हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
( १४८ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने- अथ पुनर्वसु नक्षत्र । पुनर्वसौ ज्वरं विद्यात्प्रथमांशे त्रिपक्षकम् ॥ मध्यमे दिवसान्सप्त तृतीये पंचविंशतिम् ॥ २७ ॥ पुनर्वसु नक्षत्रके प्रथम अंशमें आया हुआ ज्वर तीन पखवाडेतक रहता है, दूसरे अंशमें सात दिन रहता है और तीसरे अंशमें आया हुआ ज्वर पच्चीस दिनतक रहता है ॥ २७ ॥ अथ पुष्य नक्षत्र । पुष्ये स्यात्प्रथमे सप्त द्विके विंशतिवासरान् ॥ तृतीयांशे तथा विद्याद्दिवसानेकविंशतिम् ॥ २८ ॥ पुष्य नक्षत्रके प्रथम अंशमें आया हुआ रोग सातदिनतक रहता है, दूसरे अंशमें बीस दिनतक रहता है और तीसरे अंशमें इक्कीस दिनतक रहता है ॥ २८ ॥ अथ आश्लेषा नक्षत्र । आश्लेषायां च नक्षत्रे यस्य संभवति ज्वरः ॥ मासत्रयेण प्रागंशे कष्टाज्जीवति मानवः ॥ २९ ॥ द्वितीये च तृतीये च मृत्युरेव न संशयः ॥ जिस मनुष्यके आश्लेषानक्षत्रमें ज्वर उत्पन्न होता है उसको प्रथम अंशमें ज्वर उत्पन्न होनेसे वह मनुष्य बड़े कष्टसे जीता है ॥ २९ ॥ और दूसरे तथा तीसरे अंशमें ज्वर उत्पन्न होनेसे उस मनुष्यको मृत्यु ही प्राप्त होती है, इसमें संशय नहीं ॥ अथ मघा नक्षत्र । नक्षत्रे पितृदैवत्ये रोगो यस्य प्रवर्तते ॥ ३० ॥ प्रथमेंऽश सप्तरात्रं द्वितीये धिष्ण्यतुल्यताम्॥ विंशत्तृतीये दिवसान्पीड्यते कर्मणो बलात् ॥ ३१ ॥ मघा नक्षत्रमें जिस मनुष्यको रोग उत्पन्न होता है ॥ ३० ॥ उसका रोग प्रथम अंशमें सातरात्रितक रहता है, दूसरे अंशमें उत्पन्न होवे तो दश दिन रोग बना ही रहता है और तीसरे अंशमें होवे तौ वह मनुष्य अपने कर्मके बलसे बीस दिन तक बहुत पीड़ाको प्राप्त होता है ॥ ३१ ॥ अथ पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र । नक्षत्रे भगदैवत्ये यस्य संजायते ज्वरः ॥३२॥ प्रथमेंऽशे पंच- रात्रं मध्ये द्वादश वासरान्॥ तृतीयांशे तथा ज्ञेयं मृत्युर्मा- सादनंतरम् ॥ ३३ ॥
अ० ६] भाषाटीकासमेता । ( १४९ ) पूर्वाफाल्गुनीनक्षत्रमें जिसको ज्वर उत्पन्न होवे ॥ ३२ ॥ उस मनुष्यका ज्वर प्रथम अंशमें पांच रात्रितक रहता है, दूसरे अंशमें बारह दिनतक रहता है और तीसरे अंशमें ज्वर उत्पन्न होवे, उस मनुष्यका एक महीनेके पीछे मृत्यु होगा ऐसा जानना ॥ ३३ ॥ अथ उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र । उत्तराया आद्यभागे वासराणि चतुर्दश ॥ द्वितीये सप्तरात्रन्तु तृतीये दिवसा नव ॥ ३४ ॥ उत्तराके प्रथमभागमें रोग उपजे तो चौदह दिन पीड़ा रहती है और दूसरे भागमें सात रात्रि और तीसरे भागमें नव दिन पीड़ा रहती है ॥ ३४ ॥ अथ हस्त नक्षत्र । यदि हस्ते भवेद्रोगः प्रथमे सप्तरात्रकम् ॥ चत्वार्यहानि द्वितीये तृतीये दिनपञ्चकम् ॥ ३५ ॥ हस्तके प्रथमभागमें रोग उपजे तो सात रात्री पीड़ा रहती है और दूसरे भागमें चार दिन और तीसरे भागमें पांच दिन पीड़ा रहती है ॥ ३५ ॥ अथ चित्रा नक्षत्र । मृत्युं विद्यात्तथा पूर्वे त्वाष्ट्रो यस्य भवेज्ज्वरः॥ त्रिभिर्मासैर्द्विती- यांशे रोगो भवति दारुणः ॥ ३६ ॥ तृतीयांशे तथा ज्ञेयं वासराणि त्रयोदश ॥ चित्राके प्रथम भागमें जिसके ज्वर उपजे उसका मृत्यु होजाता है और दूसरे भागमें रोग दारुणरूपी होके तीन महीनोंमें दूर होता है ॥ ३६ ॥ और तीसरे भागमें तेरह दिन पीड़ा रहती है ॥ अथ स्वाती नक्षत्र । वायव्ये प्राक् सप्तदश द्वितीये चैकविंशतिः॥ ३७ ॥अस्यैव तु तृतीयांशे मृत्युमेव विनिर्दिशेत् ॥ ३८ ॥ स्वातीके प्रथम भागमें रोग उपजे तो सत्रह दिन पीड़ा रहती है और दूसरे भागमें रोग उपजे तो इक्कीस दिन पीड़ा रहती है ॥ ३७ ॥ और तीसरे भागमें रोग उपजे तो मृत्युही जानना ॥ ३८ ॥ अथ विशाखा नक्षत्र । प्रथमांशे विशाखायां त्रिगुणाः षोडश स्मृताः ॥ द्वितीये द्वादश प्रोक्तास्तृतीयेऽपि तथैव च ॥३९॥
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
( १५० ) हारीतसंहिता। [ द्वितीयस्थाने-] विशाखाके प्रथम भागमें रोग उपजे तो अडतालीस ४८ दिन पीड़ा रहती है और दूसरे भागमें रोग उपजे तो बारह दिन पीड़ा रहती है और तीसरे भागमें रोग उपजे तो भी बारह दिन पीड़ा रहती है ॥ ३९ ॥ अथ अनुराधा नक्षत्र। मैत्रांशे प्रथमे सप्त द्वितीये पक्षमादिशेत् ॥ तृतीयांशे चतुःषष्टिर्वासराणां महामुने ॥ ४० ॥ अनुराधाके प्रथम भागमें रोग उपजे तो सात दिन पीड़ा रहती है और दूसरे भागमें रोग उपजे तो पंद्रह दिन पीड़ा रहती है और तीसरे भागमें पीड़ा उपजै तो हे महामुने ! चौसठ ६४ दिन पीड़ा रहती है ॥ ४० ॥ अथ ज्येष्ठा नक्षत्र। त्रिपक्षमैन्द्रे प्रथमे द्वित्रिभागे च षोडश ॥४१ ॥ ज्येष्ठाके प्रथम भागमें रोग उपजे तो ४५ दिन पीड़ा रहती है, द्वितीय और तृतीय इन भागोंमें रोग उपजे तो सोलह दिन पीड़ा रहती है ॥ ४१ ॥ अथ मूल नक्षत्र। मूलेऽशे तृतीये ज्ञेयः पक्ष एव मनीषिभिः ॥ आद्ये पूर्वत्रयो मासा मध्यमेऽहानि षोडश ॥ ४२ ॥ और मूलके तीसरे भागमें रोग उपजे तो पंद्रह दिन पीड़ा रहती है और मूलके प्रथम भागमें रोग उपजे तो तीन महीने पीड़ा रहती है और मूलके दूसरे भागमें रोग उपजे तो सोलह दिन पीड़ा रहती है ॥ ४२ ॥ अथ पूर्वा नक्षत्र। पूर्वांशे द्वितये ज्ञेयः पक्ष एव मनीषिभिः॥ तृतीयांशे पुनर्मृत्युर्तीरात्रात्प्रजायते ॥४३॥ पूर्वाषाढके प्रथम और द्वितीयभागमें रोग उपजे तो पंदरह दिन पीड़ा रहती है और तीसरे भागमें रोग उपजे तो रोगी मर जाता है ॥ ४३ ॥ अथ उत्तराषाढा नक्षत्र। विश्वेशे प्रथमे पक्षे मध्ये द्वादशरात्रिकम् ॥ दिनानां विंशतिः प्रोक्ता तृतीयांशे महामुने ॥ ४४ ॥ उत्तराषाढाके प्रथम और द्वितीयभागमें रोग उपजे तो बारह रात्रि पीड़ा रहती है, हे महा- मुने ! उत्तराषाढाके तीसरे भागमें रोग उपजे तो २० दिन पीड़ा रहती है ॥ ४४ ॥
