हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
वैद्यके गमनमें अनेक कार्योंकी सिद्धिके लिये भोरा, चांदी, दूध, पानी, मछली, मांस, रक्त, मुरदा, धोयाहुआ वस्त्र, आच्छादितहुआ शीशा इन्होंको देखना हित है ॥ १३ ॥ वैद्यके प्रवेश करनेमें बिलाव, सर्प, किरलिया, गोह ये मार्गको छेदित करें तब एक पैर भी नहीं चलना ॥ १४ ॥ पैर शिथिल होजावें अथवा कपडे ढीले होजावें और बुरावचन, सुनाजावे तब एक पद भी गमन नहीं करना ॥ १५ ॥ गमनकरनेमें जलताहुआ घर दीखे और पानीसे भराहुआ कलशा फूटजावे और वृक्ष गिरपड़े इन्होंको देखकर गमन नहीं करना ॥ १६ ॥ क्रोधके वचनको और बिलावके रोदनको और मनुष्योंके कलह अर्थात् लड़ाईको देखकर गमन नहीं करना ॥ १७ ॥ सोनाका कंकणआदि गहना, फल, फूल, आसव, मदिरा, सुखको देनेवाला फल इनको जो वैद्य गमनमें देखे तो ज्वररोगियोंको सुख होता है ॥ १८ ॥ अथ शकुनाध्यायका उपसंहार । एवं ज्ञात्वा परमनिपुणं पानमन्नादिकानां वीर्य्यं चैषां गुणमपि तथा कोपनं कोपवेगम्॥ आदानं वा पुनरपि चयं कोपनस्योप- चारं वैद्यो विद्वान्भवति भवने पूजितो राजलोकैः॥ १९॥ इति आत्रेयभाषित हारीतोत्तरे द्वितीयस्थाने शकुनवर्णनं नाम नव- मोऽध्यायः ॥९॥ द्वितीयं स्थानं समाप्तम् ॥ २ ॥ ऐसे परमनिपुण पानको और अन्नआदिके वीर्य तथा गुणको और कोपको और कोपके वेगको और आदान और चयको और कोपनके उपचारको जानके वैद्य अपने स्थानमें हो राजालो- गोंसे पूजाके योग्य होता है ॥ १९ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवा- दितहारीतसंहिताभाषाटीकायां द्वितीयस्थाने शकुनकथनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ यहां द्वितीयस्थान समाप्त हुआ ॥ २ ॥ अथ तृतीयस्थानम् । अथ प्रथमोऽध्यायः १. अथ औषधपरिज्ञानविधान । आत्रेय उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि रोगसंकरकारणम् ॥ श्रमाद्व्यायामरोधाद्वा चिन्ताशोकभयादपि ॥१॥ क्रोधादौषध- गन्धेन क्षयाद्धातोर्विशेषतः॥ उदीर्य्य कोष्ठादग्निश्च रक्तपित्तं तथा बहिः॥ त्वचाश्रितश्च सम्भूय ज्वरं तस्मात्करोति हि ॥ २ ॥ ११
( १६२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- आत्रेयजी कहते हैं-अब रोगोंके मिलापके कारणको कहता हूँ, परिश्रमसे और कस- रतको नहीं करनेसे और चिंता, शोक, भयसे ॥ १ ॥ क्रोधसे, ओषधीके गन्धसे और विशेष करके धातुके क्षयसे कोष्ठके अग्निको बढ़ाके और खालके बाहिर आश्रित हुए रक्तपित्त ज्वरको करते हैं ॥ २ ॥ अथ ज्वरसे उत्पन्न होनेवाले रोग । उक्तहेतुर्ज्वरो वापि ज्वरान्मन्दज्वरो भवेत् ॥३॥ मन्दान्मन्द- तमो ज्ञेयस्तस्मादम्लातिसेवनात्॥जायत कामलस्तस्मात्प्ररूढे स्याद्धलीमकम् ॥४॥ हलीमकाद्भवेत्पाण्डुस्तस्माद्यक्ष्मा प्रकी- र्त्तितः ॥ यक्ष्मणो जायते शोफः शोफादुदरमेव च॥५॥तस्मा- द्गुलमश्च वाताद्यं गुल्माच्छासोऽथशूलिता॥मन्दाग्नित्वं भवेत्तस्मा- त्स्वरभेदोऽथ रोधनः॥६॥एतेषां सवरोगाणामुत्पत्तिः स्याज्ज्व- रेण तु ॥ ज्वरेण मृत्युर्विज्ञेयो न मृत्युः स्याज्ज्वरं विना ॥ ७ ॥ ऐसे कहे हुए कारणवाला ज्वर है उस ज्वरसे मन्दज्वर भी होता है ॥ ३ ॥ और मन्दज्वरसे अतिमन्दज्वर होता है तब खट्टे पदार्थको अत्यंत सेवनेसे कामलारोग उपजता है और उससे हलीमकरोग उपजता है॥४॥और हलीमकसे पांडुरोग उपजता है और पांडुरोगसे यक्ष्मारोग उप- जता है यक्ष्मारोगसे शोजारोग उपजता है और शोजारोगसे उदररोग उपजता है॥५॥उस उदररो- गसे वातका गुल्मरोग उपजता है और गुल्मसे श्वास रोग और शूल उपजता है, उस शूलसे मन्दा- ग्निरोग और मन्दाग्निसे स्वरभेदरोग उपजता है ॥ ६ ॥ ज्वरसे सब रोगोंकी उत्पत्ति होती है ज्वरसे मृत्यु होता है, विशेष करके ज्वरके बिना मरण नहीं होता ॥ ७ ॥ अथ ज्वरसे उत्पन्न होनेवाले अन्यप्रकारके रोग । शृणु भेषजरोगज्ञ द्वितीयं रोगसंकरम् ॥ मन्दज्वरो भवेन्नॄणा- मतीसारस्ततो ज्वरः ॥ ८ ॥ तेन चापि भवेद्धिक्का शोषो मोहो अमोऽरुचिः ॥ एतेषां शोफतो मृत्युस्तृतीयः कथ्यतेऽधुना॥९॥ हे औषध और रोगको जाननेवाले! दूसरे रोगसंकरको सुनो, मनुष्योंके मन्दज्वर होता है उससे अतीसार उपजता है और अतीसारके पीछे ज्वर उपजता है ॥ ८ ॥ और उससे हिचकी, शोष, मोह, भ्रम, अरुचि ये रोग उपजते हैं इन सबोंकी शोजासे मृत्यु होती है । अब तीसरा रोगसंकर कहाजाता है ॥ ९ ॥ अथ दिनमें शयनकरनेसे होनेवाले रोग । दिवास्वप्नादिदोषैर्वा प्रतिश्यायश्च जायते ॥ तस्मात्कासः समु-
दिष्टः कासात्पीनस एव च ॥ १० ॥ तस्मात्क्षयः क्षयाच्छोफो शोफेनाऽपि मृतिं व्रजेत् ॥ दिनमें शयन करने आदिसे जुखाम उपजताहै उस जुखामसे खाँसी और खाँसीसे पीनस उप- जता है॥१०॥ और पीनससे क्षय और क्षयसे शोजा उपजता है और शोजासे मरजाता है ॥ अथ महाभयंकर रोग। ज्वरः क्षयश्च यक्ष्मा च कुष्ठगुल्मार्शसंग्रहाः ॥ ११॥ शर्करा मेह उन्मादोऽपस्मारस्तु भगन्दरः॥ एते महाघोरतरा याप्यं कुर्वन्ति मानवम् ॥ १२ ॥ और ज्वर, क्षय, राजरोग, कुष्ठ, गुल्म, बवासीर ॥ ११ ॥ शर्करा,प्रमेह, उन्माद,मृगीरोग, भगंदर ये अत्यंत महा घोर रोग हैं, ये मनुष्यको कष्टसाध्य कर देते हैं ॥ १२ ॥ अथ सर्वव्याधियोंका हेतु । वातपित्तादयो दोषास्तथा श्लेष्मसमुद्भवाः ॥ जायन्ते व्याधयः सर्वे तेषां वक्ष्याम्युपक्रमम् ॥ १३ ॥ वात और पित्तसे तथा कफसे उपजे सब रोग होते हैं उनके उपचारको कहता हूं ॥ १३॥ अथ वातादिदोषोंका पाचनकाल । वातः पचति सप्ताहात्त्रिरात्रात्पित्तमेव च॥ श्लेष्मा सार्द्धदिनेनापि विपचेद्भिषजां वर ॥ १४ ॥ द्वन्द्वजं वातपित्तञ्च नवरात्रेण पच्यते ॥ श्लेष्मवातौ दशाहेन पञ्चाहात्पित्तश्लैष्मिकम् ॥१५॥ शमनाय च द्वन्द्वानां तुर्याह्नात्पाचनं तथा ॥ त्रिदोषस्य च घोरस्य पाचनं द्वादशे दिने ॥ १६ ॥ सन्निपातश्च पचति चतुर्दशदिनैरपि ॥ वातदोष सात दिनमें पकता है, पित्तदोष तीन दिनमें पकता है, हे वैद्यवर ! कफदोष डेढ़दिनमें पकजाता है ॥ १४ ॥ मिलेहुए वात पित्त ९ नव दिनोंमें पकते हैं, मिलेहुए कफ और वात दशदिनमें पकते हैं, मिलेहुए पित्त और कफ पांच दिनमें पकते हैं ॥ १५ ॥ मिलेहुए दो दोषोंकी शांतिके लिये चार दिनमें पाचन हित है और घोररूपत्रिदोषमें बारहवें दिन पाचन हित् है ॥ १६ ॥ चौदहदिनोंकरके भी सन्निपात पकता है ॥ अथ पाचनादिक्रियाका समय । ज्ञात्वा दोषबलं पक्कं तस्माद्देयन्तु पाचनम् ॥ १७ ॥ युक्तं निदानलक्षैस्तु तस्मात्संशमनक्रिया ॥
( १६४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- सो दोषको पाकके बलको जान पीछे पाचन देना चाहिये ॥ १७ ॥ निदानके लक्षणोंसे युक्तहुएको जान पीछे संशमनक्रिया करनी ॥ अथ धातुगतदोषोंका पाचनकाल । सप्ताहेनापि पच्यन्ते सप्तधातुगता मलाः ॥१८॥ चिरादपि हि पच्यन्ते सन्निपातज्वरे मलाः॥विरामश्चाप्यतः प्रोक्तो ज्वरः प्रा- योऽष्टमेऽहनि ॥ भवेत्सप्तमेऽहनि विरामज्वरकारणम् ॥ १९ ॥ और सात धातुओंमें प्राप्त हुए दोष सात दिनोंमें पकजाते हैं ॥१८॥ किन्तु सन्निपात ज्वरम मल देरसे भी पकते हैं । इसी लिये ज्वरका विराम आठवें दिन कहा गया है । सातवें दिन ज्वरकी शांतिका कारण नहीं होता है ॥ १९ ॥ अथ अपक्कदोषमें औषधका निषेध । विचार्य भेषजं दद्यादजीर्णे मतिमान्भिषक् ॥ मन्दो हि सुतरामग्निर्भेषजं न विपाचयेत् ॥ २० ॥ तव विचार कर बुद्धिमान् वैद्य औषधको नवीनज्वरमें देवे क्योंकि, अतिमंदहुआ अग्नि औषधको नहीं पकाता है अर्थात् नवीनज्वरमें औषध विना विचारे नहीं देना ॥ २० ॥ अथ लंघनका उपचार । सर्वेषु दोषसामेषु पाचनं लङ्घनं स्मृतम् ॥ सम्पूर्ण कच्चे दोषोंके पचानेवाला लंघन ही कहा गया है ॥ अथ लंघनप्रकरण । लङ्घितं मध्यलङ्घितं स्यादातिलङ्घितमेव च॥ २१ ॥ लक्षणं वक्ष्यते चैषां मनुष्याणां शृणुष्व हि ॥ २२ ॥ मनुष्योंके लंघन, मध्यलंघन, अतिलंघन इन भेदोंसे लंघन, तीन प्रकारका है ॥ २१ ॥ इन्होंके लक्षण कहेजाते हैं वे मुझसे सुनो ॥२२ ॥ अथ शुद्धलंघितका लक्षण । गतक्लमोऽरुचिम्लानिरिन्द्रियाणां प्रसन्नता ॥ लङ्घने दोषपाकस्तु शुद्धलङ्घितलक्षणम् ॥ २३ ॥ ग्लानि जातीरही है, रुचि उपजे और इन्द्रियोंकी प्रसन्नता रहे और लंघनमें दोष पकजावे ये शुद्धलंघनके लक्षण हैं ॥ २३ ॥ अथ मध्यमलंघितका लक्षण । किञ्चित्क्लमोऽरुचिग्लानिरिन्द्रियाणां विवर्णता ॥ बहुतृष्णालप-
अ० १ ] भाषाटीकासमेत। ( १६५ ) क्षुच्चापि श्रमश्चैव भिषग्वर ॥ २४ ॥ किञ्चित्संस्निग्धता गात्रे रुचिबाधातिबन्धता॥मध्यपाकी च दोषः स्यान्मध्य- लंघितलक्षणम् ॥ २५ ॥ कुछ ग्लानि रहे, रुचि भी अल्प हो, इन्द्रियोंका वर्ण बदल जावे, बहुत तृषा लगे और भूख भी थोडी लगे. और परिश्रम उपजे ॥ २४॥और शरीरमें कुछ चिकनाईपना उपजे, रुचिकी पीड़ा हो और बंधा पड़ जावे और दोष भी कुछ पके और कुछ नहीं पके ये मध्यलंघितके लक्षण हैं ॥ २५ ॥ अथ अतिलंघितका लक्षण । वैकल्यं जायते तन्द्राविङ्भेदश्च विनिद्रता॥वेपथुश्च शिरोऽर्तिश्च क्षुत्क्षामं शूलमेव च ॥२६ ॥ श्यामास्यं प्लावनं नेत्रे मूर्च्छामोह- श्रमातुरम् ॥ अतिलंघितमेतैस्तु लक्षणं संविभावयेत् ॥२७ ॥ विकलपना, तंद्रा, विष्टाका पतलापन, ये उपजें और नींद आवे नहीं, शरीरमें कंपन और शिरमें दर्द हो, अल्प भूख लगे और शूल उपजे ॥ २६ ॥ कालामुख हो जावे और नेत्रोंसे पानी झिरे और मूर्छा, मोह, परिश्रम इन्होंसे पीडित हो ये सब लक्षण अतिलंघनके हैं ॥ २७ ॥ अथ लंघित करनेमें अयोग्य रोगी । वेलाज्वरे भूतज्वरे तथा पित्तज्वरेऽपि च॥आयासे क्रोधज वापि भयकामज्वरेऽपि च ॥२८॥ एतेषां लंघनं नैव कारयेद्भिषगु- त्तमः॥ २९ ॥ बालं वृद्धं कृशं क्षीणमतीसारव्रणातुरम्॥गुर्विणीं सुकुमारञ्च लंघयेन्न कदाचन ॥ ३० ॥ वेलाज्वर (समय बांधकर आनेवाला), भूतज्वर, पित्तज्वर, परिश्रमका ज्वर, क्रोधज्वर, भयज्वर और कामज्वर ॥२८॥ इनमें वैद्य लंघन नहीं करावे ॥ २९ ॥ बालक, वृद्ध, कृश, क्षीण, अती- साररोगी, घावरोगी, गर्भवाली स्त्री, कोमल मनुष्य इनको कभी लंघन नहीं कराना ॥३०॥ अथ लंघन करनेयोग्य रोगी । सामे मन्दज्वरे तीव्रे रुचिविड्बन्धकेऽपि च ॥ अजीर्णे तु प्रशस्तञ्च लंघनं मात्रयान्वितम् ॥ ३१ ॥ आमसहित मंदज्वर, तीक्ष्णज्वर, अरुचि, विष्टाका बंधा, अजीर्ण इनमें भी मात्रासे लंघन कराना श्रेष्ठ है ॥ ३१ ॥ अथ आमज्वरके लक्षण । स्निग्धत्वञ्चातिगात्राणामुदरं गर्जयेद्भृशम् ॥ शिरोऽर्तिर्जठरा- ध्मानः प्रततं कण्ठकूजनम् ॥ ३२ ॥ अरुचिः पीतता मूत्रे निद्रातन्द्रातुरं नरम् ॥ आमज्वरं च विज्ञाय लंघयेद्भिष- गुत्तमः ॥ ३३ ॥
