हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 172, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( १४० ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने- जो अफारा हो, स्राव रुक जावे और छर्दि, हिचकी, शूल, इनसे समन्वित हो और श्वास- रोगसे संयुक्त हो ऐसे मनुष्यको विद्रधिरोग नाशता है ॥ ३५ ॥ अथ भ्रमरोगका अरिष्ट । यस्य तृष्णा भवेद्घोरा दाहो वापि वमिर्भवेत् ॥ भ्रमोपपन्नो भवति न स जीवति मानवः ॥ ३६ ॥ जिसके दारुण तृषा और दाह तथा छर्दि उपजे और भ्रमसे संपन्न हो वह रोगी जीवता नहीं है ॥ ३६ ॥ अथ आर्तवका अरिष्ट । अपूर्णे दिवसे नारी ज्वरार्त्ता पुष्पमाप्नुयात् ॥ सा न जीवेन्महाप्राज्ञ यस्या हि सारणो भवेत् ॥ ३७ ॥ जो ज्वरसे पीडित हुई नारी नहीं पूर्ण हुए दिनमें पुष्प अर्थात् योनिसे रक्तके बहनेको प्राप्त होवे हे महाप्राज्ञ ! जो वह रक्त गिरता ही रहे तो वह नारी जीवे नहीं ॥ ३७ ॥ अथ कामला और पांडुरोगका अरिष्ट । यः शोफश्वाससंयुक्तस्तृष्णायुक्तोऽथ शूलवान् ॥ कामलापाण्डुरोगात्तो नरश्च स विपद्यते ॥ ३८ ॥ जो शोजा और श्वाससे पीडित हो, तृषा और शूलसे संयुक्त हो, कामला और पांडुरोगसे संयुक्त हो वह मनुष्य जीवता नहीं है ॥ ३८ ॥ अथ भगंदरका अरिष्ट । वातमूत्रपुरीषाणि कृमयः शुक्रमेव च ॥ भगन्दरात्प्रस्रवन्ति यस्य तं परिवर्जयेत् ॥ ३९ ॥ जिसके भगंदरके घावसे अधोवात, मूत्र, विष्ठा, कीड़े वीर्य ये गिरते हों उस रोगीको असाध्य जानो ॥ ३९ ॥ अथ अश्मरीरोगका अरिष्ट । प्रसूननाभिवृषणं रुद्धमूत्रं रुगन्वितम् ॥ अश्मरी क्षपयत्याशु सिकताशर्करान्विता ॥ ४० ॥ नाभि और पोतोंपर शोजासे संयुक्त हो, मूत्र रुक जावे, शूल चले ऐसे मनुष्यको पथरी, सिकता, शर्करा ये रोग मार देते हैं ॥ ४० ॥