An exact transcription of the page into Devanagari text, with line-by-line markers:
अ० ६] भाषाटीकासमेता । (१५१) अथ श्रवण नक्षत्र । सप्ताहमादौ श्रवणे विंशतिर्मध्यमे मता ॥ षोडशाहं तृतीयांशे सत्यमेतद्रवीम्यहम् ॥ ४५ ॥ श्रवणके प्रथमभागमें रोग उपजे तो सात दिन पीडा रहती है और द्वितीयभागमें रोग उपजे तो बीसदिन पीडा रहती है और तीसरे भागमें रोग उपजे तो सोलह दिन पीडा रहती है यह मैं सत्य कहता हूं ॥ ४५ ॥ अथ धनिष्ठा नक्षत्र । विंशतिर्वासवे पूर्वं मध्यमे मासयुग्मकम् ॥ मासस्तृतीये विज्ञेयो दैवज्ञैश्च निवेदितम् ॥ ४६ ॥ धनिष्ठाके प्रथमभागमें रोग उपजे तो बीस दिन पीडा रहती है और दूसरे भागमें रोग उपजे तो दो महीने पीडा रहती है और तीसरे भागमें रोग उपजे तो एक महीना पीडा रहती है ऐसा ज्योतिषियोंने कहा है ॥ ४६ ॥ अथ पूर्वाभाद्रपदा नक्षत्र । वारुणे दारुणो रोगस्त्रिपक्षं प्रथमांशके ॥ द्वितीये मासषट्कं तु षोडशाहं तृतीयके ॥ ४७ ॥ पूर्वाभाद्रपदाके प्रथमभागमें दारुण रोग उपजे तो पैंतालिस दिन पीडा रहती है और दूसरे भागमें रोग उपजे तो छःमहीने और तीसरे भागमें रोग उपजे तो सोलह दिन पीडा रहती है ॥ ४७ ॥ अथ उत्तराभाद्रपदा नक्षत्र । अहिर्बुध्न्ये पक्षमादौ मध्ये मासं विनिर्दिशेत् ॥ अन्तेऽष्टाविंशतिर्ज्ञेया पीडा स्यात्पापकर्मणि ॥ ४८ ॥ उत्तराभाद्रपदाके प्रथमभागमें रोग उपजे तो पंदरह दिन पीडा रहती है और दूसरे भागमें रोग उपजे तो एक महीना पीडा रहती है और तीसरे भागमें रोग उपजे तो अट्ठाईस दिन पीडा रहती है ॥ ४८ ॥ अथ रेवती नक्षत्र । रेवत्याः प्रथमे चाष्टौ द्विभागे तु च षोडश ॥ अन्ते त्रिंशद्दिनान्येवं प्रोक्तानि पूर्वसूरिभिः ॥ ४९ ॥ रेवतीके प्रथमभागमें रोग उपजे तो आठ दिन पीडा रहती है और दूसरे भागमें सोलह दिन पीडा रहती है और तीसरे भागमें तीस दिन पीडा रहती है ॥ ४९ ॥
यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण (Transcription) प्रस्तुत है:
( १५२ ) हारीतसंहिता । [द्वितीयस्थाने- अथ अश्विनी नक्षत्र । अश्विन्याः प्रथमे भागे दिनमेकं प्रकीर्तितम्॥ द्वितीये पञ्चरात्रन्तु तृतीये सप्तकं तथा ॥ ६० ॥ अश्विनीके प्रथम भागमें एक दिन पीडा रहती है और दूसरे भागमें पंचरात्रि और तीसरे भागमें सात रात्रि पीडा रहती है ॥ ६० ॥ अथ भरणी नक्षत्र । भरण्याः प्रथमे चांशे सप्तवासरमेव च ॥ मध्ये मृत्युस्तथा चान्त रोगो मासत्रयावधि॥ ६१ ॥ भरणीके प्रथमभागमें सातदिन पीडा रहती है और दूसरे भागमें मृत्यु और तीसरे भागमें तीन महीने पीडा रहती है ॥ ६१ ॥ अथ नक्षत्रारिष्टोंका उपसंहार । एवं ज्ञात्वा सुधीः सम्यक्कुर्य्यात्प्रशमनक्रियाम्।नक्षत्रस्य त्रयो भागा आत्रेयेण प्रकाशिताः॥६२॥ इति आत्रेयभाषिते हारी- तोत्तरे द्वितीयस्थाने नक्षत्रज्ञानं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ ऐसे जानके कुशल वैद्य रोगको शांत करनेकी क्रियाको करे,नक्षत्रोंके तीन भाग आत्रेयजीने प्रकाशित किये हैं ॥ ६२ ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारी- तसंहिताभाषाटीकायां द्वितीयस्थाने नक्षत्रज्ञानं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ सप्तमोऽध्यायः ७. अथ होमकी विधि । आत्रेय उवाच ॥ अर्कः खदिरपालाशबदर्य्यः पारिभद्रकः ॥ दूर्वा शमी कुशः काशः पिप्पलो वटभूरुहः ॥१॥ जम्ब्वार्म्रो कर- हाटश्च सोमवृक्षः कलिद्रुमः ॥ रक्तसारश्चन्दनश्च जयन्ती गुरु- वृक्षकम् ॥ २ ॥ सहचरी सितावर्षा सर्व्वौषधिनिशायुगम् ॥ समिद्वर्गः समस्तोऽपि समिद्धोमः प्रकाशितः ॥ ३ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-आक, खैर, पलाश, बेरी, पारिभद्र, दूर्व, छींकुर, कुशा, कास, पीपलवृक्ष, वड़वृक्ष, ॥ १ ॥ जामुनवृक्ष, आम्रवृक्ष, पद्मकंद, श्वेतखैर, बहेडा, लाल खैर, चन्दन,
