भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अं० १ ] भाषाटीकासमेता । ( १४७ ) धनिष्ठा में रोग उपजे तो दो महीनोंमें आराम होता है, शतभिषामें रोग उपजे तो बीस दिनोंमें आराम होता है ॥ २० ॥ पूर्वाभाद्रपदमें रोग उपजे तो नव रात्रिमें आराम होता है, उत्तरां भाद्रपदमें रोग उपजे तो पन्दरह दिनोंमें आराम होता है, रेवतीमें रोग उपजे तो दश दिनमें आराम होता है। ऐसे रोगकी निवृत्ति कही है ॥ २१ ॥ अथ नक्षत्रोंके भागानुसार रोगोंकी मर्यादा । कृत्तिका नक्षत्र । कृत्तिकासु ज्वरस्तीव्रो व्याधिर्भवति पैत्तिकः ॥ दिनानि दश प्रथमे चरणे च विनिर्दिशेत् ॥ २२ ॥ दशैव द्वितीये भागे तृतीये दिनपञ्चकम् ॥ कृत्तिका नक्षत्रमें दारुण ज्वर और पित्तकी व्याधि उपजती है और कृत्तिकाके प्रथम भागमें रोग उपजे तो दशदिन पीड़ा रहती है ॥ २२ ॥ और दूसरे भागमें रोग उपजे तो भी दश दिन पीड़ा रहती है और तीसरे भागमें रोग उपजे तो पांच दिन पीड़ा रहती है ॥ अथ रोहिणी नक्षत्र । रोहिण्यां नवरात्रन्तु प्रथमेंडशे प्रकीर्त्तितम् ॥ २३ ॥ द्वितीये द्विगुणं प्रोक्तं तृतीये दशरात्रकम् ॥ रोहिणीके प्रथम भागमें रोग उपजे तो नव रात्रि पीड़ा रहती है ॥२३॥ और दूसरे भागमें अठारह दिन और तीसरे भागमें दशदिन पीड़ा रहती है ॥ अथ मृग नक्षत्र । नक्षत्रे चन्द्रदैवत्ये पीडा वै जायते ध्रुवम् ॥ २४ ॥ प्रथमांशे पञ्चरात्रं मध्ये द्वादशवासरान् ॥ तृतीयांशे तथा ज्ञेयं मृत्यु- र्मासादनन्तरम् ॥ २५ ॥ मृगशिरके प्रथमभागमें रोग उपजे तो पांच रात्रि पीड़ा रहती है ॥ २४ ॥ और दूसरे भागमें बारह दिन और तीसरे मागमें १ महीनातक पीड़ा रहके पीछे मृत्यु हो जाती है॥२५॥ अथ आर्द्रा नक्षत्र । नक्षत्रे रुद्रदैवत्ये पक्षं स्यात्प्रथमेंडशके ॥ द्वादशाहं द्वितीये च तृतीयांशे न जीवति ॥ २६ ॥ आर्द्रा नक्षत्रके प्रथम अंशमें रोग उपजे तो वह रोग एक पखवाड़ेतक रहता है, दूसरे अंशमें हुई व्याधि बारह दिनतक रहती है. तीसरे अंशमें रोग उत्पन्न हुआ हो तो वह मनुष्य जीता नहीं ॥ २६ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu