हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैद्यके गमनमें अनेक कार्योंकी सिद्धिके लिये भोरा, चांदी, दूध, पानी, मछली, मांस, रक्त, मुरदा, धोयाहुआ वस्त्र, आच्छादितहुआ शीशा इन्होंको देखना हित है ॥ १३ ॥ वैद्यके प्रवेश करनेमें बिलाव, सर्प, किरलिया, गोह ये मार्गको छेदित करें तब एक पैर भी नहीं चलना ॥ १४ ॥ पैर शिथिल होजावें अथवा कपडे ढीले होजावें और बुरावचन, सुनाजावे तब एक पद भी गमन नहीं करना ॥ १५ ॥ गमनकरनेमें जलताहुआ घर दीखे और पानीसे भराहुआ कलशा फूटजावे और वृक्ष गिरपड़े इन्होंको देखकर गमन नहीं करना ॥ १६ ॥ क्रोधके वचनको और बिलावके रोदनको और मनुष्योंके कलह अर्थात् लड़ाईको देखकर गमन नहीं करना ॥ १७ ॥ सोनाका कंकणआदि गहना, फल, फूल, आसव, मदिरा, सुखको देनेवाला फल इनको जो वैद्य गमनमें देखे तो ज्वररोगियोंको सुख होता है ॥ १८ ॥ अथ शकुनाध्यायका उपसंहार । एवं ज्ञात्वा परमनिपुणं पानमन्नादिकानां वीर्य्यं चैषां गुणमपि तथा कोपनं कोपवेगम्॥ आदानं वा पुनरपि चयं कोपनस्योप- चारं वैद्यो विद्वान्भवति भवने पूजितो राजलोकैः॥ १९॥ इति आत्रेयभाषित हारीतोत्तरे द्वितीयस्थाने शकुनवर्णनं नाम नव- मोऽध्यायः ॥९॥ द्वितीयं स्थानं समाप्तम् ॥ २ ॥ ऐसे परमनिपुण पानको और अन्नआदिके वीर्य तथा गुणको और कोपको और कोपके वेगको और आदान और चयको और कोपनके उपचारको जानके वैद्य अपने स्थानमें हो राजालो- गोंसे पूजाके योग्य होता है ॥ १९ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवा- दितहारीतसंहिताभाषाटीकायां द्वितीयस्थाने शकुनकथनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ यहां द्वितीयस्थान समाप्त हुआ ॥ २ ॥ अथ तृतीयस्थानम् । अथ प्रथमोऽध्यायः १. अथ औषधपरिज्ञानविधान । आत्रेय उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि रोगसंकरकारणम् ॥ श्रमाद्व्यायामरोधाद्वा चिन्ताशोकभयादपि ॥१॥ क्रोधादौषध- गन्धेन क्षयाद्धातोर्विशेषतः॥ उदीर्य्य कोष्ठादग्निश्च रक्तपित्तं तथा बहिः॥ त्वचाश्रितश्च सम्भूय ज्वरं तस्मात्करोति हि ॥ २ ॥ ११