( १६६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- शरीरके अंग अत्यंत चिकने हो जावे और पेट अत्यन्त बोले, शिरमें पीड़ा हो और पेटपै अफारा उपजे और निरंतर कंठ जलता और बोलता रहे ॥३२॥ और अरुचि हो,नेत्रोंमें पीला- पन उपजे,नींद और तंद्रासे रोगी पीडित होवे ये आमज्वरके लक्षण हैं । इस रोगवालेको कुशल वैद्य लंघन करवावे ॥ ३३ ॥ अथ छःप्रकारके लंघन । अनशनवमनविरेचनरक्तस्रुतिंतप्ततोयपानैः ॥ स्वेदनकर्मसहितैः षड्विधं लंघनं गदितम् ॥ ३४ ॥ नहीं खाना,वमन,जुलाब,रक्तका निकालना,गरम पानीको पीना,स्वेद अर्थात् पसीनाका देना इन भेदोंसे लंघन छः प्रकारका कहा है ॥ ३४ ॥ अथ विरतज्वरलक्षण । क्षुत्क्षामं श्रमशैथिल्यं भ्रमवेगज्वरातुरम् ॥ अन्तर्दाहं रक्तमूत्रं विरामज्वरलक्षणम् ॥ ३५ ॥ भूख थोड़ी लगे हलकापन हो,श्रमसे शिथिलपना हो और भ्रम,वेग, ज्वर इनसे रोगी पीड़ि- त होवे और शरीरके भीतर दाह रहे और लाल मूत्र उतरे ये विरामज्वरके लक्षण हैं अर्थात् ये लक्षण उपजें तब जानना कि, ज्वर उतरनेवाला है ॥ ३५ ॥ अथ दोषपरत्वसे लंघनकी मर्यादा । वातिको लंघनैः षड्भिः पैत्तिकस्तु दिनत्रयम् ॥ सप्तभिःपचते श्लेष्मा दृष्ट्वा लंघनमाचरेत् ॥ ३६ ॥ त्रिदोषो दशरात्राणि पचते लंघनैस्तु सः ॥ दिने पञ्चदशे प्राप्ते पचते सान्निपातिकः ॥३७॥ मुञ्चेद्वा आतुरं हन्ति भवेद्वा विषमज्वरः ॥ वातदोष छः लंघनोंसे पकता है,पित्तदोष तीन दिनमें पकता है,कफदोष सात लंघनोंसे पकता है ऐसे देखके लंघनका आचरण करे ॥ ३६ ॥ त्रिदोष लंघनोंसे दशदिनकरके पकता है और पंद्रहदिनोंकरके सन्निपातदोष पकता है ॥ ३७ ॥ इनकालोंमें ये दोष रोगीको छोड़ देते हैं अथवा मारते हैं,किंवा विषमज्वरको उपजाते हैं ॥ अथ वयपरत्वसे दोषोंके कोपका प्रकार । बाल्ये रक्तमया दोषाः कफपित्तादनंतरम् ॥ ३८ ॥ षोडशे तु समे प्राप्ते त्रिदोषप्रभवा गदाः ॥ पञ्चविंशतिमे प्राप्ते ज्वरो वै सान्निपातिकः ॥ ३९ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
अ० १ ] भाषाटीकासमेता । ( १६७ ) मनुष्यकी बालकअवस्थामें रक्तकी प्रधानतावाले दोष रहते हैं, पीछे कफ और पित्तकी अधिकतावाले दोष हो जाते हैं ॥ ३८ ॥ सोलहवां वर्ष प्राप्त होते ही त्रिदोषसे रोग उपजते हैं और विशेषकरके पचीस वर्षतक सन्निपातसे ज्वररोग उपजता है ॥ ३९ ॥ अथ ज्वरवालेको क्वाथ देनेका समय । वातपित्तकफैरेव रसरक्तसमुच्चयात् ॥ जायते यो ज्वरः सम्यक् पक्वे क्वाथं तु दापयेत्॥४०॥ वात, पित्त, कफ, रस, रक्त इनके संचयसे जो ज्वर उपजे वह जब अच्छीतरह पक- जावे तब क्वाथको देवे ॥ ४० ॥ अथ क्वाथका प्रकार । क्वाथः षष्ठविधः प्रोक्तः पाचनः शमनस्तथा ॥ दीपनः क्लेदनः शोषी सन्तर्पणो विशेषतः ॥ ४१ ॥ पाचन, शमन, दीपन, क्लेदन, शोषण, संतर्पण इनभेदोंसे क्वाथ छःप्रकारका कहा है ॥४१॥ अथ छः प्रकारसें क्वाथ देनेका समय । पाचनञ्च नरे देयं निशासु प्रविजानता॥पूर्वाह्ने शमनो देयोऽ- पराह्ने दीपनः स्मृतः ॥४२॥ सन्तर्पणो भेदनश्च कल्ये पानाय दापयेत् ॥ शोषणोऽपि प्रभाते च क्वाथःपाने प्रकीर्तितः॥