अ० ७] भाषाटीकासमेता । ( १५३ ) अरनी, सीसमवृक्ष ॥ २ ॥ पीला कुरंटा, सफेद सांठी, सर्वौषधी, अर्थात् कूट, छलीरा, हल्दी, वच, लोबान, मुरामांसी, चन्दन, कपूर, नागरमोथा और हल्दी, दारुहलदी यह समिद्वर्ग है, इससे समिद्धोम होता है ॥ ३ ॥ अथ शांतिप्रकार । चन्दनं रक्तचन्दनं गोरोचना हरिद्रा गैरिकनिम्बबिल्वं कदम्बं कुंकुममिश्रितकस्तूरिका घनसारं श्रीपर्णं सुरदारु हरिचन्दनं पद्मंकं हरिद्राद्वयं कालीयकागुरुशिंशपा रक्तगोरोचना पलाश इति गन्धानि, पद्मबिल्वसूरसादुर्वाकुशजयन्ती शमीपत्रार्क- किंशुककर्णिकारगिरिकर्णिकासहचरालूषपुष्पाणि, जम्बाम्रपल्ल- वानि काञ्चनारपाटलवर्वरी अगस्तिः काककाहारी अशोकपु- ष्पमिति धूपदीपादिभिरलङ्कारैरलङ्कृतं वास्तुमण्डलं कृत्वा ईशा- नदिक्क्रमेण नक्षत्रमण्डलं चार्चयेत् ॥ तन्मण्डलकमध्ये आदि- त्यादीन् ग्रहान् सम्भ्यर्च्य क्रमेण समिद्भिर्होमं कुर्य्यात्॥तस्मा- त्पुनर्दधिमधुघृताक्ताभिः समिद्भिरश्विन्यादिक्रमेण जुहुयात् ॥ आकृष्णेति अर्कसमिद्भिरिदम् अश्विन्त्यै विष्णोरराटमसीतिपला- शेन इदं भरण्यै मधुमाध्वीति बदरीसमिद्भिरिदंकृत्तिकायै काण्डा- त्काण्डेति पारिभद्रकपूर्वकशसमिद्भिः रोहिणीमृगशिरःपुनर्व- स्वादीन् काण्डेति होमयेत् ॥ इदं देव इति पिप्पलसमिद्भिरिदं पुष्याय सप्तत्यग्रिमन्त्रेण चूतसमिद्भिरिदं सापर्यै अग्निमूर्द्धादि- व इति जम्बू समिद्भिर्मघां होमयेत् ॥ सद्योजाताभिः करहाटकस- मित्पूर्वसमिद्भिर्होमयेत् ॥ तत्पुरुषाय विद्महे इति सोमवल्ली- समिद्भिरुत्तरात्रयं, नमो घोराय विभीतकसमिद्भिर्हस्तं होमयेत् ॥ नमो ज्योतिष्पतये रक्तसारसमिद्भिश्चित्रां होमयेत् ॥ नमो देवाय नमो ज्येष्टायेति चन्दनसमिद्भिः स्वात्यै होमं कुर्य्यात् ॥ उदुम्बरजयन्तीसमिद्भिर्विशाखां होमयेत् ॥ बृहते इति यडुपतये गुरुवृक्षकसमिद्भिरनुराधां होमयेत् ॥ एतज्ज्योतिः
( १५४ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने-
सहचरीसमिद्भिर्ज्येष्ठां काण्डात्काण्डेति शतावरीसमिद्भिर्मूलमिष्टं स्तौति ॥ निशायुगसमिद्भिः पूर्वाषाढामउत्तराषाढां मधुवातेति उदुम्बरसमिद्भिः श्रवणं त्र्यम्बकमिति बिल्वसमिद्भिर्वासवप्रभृती- नि होमयेत् घृतेन पूर्णाहुतिं दद्यात् ॥ नवग्रहस्थापनं चतुरस्रेण होमकुण्डे होमयेत् ॥ तस्मादभिषेकस्नानमाचरेत् ॥ शुक्लव- स्त्रोपवीतं यज्ञोपवीतसहितं रोगिणं कृत्वा वेदादिभिराशिष्य गोभूवस्त्रहिरण्यादिदानं कुर्यात् ॥ इति विधाने कृते सम्यक् शान्तिर्भवति ॥४॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे द्वितीयस्थाने होमविधिर्नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ चंदन, लालचंदन, गोरोचन, हल्दी, गेरू, नीमकी छाल, बेलगिरी, कदंब, केशर, कस्तूरी, कपूर, कमल, देवदार, हरिचंदन, पद्माख, हल्दी, दारुहलदी, कालाअगर, अगर, शीसम, गोरोचन, पलाश अर्थात् ढाका ये सब गंध हैं। श्वेतकमल, बेलगिरी, तुलसी, दूब, कुशा, अरनी, जांटीके पत्ते, आक, टेसू, कनेर, विष्णुक्रांता, नीलाकरसैला, शतावरी इनके फूल, जामन और आंबके पत्ते और कचनार, पाडल, रानतुलसी, अगस्तिवृक्ष, काकजंघा, अशोक इनके फूल, धूपदीपादिसे अलंकृतकिये वास्तुमण्डको कर ईशानआदिके क्रमसे नक्षत्रमण्डलकी पूजा करनी तिस मण्डलके मध्यमें सूर्य्यआदिग्रहोंकी अच्छीतरह पूजाकर क्रमसे पूर्वोक्त समिधोंसे होमको करे उससे पीछे फिर दही, शहद, घृत इनसे भिगोई हुई पूर्वोक्त समिध अर्थात् लकड़ियोंसे अश्विनी आदिनक्षत्रोंके क्रमकरके होम करे 'आकृष्णेन रजसा' इसमंत्रसे और आककी लकड़ीसे अश्विनीके लिये होम करे, पीछे 'इदं अश्विन्यै' ऐसे कहे। 'विष्णोराट' इसमन्त्रसे ढाककी लकड़ियों करके भरणीका होम करे अंतमें 'इदं भरण्यै' ऐसे कहे। 'मधुमाध्वी' इसमन्त्रसे और बडवेरीकी लकड़ियोंसे कृत्तिकाका होम करे। 'कांडात्कांडे' इस मन्त्रसे और पारिभद्र कुशा इन्होंकरके रोहिणी, मृगशिर, पुनर्वसु, आदिका होम करे। 'इदंदेव'इस मंत्रसे और पीपलकी लकड़ियोंकरके पुष्यका होम करे। 'ससत्यग्नि' इसमंत्रसे और आंबकी लकड़ियोंकरकै आश्लेषाका होम करे।'अग्निर्मूर्द्धा' इस मंत्रसे और जामुनकी लकड़ियोंकरकै मघाका होम करे।'सद्योजाताभि०'इसमन्त्रसे और श्वेतखैरकी लकड़ियोंसे पूर्वाका होम करे।'तत्पुरुषाय विद्महे'इसमन्त्रस और लालखैरकी लकड़ियोंकरकै तीनों उत्तराओंका होम करे 'नमो घोराय' इस मंत्रस और बहेड़ाकी लकड़ीकरके हस्तका होम करे 'नमो ज्योतिष्पतये' इसमन्त्रसे और लालशीसमकी लकड़ियोंकरकै चित्राका होम करे 'नमो देवाय नमो ज्येष्ठाय'इसमन्त्रसे और चंदनकी लकड़ियों करके स्वातीका होम करे और इसीमंत्रसे तथा गूलर और अरनीकी लकड़ियों ९ करकै विशाखाका होम करे, 'बृहते
अ० ८] भाषाटीकासमेता । ( १५५ ) 'इतियदुपतये०' इसमन्त्रसे और शीसमकी लकड़ियोंकरके अनुराधाका होम करे, 'एतज्ज्योति ०' इस मंत्रसे और पीला कुरंटाकी लकड़ियोंकरके ज्येष्ठाका होम करे, 'कांडात्काण्डे' इस मन्त्रसे और शतावरीकी लकड़ियोंकरके मूलका होम करे, नामरूपमन्त्रसे और हल्दी तथा दारुहल- दीकी लकड़ियोंसे पूर्वाषाढ और उत्तराषाढका होम करे, 'मधुवाता' इस मन्त्रसे और गूलरकी लकड़ियोंसे श्रवणका होम करे, त्र्यंबकमन्त्रसे और बेलपत्रकी लकड़ियोंसे धनिष्ठाआदि और रेवती तकके नक्षत्रोंका होम करे, घृतकरके पूर्णाहुतिको देवे, नवग्रहोंको चौकुँड़ीवेदीपै स्थापन कर पीछे होमके कुंडमें होमको करे, तिससे पीछे अभिषेकस्नानको करे, सफेद वस्त्रोंको पहने हुए और यज्ञोपवीत अर्थात् जनेऊको धारण किये ऐसे रोगीको बना और वेदआदिके मन्त्रोंसे आशीर्वाद दे- पीछे रोगी गौ, पृथिवी,सोना,आदिको दान करे ऐसे विधान करनेसे अच्छीतरह शांति होतीहै ४॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिता- भाषाटीकायां द्वितीयस्थाने होमविधिर्नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ अष्टमोऽध्यायः ८. अथ दूतकी परीक्षाका लक्षण । आत्रेय उवाच॥