हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 171, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ४ ] भाषाटीकासमेता । ( १३९ ) बहुत दिनोंसे बढ़े हुए रोगवाला और भोजनको नहीं करनेवाला और भग्न हुए अंगोंको देख- नेवाला और औषधको नहीं लेनेवाला ऐसे रोगीको जानकर उपचार करना ॥ २९ ॥ अथ उदररोगका अरिष्ट । विध्वंसश्वासशोफाच्च तथा ज्वरनिपीडनात् ॥ गम्भीरं सघनं तस्य तदुरः क्षयते नरम् ॥ ३० ॥ विष्ठाके क्षयसे, श्वास और शोजासे तथा ज्वरकी पीड़ासे गंभीर और कठिन हुई छाती उसको मार देती है ॥ ३० ॥ अथ गुल्मरोगका अरिष्ट । श्वासशूलपिपासार्त्तिर्विद्वेषो ग्रन्थिगूढता ॥ दुर्बलत्वं च भवति गुल्मिनो मृत्युमेष्यतः॥ ३१ ॥ श्वास, शूल, अत्यंत तृषा ये उपजें और अन्नमें वैर रहे और गाढ़ तथा मूढ़पना हो और दुर्ब- लपना हो ऐसा गुल्मरोगी मर जाता है ॥ ३१ ॥ अथ रक्तपित्तका अरिष्ट । नेत्रे जिह्वाधरौ यस्य रक्तौ वा रुधिरं वमेत् ॥ रक्तमूत्री रक्तसारी रक्तपित्ती विनश्यति ॥ ३२ ॥ लोहितं छर्दयेद्यस्तु बहुशो लो- हितेक्षणः ॥ रक्तानां च दिशां द्रष्टा रक्तपित्ती विनश्यति ॥ ३३॥ जिसके जीभ, दोनों ओष्ठ, नेत्र ये लाल हो जावें अथवा रक्तको गिरावै ऐसा रक्तमूत्रवाला और रक्तातीसारवाला और रक्तपित्तवाला मनुष्य मरजाता है ॥ ३२ ॥ जो लोहूकी छर्दि करे और बहुत करके लाल नेत्रोंवाला हो और लाल दिशाओंको देखें ऐसा रक्तपित्तरोगी मरजाता है ॥ ३३ ॥ अथ बवासीररोगका अरिष्ट । मुखशोफो भवेद्यस्य भ्रमारोचकपीडितः ॥ विबन्धोदरशूली च उदयाञ्च विनश्यति ॥ ३४ ॥ जिसके मुखपर शोजा हो, भ्रम और अरुचिसे जो पीड़ित हो,बंधा और उदरशूलसे संयुक्त हो ऐसा रोगी मर जाता है ॥ ३४ ॥ अथ विद्रधिरोगका अरिष्ट । आध्मानबद्धनिष्पन्दं छर्दिहिकारुगन्वितम् ॥ रुजाश्वाससमाविष्टं विद्रधिर्नाशयेन्नरम् ॥ ३५ ॥