होजाते हैं इस वास्ते योगोंकी परीक्षा करनी और यह क्रूर योग भी हो और उसमें क्रूरवार हो तब रोग उपजे तो रोगी जीता नहीं ॥ ७ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

अ० ६] भाषाटीकासमेता । ( १४५ ) अथ योगविज्ञान । सिद्धिः शुकः शुभः प्रीतिरायुष्मान्सौभगश्च वै ॥ धृतिर्वृद्धिध्रुवौ हर्षः सुखसाध्या इमे स्मृताः ॥ ८ ॥ सिद्धि, शुक, शुभ, प्रीति, आयुष्मान्, सौभाग्य, धृति, वृद्धि, ध्रुव, हर्ष ये योग सुख- साध्य कहे हैं ॥ ८ ॥ अथ विशेष वर्णन । मघा विशाखा भरणी तथाऽर्द्रा मूलं तथा कृत्तिकहस्तपुष्याः॥ एते न शस्ता मुनयो वदंति वारक्रमेणैव विचिन्तनीयाः ॥ ९ ॥ मघा, विशाखा, भरणी, आर्द्रा, मूल, कृत्तिका, हस्त, पुष्य ये रोगकी उत्पत्तिमें श्रेष्ठ नहीं हैं। ये सब वारके क्रमसे चिंतवन करने चाहिये ॥ ९ ॥ अथ असाध्य नक्षत्र । मघाभरणिहस्तेषु मूले वा ज्वरितोऽपि वा ॥ मृत्युमापद्यते सोऽपि नात्र कार्या विचारणा ॥ १० ॥ मघा, भरणी, हस्त, मूल इन नक्षत्रोंमें ज्वरित हुआ मनुष्य मर जाता है इसमें विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं ॥ १० ॥ अथ साध्य नक्षत्र । अश्विनीरोहिणीपुष्यमृगज्येष्ठाः पुनर्वसुः ॥ एते साध्याश्च विज्ञेया ज्वरिणां च विशेषतः ॥ ११ ॥ अश्विनी, रोहिणी, पुष्य, मृगशिर, ज्येष्ठा, पुनर्वसु, इन नक्षत्रोंमें हुआ रोग साध्य कहा है और इनमें उपजा ज्वर विशेष करके साध्य है ॥ ११ ॥ अथ कष्टसाध्य नक्षत्र । पूर्वात्रयं स्वातिरथापि चित्रा तथा त्रयार्द्राश्रवणाधनिष्ठाः॥मूलं विशाखा सह कृत्तिकाभिः साप्योऽनुराधा सह ज्येष्ठया च ॥ १२ ॥ एते सकष्टा रुजपीडितानां पुष्ये सुयाप्यः कुरुते नरस्य ॥ तस्मात्तु विज्ञाय बुधाश्च सम्यग्युजां विनाशं प्रति- कर्मणा च ॥ १३ ॥ तीनों पूर्वा, स्वाती, चित्रा, आर्द्रा, पुनर्वसु,पुष्य, श्रवण, धनिष्ठा, मूल, विशाखा, कृत्तिका १०

( १४६ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने- आश्लेषा, अनुराधा, ज्येष्ठा ॥ १२ ॥ इनमें उपजा रोग कष्टको देता है और इनमेंसे पुष्य नक्षत्रमें उपजा रोग कष्टसाध्य कहा है इसकारणसे जानकर चिकित्सासे रोगको दूर करना ॥१३॥ अथ नक्षत्रोंके पीडाकी मर्यादा । अश्विन्याञ्चैकरात्रन्तु भरण्यां मृत्युमीक्षते ॥ नवरात्रं कृत्तिकायां रोहिण्यांतु दिनत्रयम् ॥१४॥ मृगेण बहुपीडा स्यादार्द्रायां मृत्यु- रेव च॥पुनर्वसौ च पुष्ये च सप्तरात्रं तु पीड्यते ॥१५॥ नवरात्रं तथाश्लेषा मघा चेति यमालयम्॥पूर्वा मासत्रयं ज्ञेयमुत्तरा पञ्च- कत्रयम् ॥१६॥ पूर्वात्रये त्रयोंऽशाश्च शुभा ज्ञेया मनीषिभिः ॥ एतेषां तुर्य्यगे चान्ते यदि रोगस्तदा मृतिः ॥ १७ ॥ हस्तेन प्राप्यते सौख्यं चित्रा पञ्चदशाहकम् ॥ स्वातिः षोडशरात्रन्तु विशाखा विंशरात्रकम् ॥ १८ ॥ अनुराधा पक्षमेकं ज्येष्ठा दश- दिनानि तु ॥मूलेन मृत्युमाप्नोति आषाढासु त्रिपञ्चकम्॥१९॥ उत्तरा विंशरात्रेण श्रवणे मासकद्वयम् ॥ मासद्वयं धनिष्ठा स्या- च्छतर्क्षे दिनविंशतिः ॥२० ॥ नवरात्रं भवेत्पूर्वा उत्तरा पञ्चकत्र- यम् ॥ दशाहं रेवती पीडा मुच्यते व्याधिभिस्ततः ॥ २१ ॥ अश्विनीमें रोग उपजे तौ एकरात्रिमैं आराम हो, भरणीमें रोग उपजे तो रोगी मर जाता है कृत्तिकामें रोग उपजे तो नवरात्रोंमें आराम होता है, रोहिणीमें रोग उपजे तो तीन दिनोंमें आराम होता है ॥ १४ ॥ मृगशिरमें रोग उपजे तो बहुतसी पीडा रहती है, आर्द्राामें रोग उपजै तो रोगी मर जाता है, पुनर्वसु और पुष्यमें रोग उपजे तो सातरात्रितक पीड़ा रहती है ॥ १५ ॥ आश्लेषामें रोग उपजे तो नवरात्रितक पीडा रहती है, मघामें रोग हो तो रोगी मर जाता है, पूर्वाफाल्गुनीमें रोग हो तो तीन महीनोंतक पीडा रहती है, उत्तराफाल्गुनीमें रोग हो तो पंद्रह दिनोंतक पीड़ा रहती है ॥ १६ ॥ और तीनों पूर्वा अर्थात् पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ, पूर्वाभाद्रपद इनके पहले तीनभाग शुभ हैं और अंतका एक भाग बुरा है उसमें रोग हो तो रोगी मर जाता है ॥ १७ ॥ हस्तमें रोग हो तो शीघ्र आराम होजाता है, चित्रामें रोग हो तो पन्द्रह दिनोंमें आराम हो जाता है, स्वातीमें रोग हो तो सोलहरात्रमें सुख होजाता है, विशाखामें रोग हो तो बीसरात्रिमें आराम होजाता है ॥ १८ ॥ अनुराधांमें रोग हो तो पन्दरह दिनमें आराम होता है, ज्येष्ठा में रोग हो तो दशदिनमें आराम होजाता है, मूलमें रोग हो तो रोगी मरजाता है, पूर्वाषाढमें रोग हो तो पन्दरह दिनमें आराम होता है ॥१९॥ उत्तराषाढमें रोग उपजे तो बीस रात्रिमें आराम होता है,श्रवणमें रोग उपजे तो दो महीनोंमें आराम होता है

अं० १ ] भाषाटीकासमेता । ( १४७ ) धनिष्ठा में रोग उपजे तो दो महीनोंमें आराम होता है, शतभिषामें रोग उपजे तो बीस दिनोंमें आराम होता है ॥ २० ॥ पूर्वाभाद्रपदमें रोग उपजे तो नव रात्रिमें आराम होता है, उत्तरां भाद्रपदमें रोग उपजे तो पन्दरह दिनोंमें आराम होता है, रेवतीमें रोग उपजे तो दश दिनमें आराम होता है। ऐसे रोगकी निवृत्ति कही है ॥ २१ ॥ अथ नक्षत्रोंके भागानुसार रोगोंकी मर्यादा । कृत्तिका नक्षत्र । कृत्तिकासु ज्वरस्तीव्रो व्याधिर्भवति पैत्तिकः ॥ दिनानि दश प्रथमे चरणे च विनिर्दिशेत् ॥ २२ ॥ दशैव द्वितीये भागे तृतीये दिनपञ्चकम् ॥ कृत्तिका नक्षत्रमें दारुण ज्वर और पित्तकी व्याधि उपजती है और कृत्तिकाके प्रथम भागमें रोग उपजे तो दशदिन पीड़ा रहती है ॥ २२ ॥ और दूसरे भागमें रोग उपजे तो भी दश दिन पीड़ा रहती है और तीसरे भागमें रोग उपजे तो पांच दिन पीड़ा रहती है ॥ अथ रोहिणी नक्षत्र । रोहिण्यां नवरात्रन्तु प्रथमेंडशे प्रकीर्त्तितम् ॥ २३ ॥ द्वितीये द्विगुणं प्रोक्तं तृतीये दशरात्रकम् ॥ रोहिणीके प्रथम भागमें रोग उपजे तो नव रात्रि पीड़ा रहती है ॥२३॥ और दूसरे भागमें अठारह दिन और तीसरे भागमें दशदिन पीड़ा रहती है ॥ अथ मृग नक्षत्र । नक्षत्रे चन्द्रदैवत्ये पीडा वै जायते ध्रुवम् ॥ २४ ॥ प्रथमांशे पञ्चरात्रं मध्ये द्वादशवासरान् ॥ तृतीयांशे तथा ज्ञेयं मृत्यु- र्मासादनन्तरम् ॥ २५ ॥ मृगशिरके प्रथमभागमें रोग उपजे तो पांच रात्रि पीड़ा रहती है ॥ २४ ॥ और दूसरे भागमें बारह दिन और तीसरे मागमें १ महीनातक पीड़ा रहके पीछे मृत्यु हो जाती है॥२५॥ अथ आर्द्रा नक्षत्र । नक्षत्रे रुद्रदैवत्ये पक्षं स्यात्प्रथमेंडशके ॥ द्वादशाहं द्वितीये च तृतीयांशे न जीवति ॥ २६ ॥ आर्द्रा नक्षत्रके प्रथम अंशमें रोग उपजे तो वह रोग एक पखवाड़ेतक रहता है, दूसरे अंशमें हुई व्याधि बारह दिनतक रहती है. तीसरे अंशमें रोग उत्पन्न हुआ हो तो वह मनुष्य जीता नहीं ॥ २६ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

( १४८ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने- अथ पुनर्वसु नक्षत्र । पुनर्वसौ ज्वरं विद्यात्प्रथमांशे त्रिपक्षकम् ॥ मध्यमे दिवसान्सप्त तृतीये पंचविंशतिम् ॥ २७ ॥ पुनर्वसु नक्षत्रके प्रथम अंशमें आया हुआ ज्वर तीन पखवाडेतक रहता है, दूसरे अंशमें सात दिन रहता है और तीसरे अंशमें आया हुआ ज्वर पच्चीस दिनतक रहता है ॥ २७ ॥ अथ पुष्य नक्षत्र । पुष्ये स्यात्प्रथमे सप्त द्विके विंशतिवासरान् ॥ तृतीयांशे तथा विद्याद्दिवसानेकविंशतिम् ॥ २८ ॥ पुष्य नक्षत्रके प्रथम अंशमें आया हुआ रोग सातदिनतक रहता है, दूसरे अंशमें बीस दिनतक रहता है और तीसरे अंशमें इक्कीस दिनतक रहता है ॥ २८ ॥ अथ आश्लेषा नक्षत्र । आश्लेषायां च नक्षत्रे यस्य संभवति ज्वरः ॥ मासत्रयेण प्रागंशे कष्टाज्जीवति मानवः ॥ २९ ॥ द्वितीये च तृतीये च मृत्युरेव न संशयः ॥ जिस मनुष्यके आश्लेषानक्षत्रमें ज्वर उत्पन्न होता है उसको प्रथम अंशमें ज्वर उत्पन्न होनेसे वह मनुष्य बड़े कष्टसे जीता है ॥ २९ ॥ और दूसरे तथा तीसरे अंशमें ज्वर उत्पन्न होनेसे उस मनुष्यको मृत्यु ही प्राप्त होती है, इसमें संशय नहीं ॥ अथ मघा नक्षत्र । नक्षत्रे पितृदैवत्ये रोगो यस्य प्रवर्तते ॥ ३० ॥ प्रथमेंऽश सप्तरात्रं द्वितीये धिष्ण्यतुल्यताम्॥ विंशत्तृतीये दिवसान्पीड्यते कर्मणो बलात् ॥ ३१ ॥ मघा नक्षत्रमें जिस मनुष्यको रोग उत्पन्न होता है ॥ ३० ॥ उसका रोग प्रथम अंशमें सातरात्रितक रहता है, दूसरे अंशमें उत्पन्न होवे तो दश दिन रोग बना ही रहता है और तीसरे अंशमें होवे तौ वह मनुष्य अपने कर्मके बलसे बीस दिन तक बहुत पीड़ाको प्राप्त होता है ॥ ३१ ॥ अथ पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र । नक्षत्रे भगदैवत्ये यस्य संजायते ज्वरः ॥३२॥ प्रथमेंऽशे पंच- रात्रं मध्ये द्वादश वासरान्॥ तृतीयांशे तथा ज्ञेयं मृत्युर्मा- सादनंतरम् ॥ ३३ ॥

अ० ६] भाषाटीकासमेता । ( १४९ ) पूर्वाफाल्गुनीनक्षत्रमें जिसको ज्वर उत्पन्न होवे ॥ ३२ ॥ उस मनुष्यका ज्वर प्रथम अंशमें पांच रात्रितक रहता है, दूसरे अंशमें बारह दिनतक रहता है और तीसरे अंशमें ज्वर उत्पन्न होवे, उस मनुष्यका एक महीनेके पीछे मृत्यु होगा ऐसा जानना ॥ ३३ ॥ अथ उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र । उत्तराया आद्यभागे वासराणि चतुर्दश ॥ द्वितीये सप्तरात्रन्तु तृतीये दिवसा नव ॥ ३४ ॥ उत्तराके प्रथमभागमें रोग उपजे तो चौदह दिन पीड़ा रहती है और दूसरे भागमें सात रात्रि और तीसरे भागमें नव दिन पीड़ा रहती है ॥ ३४ ॥ अथ हस्त नक्षत्र । यदि हस्ते भवेद्रोगः प्रथमे सप्तरात्रकम् ॥ चत्वार्यहानि द्वितीये तृतीये दिनपञ्चकम् ॥ ३५ ॥ हस्तके प्रथमभागमें रोग उपजे तो सात रात्री पीड़ा रहती है और दूसरे भागमें चार दिन और तीसरे भागमें पांच दिन पीड़ा रहती है ॥ ३५ ॥ अथ चित्रा नक्षत्र । मृत्युं विद्यात्तथा पूर्वे त्वाष्ट्रो यस्य भवेज्ज्वरः॥ त्रिभिर्मासैर्द्विती- यांशे रोगो भवति दारुणः ॥ ३६ ॥ तृतीयांशे तथा ज्ञेयं वासराणि त्रयोदश ॥ चित्राके प्रथम भागमें जिसके ज्वर उपजे उसका मृत्यु होजाता है और दूसरे भागमें रोग दारुणरूपी होके तीन महीनोंमें दूर होता है ॥ ३६ ॥ और तीसरे भागमें तेरह दिन पीड़ा रहती है ॥ अथ स्वाती नक्षत्र । वायव्ये प्राक् सप्तदश द्वितीये चैकविंशतिः॥ ३७ ॥अस्यैव तु तृतीयांशे मृत्युमेव विनिर्दिशेत् ॥ ३८ ॥ स्वातीके प्रथम भागमें रोग उपजे तो सत्रह दिन पीड़ा रहती है और दूसरे भागमें रोग उपजे तो इक्कीस दिन पीड़ा रहती है ॥ ३७ ॥ और तीसरे भागमें रोग उपजे तो मृत्युही जानना ॥ ३८ ॥ अथ विशाखा नक्षत्र । प्रथमांशे विशाखायां त्रिगुणाः षोडश स्मृताः ॥ द्वितीये द्वादश प्रोक्तास्तृतीयेऽपि तथैव च ॥३९॥