अथातो गदग्रस्तानां दूतारिष्टं भिषग्वर ॥शुभं वाशुभमेवान्यत्समासेन प्रवक्ष्यते ॥ १॥ आतुरस्योपकारार्थं दूतो याति भिषग्गृहे॥तस्य परीक्षणं कार्य्यं येन संलक्ष्यते गदः२॥ आत्रेयजी कहते हैं--हे वैद्यवर ! अब रोगोंसे ग्रस्तहुए मनुष्योंके दूतारिष्टको विस्ता- से कहताहूँ जो शुभ और अशुभ होता है ॥१॥ रोगीके उपकारके लिये जो दूत वैद्यके घर- को जाता है उसकी परीक्षा करनी चाहिये जिससे रोगका शुभाशुभ मालूम होवे ॥ २ ॥ अथ वर्ज्यदूतके लक्षण । खञ्जान्धमूकबधिरं रुजपीडितं वा बालं स्त्रियञ्च विकलं तृषितं विजीर्णम् ॥ श्रान्तं क्षुधातुरमपि अमितञ्च दीनं दूतं न शस्त- मिह वेदविदो वदन्ति॥३ ॥ कषायकृष्णाईकवाससा च तथैव वस्त्रावृतमस्तकेन ॥ अश्रुप्लुतैर्वा नयनैश्च युक्ताः केशैस्तथा मुण्डितमस्तकञ्च ॥ ४ ॥ समर्कटाक्षोर्ध्वशिरोरुहश्च खर्वस्तथा
( १५६ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने- वामनकृत्तनासः॥एतान्न शसन्ति विदो मुनीन्द्रा दूतान्नराणां रुजनाशनाय ॥५॥ यः कर्कशः क्रोधनपाशपाणिर्भिषग्विदूषी तमसावृतश्च॥एते न शस्ताः प्रवदन्ति धीरा दूता विकारञ्च प्रवर्द्धयन्ति ॥६॥ यः काष्ठहस्तोद्धतपाशपाणिस्तथातुरो दीन- वचो हिरोदिति ॥प्रक्लिन्ननेत्रो गमनोत्सुकोऽपि वर्ज्यो रुगार्त्तो- ऽशुभकारिदूतः॥७॥यो रज्जुहस्तोद्धतपाशपाणिर्याम्यां दिशं च परिभूय तूणम् ॥यो वावदीति प्रबलं सरोषस्तथा समागम्य वदेच्च दूतः ॥ ८॥ हस्तेऽवष्टभ्य लगुडं वक्रपादेन तिष्ठति ॥ तस्मादाकुलवादी यो न शस्तो वैद्यकर्मसु ॥९॥ पथा गच्छति शीघ्रण आविश्योत्थाय मुह्यति॥पादौ प्रसार्य्य विशति मस्तके विन्यसेत्करम् ॥१०॥ भिनत्ति लोहकाष्ठञ्च तृणं वा स्फोटते क्वचित् ॥ एतानि स्पृशते नासां स्तनं वा स्पृशति पुनः॥११॥ भूमिं लिखति पादेन रेखां वापि करोति यः॥निद्रां वा कुरुते यस्तु स दूतोऽनिष्टकारकः ॥ १२ ॥ लंगड़ा, अंधा, गूंगा, बहिरा, रोगसे पीडित, बालक, स्त्री, विकल, तृषावाला, अतिवृद्ध, परिश्रमको प्राप्त हुआ, भूखसे पीडित और श्रमवाला और दीन ऐसे दूतको वैद्य श्रेष्ठ नहीं कहते हैं ॥ ३ ॥ रंगा हुआ और काला और गीला ऐसे वस्त्रसे युक्त और वस्त्रसे आवृत हुए मस्तकवाला और आँसुओंसे भीजे हुए नेत्रोंवाला और जटाजूट हुआ और मुंडाये हुए शिरके बालोंवाला ॥ ४ ॥ और वानरकेसे नेत्रोंवाला और ऊपरको खुले हुए बालोंवाला और ढींगना तथा कटी हुई नासिकावाला ऐसे दूतोंको मुनींद्र रोगका नाशके लिये श्रेष्ठ नहीं कहते हैं॥५॥ जो कठोर हो, क्रोधी हो और फांसीको हाथमें लेनेवाला और वैद्यको दोष लगानेवाला और तमोगुणसे संयुक्त ऐसे दूत अच्छे नहीं हैं, किंतु ये दूत विकारको बढ़ाते हैं ॥ ६ ॥ जो काष्ठको हाथमें लिय हो और ऊपरको हाथ किये फांसीको ग्रहण करनेवाला हो, रोगी हो और दीनवचनको बोलके रोता हुआ है और भीजेहुए नेत्रोंवाला हो और गमन करनेकी इच्छावाला हो ऐसा अशुभको करनेवाला दूत वर्जना चाहिये ॥ ७ ॥ जो रज्जुको हाथमें लेके ऊपरको लिये हुए हो और फांसीको हाथमें लिये हुए हो और जो दक्षिण दिशामें प्राप्त होके क्रोधसे बारंवार बोले और वैद्यसे भी दक्षिणदिशामें स्थित होके बोले ऐसा दूत श्रेष्ठ नहीं है ॥ ८ ॥ जो लकड़ीको हाथमें लेके टेढ़ेपैरसे स्थित होवे और बुरे वचनको बोले ऐसा दूत वैद्यकर्ममें Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
अ० ८ ] भाषाटीकासमेता । ( १५७ ) श्रेष्ठ नहीं है ॥ ९ ॥ जो मार्गमें शीघ्र गमन करे, बैठता और उठता हुआ मोहको प्राप्त और पैरोंको पसारकै प्रवेश करे और मस्तकपै हाथको स्थापित करे ॥ १० ॥ लोहा, काठ, तृण, इनमेंसे किसी चीजको भेदित करे अथवा इन्हींको छुवै नासिका और चूचीको छुवै ॥ ११ ॥ पृथिवीको पैरसे खोदे अथवा पृथिवीमें रेखाको करे अथवा नींदको प्राप्त हुआ हो वह दूत बुरा कहा है ॥ १२ ॥ शुभदूतके लक्षण । यः श्वेतवस्त्रावृतपूर्णपाणिः सम्पूर्णताम्बूलमुखः प्रशस्तः ॥ द्विजस्तथा माणवकः सुशीलः प्रज्ञाधिकश्चाह्वयते सुखाय १ ३॥ कुसुममुकुरवक्त्रं यस्य स्यात्सर्वदापि श्रमविकचसरोजं पद्मकिञ्ज- ल्कपुष्पम् ॥ करतलवरवस्त्रं पुष्पपूगाङ्गरागं करतलधृतमेतत्सौ- ख्यकर्ता हि दूतः ॥१४॥ आगत्योदीच्यपूर्वामथवरुणदिशमैशी- माश्रित्य शान्तो दृष्ट्वा वैद्यं प्रहस्य प्रवदति निपुणं नातिनीचं न चोच्चम्। उत्तिष्ठ त्वं प्रसादं कुरु पवन इदं सौख्यवाक्यं तनोति प्राज्ञैः स्वार्थं प्रकृष्टं सुखमगदकरं रोगिणां वैद्यलाभः ॥ १५॥ पूर्वा दिशं समासाद्य प्रशान्तः शान्तया गिरा ॥ वैद्यं वदति लाभाय रोगिणाञ्च सुखावहम् ॥१६॥ यश्चागत्योपविष्टोऽपि श्लोकं वाथ सुभाषितम् ॥ वदते शान्तया वाचा सोऽपि लाभाय शान्तये ॥१७॥ अभिवाद्यस्य वैद्यस्य क्षेमं पृच्छति यः पुनः॥ फलं ददाति पुष्पं वा रोगिणाञ्च सुखावहम् ॥ १८ ॥ जो सफेद वस्त्रोंको पहने हुये और किसी चीजको हाथमें लियेहुए और नागरपानको मुखमें धारण किये उत्तम देहवाला और ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, इन वर्णोंमें उपजा हुआ और बालक तथा शीलस्वभाववाला और बुद्धिमान् ऐसा दूत वैद्यको बुलानेमें सुखको देता है ॥ १३ ॥ जिसका मुख फूल तथा शीशाके समान स्वच्छ सब कालमें रहे और श्रमसे खिलेहुए कमलोंकी केसर और पुष्पोंवाला हो और हस्तोंके तलुओंपर भी वस्त्रको धारणकिये हो, अनेक प्रकारके फूल और सुपारीको हाथमें धारणकिये हो ऐसा दूत सुखको देनेवाला है ॥१४॥ जो आके उत्तरको व पूर्वको, पश्चिम व ईशान दिशामें बैठ और वैद्यको देख हँसता हुआ न ज्यादा ऊंचेप्रकारसे और न ज्यादा नीचेप्रकारसे बोले कि, हे वैद्यराज ! उठक प्रसन्नता करो ऐसे शुभवचनको कहे ऐसा १ अत्र छन्दोभंगः ।
