भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 178, कुल 548 में से

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पृष्ठ 178

( १४६ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने- आश्लेषा, अनुराधा, ज्येष्ठा ॥ १२ ॥ इनमें उपजा रोग कष्टको देता है और इनमेंसे पुष्य नक्षत्रमें उपजा रोग कष्टसाध्य कहा है इसकारणसे जानकर चिकित्सासे रोगको दूर करना ॥१३॥ अथ नक्षत्रोंके पीडाकी मर्यादा । अश्विन्याञ्चैकरात्रन्तु भरण्यां मृत्युमीक्षते ॥ नवरात्रं कृत्तिकायां रोहिण्यांतु दिनत्रयम् ॥१४॥ मृगेण बहुपीडा स्यादार्द्रायां मृत्यु- रेव च॥पुनर्वसौ च पुष्ये च सप्तरात्रं तु पीड्यते ॥१५॥ नवरात्रं तथाश्लेषा मघा चेति यमालयम्॥पूर्वा मासत्रयं ज्ञेयमुत्तरा पञ्च- कत्रयम् ॥१६॥ पूर्वात्रये त्रयोंऽशाश्च शुभा ज्ञेया मनीषिभिः ॥ एतेषां तुर्य्यगे चान्ते यदि रोगस्तदा मृतिः ॥ १७ ॥ हस्तेन प्राप्यते सौख्यं चित्रा पञ्चदशाहकम् ॥ स्वातिः षोडशरात्रन्तु विशाखा विंशरात्रकम् ॥ १८ ॥ अनुराधा पक्षमेकं ज्येष्ठा दश- दिनानि तु ॥मूलेन मृत्युमाप्नोति आषाढासु त्रिपञ्चकम्॥१९॥ उत्तरा विंशरात्रेण श्रवणे मासकद्वयम् ॥ मासद्वयं धनिष्ठा स्या- च्छतर्क्षे दिनविंशतिः ॥२० ॥ नवरात्रं भवेत्पूर्वा उत्तरा पञ्चकत्र- यम् ॥ दशाहं रेवती पीडा मुच्यते व्याधिभिस्ततः ॥ २१ ॥ अश्विनीमें रोग उपजे तौ एकरात्रिमैं आराम हो, भरणीमें रोग उपजे तो रोगी मर जाता है कृत्तिकामें रोग उपजे तो नवरात्रोंमें आराम होता है, रोहिणीमें रोग उपजे तो तीन दिनोंमें आराम होता है ॥ १४ ॥ मृगशिरमें रोग उपजे तो बहुतसी पीडा रहती है, आर्द्राामें रोग उपजै तो रोगी मर जाता है, पुनर्वसु और पुष्यमें रोग उपजे तो सातरात्रितक पीड़ा रहती है ॥ १५ ॥ आश्लेषामें रोग उपजे तो नवरात्रितक पीडा रहती है, मघामें रोग हो तो रोगी मर जाता है, पूर्वाफाल्गुनीमें रोग हो तो तीन महीनोंतक पीडा रहती है, उत्तराफाल्गुनीमें रोग हो तो पंद्रह दिनोंतक पीड़ा रहती है ॥ १६ ॥ और तीनों पूर्वा अर्थात् पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ, पूर्वाभाद्रपद इनके पहले तीनभाग शुभ हैं और अंतका एक भाग बुरा है उसमें रोग हो तो रोगी मर जाता है ॥ १७ ॥ हस्तमें रोग हो तो शीघ्र आराम होजाता है, चित्रामें रोग हो तो पन्द्रह दिनोंमें आराम हो जाता है, स्वातीमें रोग हो तो सोलहरात्रमें सुख होजाता है, विशाखामें रोग हो तो बीसरात्रिमें आराम होजाता है ॥ १८ ॥ अनुराधांमें रोग हो तो पन्दरह दिनमें आराम होता है, ज्येष्ठा में रोग हो तो दशदिनमें आराम होजाता है, मूलमें रोग हो तो रोगी मरजाता है, पूर्वाषाढमें रोग हो तो पन्दरह दिनमें आराम होता है ॥१९॥ उत्तराषाढमें रोग उपजे तो बीस रात्रिमें आराम होता है,श्रवणमें रोग उपजे तो दो महीनोंमें आराम होता है

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