४३॥ वैद्यको पाचनक्वाथ रात्रिमें देना और शमनक्वाथ दिनके प्रथमकालमें देना और दुपहरीके पश्चात् दीपनक्वाथ देना ॥ ४२ ॥ संतर्पण और भेदनक्वाथ प्रभातमें देना और शोषणक्वाथ भी प्रभातमें ही देना ॥ ४३ ॥ अथ औषधादिक देनेके समयकी संज्ञा । रात्रौ यः प्रथमो यामो भूतवेला प्रकीर्तिता ॥ द्वितीयं निशि इत्याहुर्निशीथञ्च ततः परम्॥ ४४॥ गणरात्रं ततो ज्ञेयं काल- मप्राप्तराशिनम्॥पूर्वापराह्लमध्याह्नाःपरार्द्धं दिनशेषकाः ॥४५॥ पूर्वे दिनावसाने च भेषजानामुपक्रमः ॥ ४६ ॥ रात्रिके प्रथम यामको भूतवेला कहते हैं और दूसरे यामको निशि कहते हैं और उससे परे निशीथ कहाता है ॥ ४४ ॥ उससे परे गणरात्र कहाता है और पूर्वाह्न, मध्याह्न, अप- राह्न, परार्द्ध, दिनशेष ऐसी संज्ञा हैं: ४५ ॥ प्रभातमें और सायंकालमें ओषधियोंका उपचार है ॥ ४६ ॥
( १६८ ) हारीतसंहिता । तृतीयस्थाने- अथ सात प्रकारके क्वाथ । पाचनो दीपनीयश्च शोधनः शमनस्तथा ॥ तर्पणः क्लेदनः शोषी क्वाथः सप्तविधः स्मृतः ॥ ४७ ॥ पाचन, दीपन, शोधन ,शमन, तर्पण, क्लेदन,शोषण ऐसे सातप्रकारके क्वाथ कहे ॥४७॥ अथ सातप्रकारके क्वाथोंका लक्षण । पाचनोऽर्द्धावशेषी स्याच्छोधनो द्वादशांशकः॥क्लेदनश्चतुरङ्गश्च शमनोऽष्टावशेषितः ॥ ४८ ॥ दीपनीयो दशांशस्तु तर्पणश्च समांशकः॥विशोषी षोडशांशश्च क्वाथभेदाः प्रकीर्त्तिताः४९॥ अग्निसे उबालनेमें आधा शेष रहा पानी पाचनक्वाथ कहाता है और जिसमें बारहवाँ हिस्सा पानी शेष रहे वह शोधन कहाता है, जिसमें चौथा हिस्सा पानी शेष रहे वह क्लेदन कहाता है, जिसमें आठवां हिस्सा पानी शेष रहे, वह शमन कहाता है ॥ ४८॥ जिसमें दशवां हिस्सा पानी शेष रहे वह दीपन कहाता है, जो उवाला मात्र जावे वह तर्पण कहाता है जिसमें सोलहवां हिस्सा पानी शेष रहे वह शोषण कहाता है, ऐसे क्वाथके भेद कहे हैं ॥४९ ॥ अथ सात प्रकारक क्वाथोंका कार्य । पाचनः पचते दोषान्दीपनो दीप्यतेऽनलम्॥शोधनो मलशोधी स्याच्छमनः शमते गदान् ॥ ५० ॥ तर्पणस्तर्पयत धातून्क्लेदी हृत्क्लेदकारकः॥विशोषी शोषमाधत्ते तस्मात्क्वाथं परीक्षयेत्॥ ॥ ५१ ॥ क्लेदी विशोषी विज्ञाय वामनं कारयेन्नरम् ॥ पाचनक्वाथ दोषोंको पकाता है, दीपनक्वाथ जठराग्निको प्रज्वलित करता है, शोधनक्वाथ मलको शोधता है, शमनक्वाथ रोगोंको शांत करता है ॥५० ॥ तर्पणक्वाथ धातुओंको तृप्त करता है, क्लेदनक्वाथ हृदयमें क्लेदको करता है, शोषणक्वाथ शोषको करता है, इसवास्ते क्वाथकी परीक्षा करनी ॥ ५१ ॥ मनुष्यको क्लेदवाला और विशेषकरके शोषवाला जानके वमन कराना चाहिये । अथ क्वाथरक्षणका उपदेश । न लङ्घयेत्क्वाथकृतं नान्तराणि च चालयेत्॥५२॥न शोषये- त्पुनः स्थाप्यो नाशुचौ न चकासते॥ स च क्वाथो न शस्तः स्याद्रोगसङ्करकारणम् ॥ ५३ ॥ न शोषयेत्पुनः क्वाथं न च भूमिगत पुनः ॥ दोषसंशमनेनैते प्रशस्ता गदकर्मणि ॥५४ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