( १५८ ) हारीतसंहिता । [द्वितीयस्थाने- दूत रोगियोंके रोगको नाशनेके लिये शुभ कहा है ॥ १५ ॥ जो पूर्वदिशामें आश्रित होके प्रशांत हुआ दूत शांतवाणीसे वैद्यको बोलता है वह दूत वैद्यको सुखका देनेवाला कहा है॥१६॥ जो आर्के श्लोकको अथवा सुन्दर वचनको शांतवाणीसे बोले वह भी दूत शुभ कहा है ॥१७॥ जो दूत वैद्यको प्रणामकर फिर कुशलको पूँछ फलको अथवा फूलको देता है वह रोगियोंके सुखका देनेवाला है ॥ १८ ॥ अथ दूतलक्षणोंका उपसंहार । यस्य सौख्यं सुखं सिद्धिस्तस्य दूता इदं विदुः॥किमत्र बहुनो- क्तेन दूतो नरसुखावहः ॥ १९ ॥ न हितमस्त्रीपुरुषं तस्मात्तु परिवर्जयेत् ॥ एवं जानाति यो वैद्यस्तस्य सिद्धिः सुखं श्रियः ॥ २० ॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे द्वितीयस्थाने दूतपरी- क्षणलक्षणं नाम अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ जिस रोगीको सुख और सिद्धिकी प्राप्ति होनेवाली है उसके दूत इस पूर्वोक्त वचनको बोलते हैं ज्यादे कहनेसे क्या है दूतही मनुष्योंको सुखका देनेवाला है ॥ १९ ॥ हीजडा दूत कर्ममें हित नहीं है इससे इसको वर्जे ऐसा जो वैद्य जानता है उसको सिद्धि, सुख, लक्ष्मी इनकी प्राप्ति होती है ॥ २० ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिता- भाषाटीकायां द्वितीयस्थाने दूतपरीक्षालक्षणं नाम अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ नवमोऽध्यायः ९. —<०>— अथ शकुनवर्णन ! आत्रेय उवाच ॥ इदानीं निर्गमे पुत्र प्रवेशे वा गृहस्य च ॥ शुभाशुभानि सर्वाणि वक्ष्यामि शकुनानि च ॥ १ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-हे पुत्र ! अब वैद्यके चलनेमें और रोगीके घरमें प्रवेश करनेमें शुभ और अशुभ जो शकुन हैं उनको कहता हूं ॥ १ ॥ अथ शुभ शकुन । राजा गजो द्विजमयूरकरखञ्जरीटाश्वाषः शकुन्तरजकः सितवस्त्र- युक्तः ॥ पुत्रान्विता च युवती गणिका च कन्या श्रेयः सुखाय यशसे प्रतिदर्शयन्ति॥२॥ लङ्गा श्येनो भासहारीतचक्रो भार-
अ० ९ ] भाषाटीकासमेता । ( १५९ ) द्वाजिच्छिक्करच्छागसंज्ञः ॥ एते श्रेष्ठा दक्षिणे सव्यवामे वैद्य- वेशे निर्गमे श्रेयसे च ॥ ३ ॥ राजा, हस्ती, ब्राह्मण, मोर, खंजना, पपैया, सफेद वस्त्रोंवाला, धोबी, पुत्रसे युक्त हुई स्त्री, वेश्या, कन्या प्रथम देखे हुये ये शकुन यशको और सुखको देते हैं ॥ २ ॥ ग्राममें रहनेवाली चिडिया, शिकरा, भासपक्षी, हरीवां या हरदिहा, चकुवा, मुर्गाविशेष, छिक्कर, बकरा ये सब वैद्यके चलने और प्रवेश करनेमें दाहिने और बायें श्रेष्ठ हैं ॥ ३ ॥ अथ दुष्ट शकुन । सर्पोलूको वानरःसूकरश्च गोधा ऋक्षो गिरगिटो वै शशश्च॥एते- ऽरिष्टा निर्गमे वा प्रवेशे कार्य्ये निर्घातोपकारेषु शस्ताः ॥४॥ सर्प, उल्लू, वानर, शूकर, गोह, रीछ, गिरगिट, शशा ये सब वैद्यके गमन और प्रवेशमें अच्छे नहीं हैं और घात करनेके कार्य्यमें ये भी शकुन अच्छे हैं ॥ ४ ॥ अथ मृगादिकोंका शकुन । मृगो वा पिङ्गलो वापि प्रशस्तो दक्षिणे सदा ॥ निर्गमे वा प्रवेशे च दक्षिणे शुभदायकः ॥ ५ ॥ मृग अथवा उल्लू सबकालमें दाहिने श्रेष्ठ है और वैद्यके गमनमें तथा प्रवेशमें भी दाहिने ही शुभको देते हैं ॥ ५ ॥ अथ मृगोंके संख्याका शकुन । संख्ययैकत्रयः पञ्चनवसप्तसमारुख्यया ॥ भाग्यकाले नराणां तु मृगा यान्ति प्रदक्षिणाः ॥ ६ ॥ एक अथवा तीन अथवा पांच अथवा सात अथवा नव ऐसी संख्याके मृग मनुष्योंके भाग्यकालमें दाहिने गमन करनेवाले होते हैं ॥ ६ ॥ अथ मोरआदिकोंका शकुन । शिखी च भवनगोधा रासभो भृङ्गराजः पिकभषणकपोताः पोतकी सूकरी वा॥ तदनु विहगराजो दीर्घकण्ठादयः स्युर्वदति शकुनवेत्ता वामतो निर्गमे वा॥ ७॥ तित्तिरः क्रकरः क्रौञ्चसा- रसाभाससूकराः ॥ खगः किरीटी वामे तु सदा शुभतरा मताः ॥ ८॥ भवन्ति निर्गमे चैते सर्वकार्य्यसुसिद्धये ॥ ९॥ मोर, घरमें रहनेवाली गोह, गधा, धूम्याटपक्षी, कोयल, कुत्ता, कबूतर, काली चिडी, १ छन्दोभंगः ।
( १६० ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने-
