भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 180

( १४८ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने- अथ पुनर्वसु नक्षत्र । पुनर्वसौ ज्वरं विद्यात्प्रथमांशे त्रिपक्षकम् ॥ मध्यमे दिवसान्सप्त तृतीये पंचविंशतिम् ॥ २७ ॥ पुनर्वसु नक्षत्रके प्रथम अंशमें आया हुआ ज्वर तीन पखवाडेतक रहता है, दूसरे अंशमें सात दिन रहता है और तीसरे अंशमें आया हुआ ज्वर पच्चीस दिनतक रहता है ॥ २७ ॥ अथ पुष्य नक्षत्र । पुष्ये स्यात्प्रथमे सप्त द्विके विंशतिवासरान् ॥ तृतीयांशे तथा विद्याद्दिवसानेकविंशतिम् ॥ २८ ॥ पुष्य नक्षत्रके प्रथम अंशमें आया हुआ रोग सातदिनतक रहता है, दूसरे अंशमें बीस दिनतक रहता है और तीसरे अंशमें इक्कीस दिनतक रहता है ॥ २८ ॥ अथ आश्लेषा नक्षत्र । आश्लेषायां च नक्षत्रे यस्य संभवति ज्वरः ॥ मासत्रयेण प्रागंशे कष्टाज्जीवति मानवः ॥ २९ ॥ द्वितीये च तृतीये च मृत्युरेव न संशयः ॥ जिस मनुष्यके आश्लेषानक्षत्रमें ज्वर उत्पन्न होता है उसको प्रथम अंशमें ज्वर उत्पन्न होनेसे वह मनुष्य बड़े कष्टसे जीता है ॥ २९ ॥ और दूसरे तथा तीसरे अंशमें ज्वर उत्पन्न होनेसे उस मनुष्यको मृत्यु ही प्राप्त होती है, इसमें संशय नहीं ॥ अथ मघा नक्षत्र । नक्षत्रे पितृदैवत्ये रोगो यस्य प्रवर्तते ॥ ३० ॥ प्रथमेंऽश सप्तरात्रं द्वितीये धिष्ण्यतुल्यताम्॥ विंशत्तृतीये दिवसान्पीड्यते कर्मणो बलात् ॥ ३१ ॥ मघा नक्षत्रमें जिस मनुष्यको रोग उत्पन्न होता है ॥ ३० ॥ उसका रोग प्रथम अंशमें सातरात्रितक रहता है, दूसरे अंशमें उत्पन्न होवे तो दश दिन रोग बना ही रहता है और तीसरे अंशमें होवे तौ वह मनुष्य अपने कर्मके बलसे बीस दिन तक बहुत पीड़ाको प्राप्त होता है ॥ ३१ ॥ अथ पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र । नक्षत्रे भगदैवत्ये यस्य संजायते ज्वरः ॥३२॥ प्रथमेंऽशे पंच- रात्रं मध्ये द्वादश वासरान्॥ तृतीयांशे तथा ज्ञेयं मृत्युर्मा- सादनंतरम् ॥ ३३ ॥