भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 194

( १६२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- आत्रेयजी कहते हैं-अब रोगोंके मिलापके कारणको कहता हूँ, परिश्रमसे और कस- रतको नहीं करनेसे और चिंता, शोक, भयसे ॥ १ ॥ क्रोधसे, ओषधीके गन्धसे और विशेष करके धातुके क्षयसे कोष्ठके अग्निको बढ़ाके और खालके बाहिर आश्रित हुए रक्तपित्त ज्वरको करते हैं ॥ २ ॥ अथ ज्वरसे उत्पन्न होनेवाले रोग । उक्तहेतुर्ज्वरो वापि ज्वरान्मन्दज्वरो भवेत् ॥३॥ मन्दान्मन्द- तमो ज्ञेयस्तस्मादम्लातिसेवनात्॥जायत कामलस्तस्मात्प्ररूढे स्याद्धलीमकम् ॥४॥ हलीमकाद्भवेत्पाण्डुस्तस्माद्यक्ष्मा प्रकी- र्त्तितः ॥ यक्ष्मणो जायते शोफः शोफादुदरमेव च॥५॥तस्मा- द्गुलमश्च वाताद्यं गुल्माच्छासोऽथशूलिता॥मन्दाग्नित्वं भवेत्तस्मा- त्स्वरभेदोऽथ रोधनः॥६॥एतेषां सवरोगाणामुत्पत्तिः स्याज्ज्व- रेण तु ॥ ज्वरेण मृत्युर्विज्ञेयो न मृत्युः स्याज्ज्वरं विना ॥ ७ ॥ ऐसे कहे हुए कारणवाला ज्वर है उस ज्वरसे मन्दज्वर भी होता है ॥ ३ ॥ और मन्दज्वरसे अतिमन्दज्वर होता है तब खट्टे पदार्थको अत्यंत सेवनेसे कामलारोग उपजता है और उससे हलीमकरोग उपजता है॥४॥और हलीमकसे पांडुरोग उपजता है और पांडुरोगसे यक्ष्मारोग उप- जता है यक्ष्मारोगसे शोजारोग उपजता है और शोजारोगसे उदररोग उपजता है॥५॥उस उदररो- गसे वातका गुल्मरोग उपजता है और गुल्मसे श्वास रोग और शूल उपजता है, उस शूलसे मन्दा- ग्निरोग और मन्दाग्निसे स्वरभेदरोग उपजता है ॥ ६ ॥ ज्वरसे सब रोगोंकी उत्पत्ति होती है ज्वरसे मृत्यु होता है, विशेष करके ज्वरके बिना मरण नहीं होता ॥ ७ ॥ अथ ज्वरसे उत्पन्न होनेवाले अन्यप्रकारके रोग । शृणु भेषजरोगज्ञ द्वितीयं रोगसंकरम् ॥ मन्दज्वरो भवेन्नॄणा- मतीसारस्ततो ज्वरः ॥ ८ ॥ तेन चापि भवेद्धिक्का शोषो मोहो अमोऽरुचिः ॥ एतेषां शोफतो मृत्युस्तृतीयः कथ्यतेऽधुना॥९॥ हे औषध और रोगको जाननेवाले! दूसरे रोगसंकरको सुनो, मनुष्योंके मन्दज्वर होता है उससे अतीसार उपजता है और अतीसारके पीछे ज्वर उपजता है ॥ ८ ॥ और उससे हिचकी, शोष, मोह, भ्रम, अरुचि ये रोग उपजते हैं इन सबोंकी शोजासे मृत्यु होती है । अब तीसरा रोगसंकर कहाजाता है ॥ ९ ॥ अथ दिनमें शयनकरनेसे होनेवाले रोग । दिवास्वप्नादिदोषैर्वा प्रतिश्यायश्च जायते ॥ तस्मात्कासः समु-