सुअरी, नीलटांच अथवा गीध, बगला इत्यादि वैद्यके गमनमें बायें श्रेष्ठ हैं ऐसे शकुनको जाननेवाले कहते हैं ॥ ७ ॥ तीतर, करढौकपक्षी, कुंज, सारस, भास, शूकर, चील, किरीटी ये पक्षी सब कालमें बायें श्रेष्ठ हैं ॥८॥ये सब वैद्यके गमनमें सर्वकार्यसिद्धिके वास्ते श्रेष्ठ हैं ॥९॥ अथ काकशकुन । काको दक्षिणतः श्रेष्ठो निर्गमे शुभदायकः ॥ प्रवेशे गदितः श्रेष्ठो वामतः कृष्णवायसः ॥ १० ॥ वैद्यके गमन करनेमें काक दाहिने श्रेष्ठ और शुभदायक है और वैद्यके प्रवेशमें काला काग बायें श्रेष्ठ कहा है ॥ १० ॥ अथ जाहशशाआदिकोंका शकुन । जाहकोऽपि शशकोऽपि मर्कटः कीर्त्तनञ्च गदितं न सुखाय ॥ नाम चैव न च दर्शनमेषां सर्पगोधकृकलासबिडालाः ॥११॥ दर्शनं हितकरं प्रवदन्ति खञ्जरीटकमरालछिक्कराः ॥ नामतः शुभकराः प्रवदन्ति दार्वघाटवरटौ च शुकश्च ॥ १२ ॥ जहा, शशा, वानर और इनका कीर्तन करना, बोलना और सर्प, गोह, किरलिया, बिलाव इनका नाम और देखना भी हित नहीं है ॥ ११ ॥ खंजना, राजहंस, खातीचिडा, गांधीलमाखी, तोता इन्होंनेके नाम और दर्शन वैद्यको श्रेष्ठ हैं ॥ १२ ॥ अथ गमनसमयके विविधपदार्थदर्शनशकुन । निर्गमे विविधकार्य्यसिद्धये भृङ्गराज रजतं पयो जलम्॥मत्स्य- मांसरुधिरं मृतकं वा धौतवासमुकुरं पिधानकम् ॥१३॥ मार्गं छिन्दन्ति मार्जाराः सर्पा वा कृकलासकाः॥गोधा वापि प्रवेशे च पद्मेकन्तु न व्रजेत् ॥ १४ ॥ प्रस्खलन्ति पादशिरसो वसनानि स्खलन्ति वा ॥ विक्रुष्टं वचनं श्रुत्वा पदमेकन्तु न व्रजेत् ॥१५॥ गृहाणां ज्वलनं दृष्ट्वा भिद्यते सजलं घटम् ॥ पतनं भूरुहाणां च दृष्ट्वा कुर्य्यान्न चङ्क्रमणम् ॥१६॥ आक्रो- शवचनं श्रुत्वा मार्जाराणां रुतं तथा ॥ कलहं गृहलोकस्य दृष्ट्वा चंक्रमणं न च ॥ १७ ॥ कनककङ्कणमेव विभूषणं सफ- लपुष्पमथासववारुणी॥ फलमशोककरं ज्वरिणां तदा शुभकरा भिषजां च शुभावहाः ॥ १८ ॥
वैद्यके गमनमें अनेक कार्योंकी सिद्धिके लिये भोरा, चांदी, दूध, पानी, मछली, मांस, रक्त, मुरदा, धोयाहुआ वस्त्र, आच्छादितहुआ शीशा इन्होंको देखना हित है ॥ १३ ॥ वैद्यके प्रवेश करनेमें बिलाव, सर्प, किरलिया, गोह ये मार्गको छेदित करें तब एक पैर भी नहीं चलना ॥ १४ ॥ पैर शिथिल होजावें अथवा कपडे ढीले होजावें और बुरावचन, सुनाजावे तब एक पद भी गमन नहीं करना ॥ १५ ॥ गमनकरनेमें जलताहुआ घर दीखे और पानीसे भराहुआ कलशा फूटजावे और वृक्ष गिरपड़े इन्होंको देखकर गमन नहीं करना ॥ १६ ॥ क्रोधके वचनको और बिलावके रोदनको और मनुष्योंके कलह अर्थात् लड़ाईको देखकर गमन नहीं करना ॥ १७ ॥ सोनाका कंकणआदि गहना, फल, फूल, आसव, मदिरा, सुखको देनेवाला फल इनको जो वैद्य गमनमें देखे तो ज्वररोगियोंको सुख होता है ॥ १८ ॥ अथ शकुनाध्यायका उपसंहार । एवं ज्ञात्वा परमनिपुणं पानमन्नादिकानां वीर्य्यं चैषां गुणमपि तथा कोपनं कोपवेगम्॥ आदानं वा पुनरपि चयं कोपनस्योप- चारं वैद्यो विद्वान्भवति भवने पूजितो राजलोकैः॥ १९॥ इति आत्रेयभाषित हारीतोत्तरे द्वितीयस्थाने शकुनवर्णनं नाम नव- मोऽध्यायः ॥९॥ द्वितीयं स्थानं समाप्तम् ॥ २ ॥ ऐसे परमनिपुण पानको और अन्नआदिके वीर्य तथा गुणको और कोपको और कोपके वेगको और आदान और चयको और कोपनके उपचारको जानके वैद्य अपने स्थानमें हो राजालो- गोंसे पूजाके योग्य होता है ॥ १९ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवा- दितहारीतसंहिताभाषाटीकायां द्वितीयस्थाने शकुनकथनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ यहां द्वितीयस्थान समाप्त हुआ ॥ २ ॥ अथ तृतीयस्थानम् । अथ प्रथमोऽध्यायः १. अथ औषधपरिज्ञानविधान । आत्रेय उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि रोगसंकरकारणम् ॥ श्रमाद्व्यायामरोधाद्वा चिन्ताशोकभयादपि ॥१॥ क्रोधादौषध- गन्धेन क्षयाद्धातोर्विशेषतः॥ उदीर्य्य कोष्ठादग्निश्च रक्तपित्तं तथा बहिः॥ त्वचाश्रितश्च सम्भूय ज्वरं तस्मात्करोति हि ॥ २ ॥ ११
( १६२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- आत्रेयजी कहते हैं-अब रोगोंके मिलापके कारणको कहता हूँ, परिश्रमसे और कस- रतको नहीं करनेसे और चिंता, शोक, भयसे ॥ १ ॥ क्रोधसे, ओषधीके गन्धसे और विशेष करके धातुके क्षयसे कोष्ठके अग्निको बढ़ाके और खालके बाहिर आश्रित हुए रक्तपित्त ज्वरको करते हैं ॥ २ ॥ अथ ज्वरसे उत्पन्न होनेवाले रोग । उक्तहेतुर्ज्वरो वापि ज्वरान्मन्दज्वरो भवेत् ॥३॥ मन्दान्मन्द- तमो ज्ञेयस्तस्मादम्लातिसेवनात्॥जायत कामलस्तस्मात्प्ररूढे स्याद्धलीमकम् ॥४॥ हलीमकाद्भवेत्पाण्डुस्तस्माद्यक्ष्मा प्रकी- र्त्तितः ॥ यक्ष्मणो जायते शोफः शोफादुदरमेव च॥५॥तस्मा- द्गुलमश्च वाताद्यं गुल्माच्छासोऽथशूलिता॥मन्दाग्नित्वं भवेत्तस्मा- त्स्वरभेदोऽथ रोधनः॥६॥एतेषां सवरोगाणामुत्पत्तिः स्याज्ज्व- रेण तु ॥ ज्वरेण मृत्युर्विज्ञेयो न मृत्युः स्याज्ज्वरं विना ॥ ७ ॥ ऐसे कहे हुए कारणवाला ज्वर है उस ज्वरसे मन्दज्वर भी होता है ॥ ३ ॥ और मन्दज्वरसे अतिमन्दज्वर होता है तब खट्टे पदार्थको अत्यंत सेवनेसे कामलारोग उपजता है और उससे हलीमकरोग उपजता है॥४॥और हलीमकसे पांडुरोग उपजता है और पांडुरोगसे यक्ष्मारोग उप- जता है यक्ष्मारोगसे शोजारोग उपजता है और शोजारोगसे उदररोग उपजता है॥५॥उस उदररो- गसे वातका गुल्मरोग उपजता है और गुल्मसे श्वास रोग और शूल उपजता है, उस शूलसे मन्दा- ग्निरोग और मन्दाग्निसे स्वरभेदरोग उपजता है ॥ ६ ॥ ज्वरसे सब रोगोंकी उत्पत्ति होती है ज्वरसे मृत्यु होता है, विशेष करके ज्वरके बिना मरण नहीं होता ॥ ७ ॥ अथ ज्वरसे उत्पन्न होनेवाले अन्यप्रकारके रोग । शृणु भेषजरोगज्ञ द्वितीयं रोगसंकरम् ॥ मन्दज्वरो भवेन्नॄणा- मतीसारस्ततो ज्वरः ॥ ८ ॥ तेन चापि भवेद्धिक्का शोषो मोहो अमोऽरुचिः ॥ एतेषां शोफतो मृत्युस्तृतीयः कथ्यतेऽधुना॥९॥ हे औषध और रोगको जाननेवाले! दूसरे रोगसंकरको सुनो, मनुष्योंके मन्दज्वर होता है उससे अतीसार उपजता है और अतीसारके पीछे ज्वर उपजता है ॥ ८ ॥ और उससे हिचकी, शोष, मोह, भ्रम, अरुचि ये रोग उपजते हैं इन सबोंकी शोजासे मृत्यु होती है । अब तीसरा रोगसंकर कहाजाता है ॥ ९ ॥ अथ दिनमें शयनकरनेसे होनेवाले रोग । दिवास्वप्नादिदोषैर्वा प्रतिश्यायश्च जायते ॥ तस्मात्कासः समु-