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( १५० ) हारीतसंहिता। [ द्वितीयस्थाने-] विशाखाके प्रथम भागमें रोग उपजे तो अडतालीस ४८ दिन पीड़ा रहती है और दूसरे भागमें रोग उपजे तो बारह दिन पीड़ा रहती है और तीसरे भागमें रोग उपजे तो भी बारह दिन पीड़ा रहती है ॥ ३९ ॥ अथ अनुराधा नक्षत्र। मैत्रांशे प्रथमे सप्त द्वितीये पक्षमादिशेत् ॥ तृतीयांशे चतुःषष्टिर्वासराणां महामुने ॥ ४० ॥ अनुराधाके प्रथम भागमें रोग उपजे तो सात दिन पीड़ा रहती है और दूसरे भागमें रोग उपजे तो पंद्रह दिन पीड़ा रहती है और तीसरे भागमें पीड़ा उपजै तो हे महामुने ! चौसठ ६४ दिन पीड़ा रहती है ॥ ४० ॥ अथ ज्येष्ठा नक्षत्र। त्रिपक्षमैन्द्रे प्रथमे द्वित्रिभागे च षोडश ॥४१ ॥ ज्येष्ठाके प्रथम भागमें रोग उपजे तो ४५ दिन पीड़ा रहती है, द्वितीय और तृतीय इन भागोंमें रोग उपजे तो सोलह दिन पीड़ा रहती है ॥ ४१ ॥ अथ मूल नक्षत्र। मूलेऽशे तृतीये ज्ञेयः पक्ष एव मनीषिभिः ॥ आद्ये पूर्वत्रयो मासा मध्यमेऽहानि षोडश ॥ ४२ ॥ और मूलके तीसरे भागमें रोग उपजे तो पंद्रह दिन पीड़ा रहती है और मूलके प्रथम भागमें रोग उपजे तो तीन महीने पीड़ा रहती है और मूलके दूसरे भागमें रोग उपजे तो सोलह दिन पीड़ा रहती है ॥ ४२ ॥ अथ पूर्वा नक्षत्र। पूर्वांशे द्वितये ज्ञेयः पक्ष एव मनीषिभिः॥ तृतीयांशे पुनर्मृत्युर्तीरात्रात्प्रजायते ॥४३॥ पूर्वाषाढके प्रथम और द्वितीयभागमें रोग उपजे तो पंदरह दिन पीड़ा रहती है और तीसरे भागमें रोग उपजे तो रोगी मर जाता है ॥ ४३ ॥ अथ उत्तराषाढा नक्षत्र। विश्वेशे प्रथमे पक्षे मध्ये द्वादशरात्रिकम् ॥ दिनानां विंशतिः प्रोक्ता तृतीयांशे महामुने ॥ ४४ ॥ उत्तराषाढाके प्रथम और द्वितीयभागमें रोग उपजे तो बारह रात्रि पीड़ा रहती है, हे महा- मुने ! उत्तराषाढाके तीसरे भागमें रोग उपजे तो २० दिन पीड़ा रहती है ॥ ४४ ॥

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अ० ६] भाषाटीकासमेता । (१५१) अथ श्रवण नक्षत्र । सप्ताहमादौ श्रवणे विंशतिर्मध्यमे मता ॥ षोडशाहं तृतीयांशे सत्यमेतद्रवीम्यहम् ॥ ४५ ॥ श्रवणके प्रथमभागमें रोग उपजे तो सात दिन पीडा रहती है और द्वितीयभागमें रोग उपजे तो बीसदिन पीडा रहती है और तीसरे भागमें रोग उपजे तो सोलह दिन पीडा रहती है यह मैं सत्य कहता हूं ॥ ४५ ॥ अथ धनिष्ठा नक्षत्र । विंशतिर्वासवे पूर्वं मध्यमे मासयुग्मकम् ॥ मासस्तृतीये विज्ञेयो दैवज्ञैश्च निवेदितम् ॥ ४६ ॥ धनिष्ठाके प्रथमभागमें रोग उपजे तो बीस दिन पीडा रहती है और दूसरे भागमें रोग उपजे तो दो महीने पीडा रहती है और तीसरे भागमें रोग उपजे तो एक महीना पीडा रहती है ऐसा ज्योतिषियोंने कहा है ॥ ४६ ॥ अथ पूर्वाभाद्रपदा नक्षत्र । वारुणे दारुणो रोगस्त्रिपक्षं प्रथमांशके ॥ द्वितीये मासषट्कं तु षोडशाहं तृतीयके ॥ ४७ ॥ पूर्वाभाद्रपदाके प्रथमभागमें दारुण रोग उपजे तो पैंतालिस दिन पीडा रहती है और दूसरे भागमें रोग उपजे तो छःमहीने और तीसरे भागमें रोग उपजे तो सोलह दिन पीडा रहती है ॥ ४७ ॥ अथ उत्तराभाद्रपदा नक्षत्र । अहिर्बुध्न्ये पक्षमादौ मध्ये मासं विनिर्दिशेत् ॥ अन्तेऽष्टाविंशतिर्ज्ञेया पीडा स्यात्पापकर्मणि ॥ ४८ ॥ उत्तराभाद्रपदाके प्रथमभागमें रोग उपजे तो पंदरह दिन पीडा रहती है और दूसरे भागमें रोग उपजे तो एक महीना पीडा रहती है और तीसरे भागमें रोग उपजे तो अट्ठाईस दिन पीडा रहती है ॥ ४८ ॥ अथ रेवती नक्षत्र । रेवत्याः प्रथमे चाष्टौ द्विभागे तु च षोडश ॥ अन्ते त्रिंशद्दिनान्येवं प्रोक्तानि पूर्वसूरिभिः ॥ ४९ ॥ रेवतीके प्रथमभागमें रोग उपजे तो आठ दिन पीडा रहती है और दूसरे भागमें सोलह दिन पीडा रहती है और तीसरे भागमें तीस दिन पीडा रहती है ॥ ४९ ॥

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( १५२ ) हारीतसंहिता । [द्वितीयस्थाने- अथ अश्विनी नक्षत्र । अश्विन्याः प्रथमे भागे दिनमेकं प्रकीर्तितम्॥ द्वितीये पञ्चरात्रन्तु तृतीये सप्तकं तथा ॥ ६० ॥ अश्विनीके प्रथम भागमें एक दिन पीडा रहती है और दूसरे भागमें पंचरात्रि और तीसरे भागमें सात रात्रि पीडा रहती है ॥ ६० ॥ अथ भरणी नक्षत्र । भरण्याः प्रथमे चांशे सप्तवासरमेव च ॥ मध्ये मृत्युस्तथा चान्त रोगो मासत्रयावधि॥ ६१ ॥ भरणीके प्रथमभागमें सातदिन पीडा रहती है और दूसरे भागमें मृत्यु और तीसरे भागमें तीन महीने पीडा रहती है ॥ ६१ ॥ अथ नक्षत्रारिष्टोंका उपसंहार । एवं ज्ञात्वा सुधीः सम्यक्कुर्य्यात्प्रशमनक्रियाम्।नक्षत्रस्य त्रयो भागा आत्रेयेण प्रकाशिताः॥६२॥ इति आत्रेयभाषिते हारी- तोत्तरे द्वितीयस्थाने नक्षत्रज्ञानं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ ऐसे जानके कुशल वैद्य रोगको शांत करनेकी क्रियाको करे,नक्षत्रोंके तीन भाग आत्रेयजीने प्रकाशित किये हैं ॥ ६२ ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारी- तसंहिताभाषाटीकायां द्वितीयस्थाने नक्षत्रज्ञानं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ सप्तमोऽध्यायः ७. अथ होमकी विधि । आत्रेय उवाच ॥ अर्कः खदिरपालाशबदर्य्यः पारिभद्रकः ॥ दूर्वा शमी कुशः काशः पिप्पलो वटभूरुहः ॥१॥ जम्ब्वार्म्रो कर- हाटश्च सोमवृक्षः कलिद्रुमः ॥ रक्तसारश्चन्दनश्च जयन्ती गुरु- वृक्षकम् ॥ २ ॥ सहचरी सितावर्षा सर्व्वौषधिनिशायुगम् ॥ समिद्वर्गः समस्तोऽपि समिद्धोमः प्रकाशितः ॥ ३ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-आक, खैर, पलाश, बेरी, पारिभद्र, दूर्व, छींकुर, कुशा, कास, पीपलवृक्ष, वड़वृक्ष, ॥ १ ॥ जामुनवृक्ष, आम्रवृक्ष, पद्मकंद, श्वेतखैर, बहेडा, लाल खैर, चन्दन,

अ० ७] भाषाटीकासमेता । ( १५३ ) अरनी, सीसमवृक्ष ॥ २ ॥ पीला कुरंटा, सफेद सांठी, सर्वौषधी, अर्थात् कूट, छलीरा, हल्दी, वच, लोबान, मुरामांसी, चन्दन, कपूर, नागरमोथा और हल्दी, दारुहलदी यह समिद्वर्ग है, इससे समिद्धोम होता है ॥ ३ ॥ अथ शांतिप्रकार । चन्दनं रक्तचन्दनं गोरोचना हरिद्रा गैरिकनिम्बबिल्वं कदम्बं कुंकुममिश्रितकस्तूरिका घनसारं श्रीपर्णं सुरदारु हरिचन्दनं पद्मंकं हरिद्राद्वयं कालीयकागुरुशिंशपा रक्तगोरोचना पलाश इति गन्धानि, पद्मबिल्वसूरसादुर्वाकुशजयन्ती शमीपत्रार्क- किंशुककर्णिकारगिरिकर्णिकासहचरालूषपुष्पाणि, जम्बाम्रपल्ल- वानि काञ्चनारपाटलवर्वरी अगस्तिः काककाहारी अशोकपु- ष्पमिति धूपदीपादिभिरलङ्कारैरलङ्कृतं वास्तुमण्डलं कृत्वा ईशा- नदिक्क्रमेण नक्षत्रमण्डलं चार्चयेत् ॥ तन्मण्डलकमध्ये आदि- त्यादीन् ग्रहान् सम्भ्यर्च्य क्रमेण समिद्भिर्होमं कुर्य्यात्॥तस्मा- त्पुनर्दधिमधुघृताक्ताभिः समिद्भिरश्विन्यादिक्रमेण जुहुयात् ॥ आकृष्णेति अर्कसमिद्भिरिदम् अश्विन्त्यै विष्णोरराटमसीतिपला- शेन इदं भरण्यै मधुमाध्वीति बदरीसमिद्भिरिदंकृत्तिकायै काण्डा- त्काण्डेति पारिभद्रकपूर्वकशसमिद्भिः रोहिणीमृगशिरःपुनर्व- स्वादीन् काण्डेति होमयेत् ॥ इदं देव इति पिप्पलसमिद्भिरिदं पुष्याय सप्तत्यग्रिमन्त्रेण चूतसमिद्भिरिदं सापर्यै अग्निमूर्द्धादि- व इति जम्बू समिद्भिर्मघां होमयेत् ॥ सद्योजाताभिः करहाटकस- मित्पूर्वसमिद्भिर्होमयेत् ॥ तत्पुरुषाय विद्महे इति सोमवल्ली- समिद्भिरुत्तरात्रयं, नमो घोराय विभीतकसमिद्भिर्हस्तं होमयेत् ॥ नमो ज्योतिष्पतये रक्तसारसमिद्भिश्चित्रां होमयेत् ॥ नमो देवाय नमो ज्येष्टायेति चन्दनसमिद्भिः स्वात्यै होमं कुर्य्यात् ॥ उदुम्बरजयन्तीसमिद्भिर्विशाखां होमयेत् ॥ बृहते इति यडुपतये गुरुवृक्षकसमिद्भिरनुराधां होमयेत् ॥ एतज्ज्योतिः