दिष्टः कासात्पीनस एव च ॥ १० ॥ तस्मात्क्षयः क्षयाच्छोफो शोफेनाऽपि मृतिं व्रजेत् ॥ दिनमें शयन करने आदिसे जुखाम उपजताहै उस जुखामसे खाँसी और खाँसीसे पीनस उप- जता है॥१०॥ और पीनससे क्षय और क्षयसे शोजा उपजता है और शोजासे मरजाता है ॥ अथ महाभयंकर रोग। ज्वरः क्षयश्च यक्ष्मा च कुष्ठगुल्मार्शसंग्रहाः ॥ ११॥ शर्करा मेह उन्मादोऽपस्मारस्तु भगन्दरः॥ एते महाघोरतरा याप्यं कुर्वन्ति मानवम् ॥ १२ ॥ और ज्वर, क्षय, राजरोग, कुष्ठ, गुल्म, बवासीर ॥ ११ ॥ शर्करा,प्रमेह, उन्माद,मृगीरोग, भगंदर ये अत्यंत महा घोर रोग हैं, ये मनुष्यको कष्टसाध्य कर देते हैं ॥ १२ ॥ अथ सर्वव्याधियोंका हेतु । वातपित्तादयो दोषास्तथा श्लेष्मसमुद्भवाः ॥ जायन्ते व्याधयः सर्वे तेषां वक्ष्याम्युपक्रमम् ॥ १३ ॥ वात और पित्तसे तथा कफसे उपजे सब रोग होते हैं उनके उपचारको कहता हूं ॥ १३॥ अथ वातादिदोषोंका पाचनकाल । वातः पचति सप्ताहात्त्रिरात्रात्पित्तमेव च॥ श्लेष्मा सार्द्धदिनेनापि विपचेद्भिषजां वर ॥ १४ ॥ द्वन्द्वजं वातपित्तञ्च नवरात्रेण पच्यते ॥ श्लेष्मवातौ दशाहेन पञ्चाहात्पित्तश्लैष्मिकम् ॥१५॥ शमनाय च द्वन्द्वानां तुर्याह्नात्पाचनं तथा ॥ त्रिदोषस्य च घोरस्य पाचनं द्वादशे दिने ॥ १६ ॥ सन्निपातश्च पचति चतुर्दशदिनैरपि ॥ वातदोष सात दिनमें पकता है, पित्तदोष तीन दिनमें पकता है, हे वैद्यवर ! कफदोष डेढ़दिनमें पकजाता है ॥ १४ ॥ मिलेहुए वात पित्त ९ नव दिनोंमें पकते हैं, मिलेहुए कफ और वात दशदिनमें पकते हैं, मिलेहुए पित्त और कफ पांच दिनमें पकते हैं ॥ १५ ॥ मिलेहुए दो दोषोंकी शांतिके लिये चार दिनमें पाचन हित है और घोररूपत्रिदोषमें बारहवें दिन पाचन हित् है ॥ १६ ॥ चौदहदिनोंकरके भी सन्निपात पकता है ॥ अथ पाचनादिक्रियाका समय । ज्ञात्वा दोषबलं पक्कं तस्माद्देयन्तु पाचनम् ॥ १७ ॥ युक्तं निदानलक्षैस्तु तस्मात्संशमनक्रिया ॥
( १६४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- सो दोषको पाकके बलको जान पीछे पाचन देना चाहिये ॥ १७ ॥ निदानके लक्षणोंसे युक्तहुएको जान पीछे संशमनक्रिया करनी ॥ अथ धातुगतदोषोंका पाचनकाल । सप्ताहेनापि पच्यन्ते सप्तधातुगता मलाः ॥१८॥ चिरादपि हि पच्यन्ते सन्निपातज्वरे मलाः॥विरामश्चाप्यतः प्रोक्तो ज्वरः प्रा- योऽष्टमेऽहनि ॥ भवेत्सप्तमेऽहनि विरामज्वरकारणम् ॥ १९ ॥ और सात धातुओंमें प्राप्त हुए दोष सात दिनोंमें पकजाते हैं ॥१८॥ किन्तु सन्निपात ज्वरम मल देरसे भी पकते हैं । इसी लिये ज्वरका विराम आठवें दिन कहा गया है । सातवें दिन ज्वरकी शांतिका कारण नहीं होता है ॥ १९ ॥ अथ अपक्कदोषमें औषधका निषेध । विचार्य भेषजं दद्यादजीर्णे मतिमान्भिषक् ॥ मन्दो हि सुतरामग्निर्भेषजं न विपाचयेत् ॥ २० ॥ तव विचार कर बुद्धिमान् वैद्य औषधको नवीनज्वरमें देवे क्योंकि, अतिमंदहुआ अग्नि औषधको नहीं पकाता है अर्थात् नवीनज्वरमें औषध विना विचारे नहीं देना ॥ २० ॥ अथ लंघनका उपचार । सर्वेषु दोषसामेषु पाचनं लङ्घनं स्मृतम् ॥ सम्पूर्ण कच्चे दोषोंके पचानेवाला लंघन ही कहा गया है ॥ अथ लंघनप्रकरण । लङ्घितं मध्यलङ्घितं स्यादातिलङ्घितमेव च॥ २१ ॥ लक्षणं वक्ष्यते चैषां मनुष्याणां शृणुष्व हि ॥ २२ ॥ मनुष्योंके लंघन, मध्यलंघन, अतिलंघन इन भेदोंसे लंघन, तीन प्रकारका है ॥ २१ ॥ इन्होंके लक्षण कहेजाते हैं वे मुझसे सुनो ॥२२ ॥ अथ शुद्धलंघितका लक्षण । गतक्लमोऽरुचिम्लानिरिन्द्रियाणां प्रसन्नता ॥ लङ्घने दोषपाकस्तु शुद्धलङ्घितलक्षणम् ॥ २३ ॥ ग्लानि जातीरही है, रुचि उपजे और इन्द्रियोंकी प्रसन्नता रहे और लंघनमें दोष पकजावे ये शुद्धलंघनके लक्षण हैं ॥ २३ ॥ अथ मध्यमलंघितका लक्षण । किञ्चित्क्लमोऽरुचिग्लानिरिन्द्रियाणां विवर्णता ॥ बहुतृष्णालप-
अ० १ ] भाषाटीकासमेत। ( १६५ ) क्षुच्चापि श्रमश्चैव भिषग्वर ॥ २४ ॥ किञ्चित्संस्निग्धता गात्रे रुचिबाधातिबन्धता॥मध्यपाकी च दोषः स्यान्मध्य- लंघितलक्षणम् ॥ २५ ॥ कुछ ग्लानि रहे, रुचि भी अल्प हो, इन्द्रियोंका वर्ण बदल जावे, बहुत तृषा लगे और भूख भी थोडी लगे. और परिश्रम उपजे ॥ २४॥और शरीरमें कुछ चिकनाईपना उपजे, रुचिकी पीड़ा हो और बंधा पड़ जावे और दोष भी कुछ पके और कुछ नहीं पके ये मध्यलंघितके लक्षण हैं ॥ २५ ॥ अथ अतिलंघितका लक्षण । वैकल्यं जायते तन्द्राविङ्भेदश्च विनिद्रता॥वेपथुश्च शिरोऽर्तिश्च क्षुत्क्षामं शूलमेव च ॥२६ ॥ श्यामास्यं प्लावनं नेत्रे मूर्च्छामोह- श्रमातुरम् ॥ अतिलंघितमेतैस्तु लक्षणं संविभावयेत् ॥२७ ॥ विकलपना, तंद्रा, विष्टाका पतलापन, ये उपजें और नींद आवे नहीं, शरीरमें कंपन और शिरमें दर्द हो, अल्प भूख लगे और शूल उपजे ॥ २६ ॥ कालामुख हो जावे और नेत्रोंसे पानी झिरे और मूर्छा, मोह, परिश्रम इन्होंसे पीडित हो ये सब लक्षण अतिलंघनके हैं ॥ २७ ॥ अथ लंघित करनेमें अयोग्य रोगी । वेलाज्वरे भूतज्वरे तथा पित्तज्वरेऽपि च॥आयासे क्रोधज वापि भयकामज्वरेऽपि च ॥२८॥ एतेषां लंघनं नैव कारयेद्भिषगु- त्तमः॥ २९ ॥ बालं वृद्धं कृशं क्षीणमतीसारव्रणातुरम्॥गुर्विणीं सुकुमारञ्च लंघयेन्न कदाचन ॥ ३० ॥ वेलाज्वर (समय बांधकर आनेवाला), भूतज्वर, पित्तज्वर, परिश्रमका ज्वर, क्रोधज्वर, भयज्वर और कामज्वर ॥२८॥ इनमें वैद्य लंघन नहीं करावे ॥ २९ ॥ बालक, वृद्ध, कृश, क्षीण, अती- साररोगी, घावरोगी, गर्भवाली स्त्री, कोमल मनुष्य इनको कभी लंघन नहीं कराना ॥३०॥ अथ लंघन करनेयोग्य रोगी । सामे मन्दज्वरे तीव्रे रुचिविड्बन्धकेऽपि च ॥ अजीर्णे तु प्रशस्तञ्च लंघनं मात्रयान्वितम् ॥ ३१ ॥ आमसहित मंदज्वर, तीक्ष्णज्वर, अरुचि, विष्टाका बंधा, अजीर्ण इनमें भी मात्रासे लंघन कराना श्रेष्ठ है ॥ ३१ ॥ अथ आमज्वरके लक्षण । स्निग्धत्वञ्चातिगात्राणामुदरं गर्जयेद्भृशम् ॥ शिरोऽर्तिर्जठरा- ध्मानः प्रततं कण्ठकूजनम् ॥ ३२ ॥ अरुचिः पीतता मूत्रे निद्रातन्द्रातुरं नरम् ॥ आमज्वरं च विज्ञाय लंघयेद्भिष- गुत्तमः ॥ ३३ ॥
( १६६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- शरीरके अंग अत्यंत चिकने हो जावे और पेट अत्यन्त बोले, शिरमें पीड़ा हो और पेटपै अफारा उपजे और निरंतर कंठ जलता और बोलता रहे ॥३२॥ और अरुचि हो,नेत्रोंमें पीला- पन उपजे,नींद और तंद्रासे रोगी पीडित होवे ये आमज्वरके लक्षण हैं । इस रोगवालेको कुशल वैद्य लंघन करवावे ॥ ३३ ॥ अथ छःप्रकारके लंघन । अनशनवमनविरेचनरक्तस्रुतिंतप्ततोयपानैः ॥ स्वेदनकर्मसहितैः षड्विधं लंघनं गदितम् ॥ ३४ ॥ नहीं खाना,वमन,जुलाब,रक्तका निकालना,गरम पानीको पीना,स्वेद अर्थात् पसीनाका देना इन भेदोंसे लंघन छः प्रकारका कहा है ॥ ३४ ॥ अथ विरतज्वरलक्षण । क्षुत्क्षामं श्रमशैथिल्यं भ्रमवेगज्वरातुरम् ॥ अन्तर्दाहं रक्तमूत्रं विरामज्वरलक्षणम् ॥ ३५ ॥ भूख थोड़ी लगे हलकापन हो,श्रमसे शिथिलपना हो और भ्रम,वेग, ज्वर इनसे रोगी पीड़ि- त होवे और शरीरके भीतर दाह रहे और लाल मूत्र उतरे ये विरामज्वरके लक्षण हैं अर्थात् ये लक्षण उपजें तब जानना कि, ज्वर उतरनेवाला है ॥ ३५ ॥ अथ दोषपरत्वसे लंघनकी मर्यादा । वातिको लंघनैः षड्भिः पैत्तिकस्तु दिनत्रयम् ॥ सप्तभिःपचते श्लेष्मा दृष्ट्वा लंघनमाचरेत् ॥ ३६ ॥ त्रिदोषो दशरात्राणि पचते लंघनैस्तु सः ॥ दिने पञ्चदशे प्राप्ते पचते सान्निपातिकः ॥३७॥ मुञ्चेद्वा आतुरं हन्ति भवेद्वा विषमज्वरः ॥ वातदोष छः लंघनोंसे पकता है,पित्तदोष तीन दिनमें पकता है,कफदोष सात लंघनोंसे पकता है ऐसे देखके लंघनका आचरण करे ॥ ३६ ॥ त्रिदोष लंघनोंसे दशदिनकरके पकता है और पंद्रहदिनोंकरके सन्निपातदोष पकता है ॥ ३७ ॥ इनकालोंमें ये दोष रोगीको छोड़ देते हैं अथवा मारते हैं,किंवा विषमज्वरको उपजाते हैं ॥ अथ वयपरत्वसे दोषोंके कोपका प्रकार । बाल्ये रक्तमया दोषाः कफपित्तादनंतरम् ॥ ३८ ॥ षोडशे तु समे प्राप्ते त्रिदोषप्रभवा गदाः ॥ पञ्चविंशतिमे प्राप्ते ज्वरो वै सान्निपातिकः ॥ ३९ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
अ० १ ] भाषाटीकासमेता । ( १६७ ) मनुष्यकी बालकअवस्थामें रक्तकी प्रधानतावाले दोष रहते हैं, पीछे कफ और पित्तकी अधिकतावाले दोष हो जाते हैं ॥ ३८ ॥ सोलहवां वर्ष प्राप्त होते ही त्रिदोषसे रोग उपजते हैं और विशेषकरके पचीस वर्षतक सन्निपातसे ज्वररोग उपजता है ॥ ३९ ॥ अथ ज्वरवालेको क्वाथ देनेका समय । वातपित्तकफैरेव रसरक्तसमुच्चयात् ॥ जायते यो ज्वरः सम्यक् पक्वे क्वाथं तु दापयेत्॥४०॥ वात, पित्त, कफ, रस, रक्त इनके संचयसे जो ज्वर उपजे वह जब अच्छीतरह पक- जावे तब क्वाथको देवे ॥ ४० ॥ अथ क्वाथका प्रकार । क्वाथः षष्ठविधः प्रोक्तः पाचनः शमनस्तथा ॥ दीपनः क्लेदनः शोषी सन्तर्पणो विशेषतः ॥ ४१ ॥ पाचन, शमन, दीपन, क्लेदन, शोषण, संतर्पण इनभेदोंसे क्वाथ छःप्रकारका कहा है ॥४१॥ अथ छः प्रकारसें क्वाथ देनेका समय । पाचनञ्च नरे देयं निशासु प्रविजानता॥पूर्वाह्ने शमनो देयोऽ- पराह्ने दीपनः स्मृतः ॥४२॥ सन्तर्पणो भेदनश्च कल्ये पानाय दापयेत् ॥ शोषणोऽपि प्रभाते च क्वाथःपाने प्रकीर्तितः॥४३॥ वैद्यको पाचनक्वाथ रात्रिमें देना और शमनक्वाथ दिनके प्रथमकालमें देना और दुपहरीके पश्चात् दीपनक्वाथ देना ॥ ४२ ॥ संतर्पण और भेदनक्वाथ प्रभातमें देना और शोषणक्वाथ भी प्रभातमें ही देना ॥ ४३ ॥ अथ औषधादिक देनेके समयकी संज्ञा । रात्रौ यः प्रथमो यामो भूतवेला प्रकीर्तिता ॥ द्वितीयं निशि इत्याहुर्निशीथञ्च ततः परम्॥ ४४॥ गणरात्रं ततो ज्ञेयं काल- मप्राप्तराशिनम्॥पूर्वापराह्लमध्याह्नाःपरार्द्धं दिनशेषकाः ॥४५॥ पूर्वे दिनावसाने च भेषजानामुपक्रमः ॥ ४६ ॥ रात्रिके प्रथम यामको भूतवेला कहते हैं और दूसरे यामको निशि कहते हैं और उससे परे निशीथ कहाता है ॥ ४४ ॥ उससे परे गणरात्र कहाता है और पूर्वाह्न, मध्याह्न, अप- राह्न, परार्द्ध, दिनशेष ऐसी संज्ञा हैं: ४५ ॥ प्रभातमें और सायंकालमें ओषधियोंका उपचार है ॥ ४६ ॥