अ० १] भाषाटीकासमेता । ( १६१ ) और बनते हुए काथको लांघे नहीं और बीचमें चलावे किंतु यथायोग्य पकावे ॥ ५२ ॥ स्थापित किये काथको फिर शोषित करे नहीं और अशुद्ध जगहमें काथको बनावे नहीं और अंधेरेमें भी काथ न बनावे क्योंकि ऐसा काथ अच्छा नहीं होता किंतु रोगोंके मिलापका कारण होता है ॥ ५३ ॥ काथको फिर शोषित नहीं करे और पृथिवीमें प्राप्तहुए काथको फिरं नहीं ग्रहण करे क्योंकि रोगके नाशमें दोषको शांत करनेमें काथ श्रेष्ठ है इस लिये ओषधिके काममें काथ अच्छा है ॥ ५४ ॥ अथ क्वाथसंबन्धी अनिष्ट लक्षण। विदीर्य्यत पततेऽपि स्फुटते क्वाथतो जनः ॥ एतेऽनिष्टकराः क्वाथा न दोषशमनाय च ॥ ५५ ॥ बुरे काथसे रोगी विदीर्ण हो जाता है, गिरजाता है और फटजाता है । ये बुरे काथ दुःखको देते हैं और दोषको शांत नहीं करते ॥ ५५ ॥ अथ हीनक्वाथके लक्षण। एतैर्हिलक्षणैर्हीनंक्वाथं दृष्ट्वा परीक्षयेत् ॥ ५६ ॥ कृष्णं नीलं घनं रक्तं पिच्छिलं शिथिलञ्च यत् ॥ दग्धं कुणपगन्धञ्च विस्रग- न्धं विवर्जयेत् ॥५७॥ एतैर साध्यं जानीयाद्रोगिणं नात्र संशयः ॥ इन पूर्वोक्तलक्षणोंसे हीनहुए काथकी परीक्षा करनी ॥ ५६ ॥ काला, नीला, कठिन, लाल झागोंवाला, शिथिल, दग्ध हुआ, मुर्दाकेसी गन्धवाला, कच्ची गन्धवाला, ऐसे काथको वर्ज देवे ॥ ५७ ॥ इस तरहके काथसे रोगी असाध्य होजाता है इसमें संशय नहीं ॥ अथ उत्तम क्वाथका लक्षण । द्रव्यगुणानुवर्णेन द्रव्यगन्धं विनिर्दिशेत् ॥ ५८ ॥ तद्वद्विशुद्धं सच्छायं कषायममृतोपमम् ॥ द्रव्यके गुणके अनुबन्धसे द्रव्यके गन्धको कहे ॥ ५८ ॥ विशेषकरके शुद्ध और सुन्दर कांतिवाला काथ अमृतके समान होता है ॥ अथ वातज्वरमें पाचनका विधि । वातज्वरे लङ्घनान्ते दत्त्वा चान्नं तथोपरि ॥ निशासु पाचनं देयं ज्ञात्वा दोषबलाबलम् ॥ ५९ ॥ वातज्वरमें लंघनके अन्तमें अन्नको देकर रातको पाचन काथ देवे परन्तु दोषके बल और अबलको देखे ॥ ५९ ॥ अथ पित्तज्वर और कफज्वरमें पाचनका विधि। त्रिरात्रे पैत्तिके देयं श्लैष्मिके प्रथमेऽहनि ॥ पित्तके ज्वरमें तीसरे दिन और कफज्वरमें प्रथम दिन पाचन देना ॥
( १७० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ पाचनका निषेध । अविज्ञाते च दोषे च पाचनं न प्रदापयेत् ॥ ६० ॥ और बिना जाने दोषमें पाचन नहीं देना ॥ ६०॥ अथ ज्वरकी मर्यादा । सप्तरात्राद्धि मर्यादा ज्वरेणैवोपलक्ष्यत ॥ तस्मान्नवज्वरे पीतं दोषकृन्न च दोषहृत् ॥ ६१ ॥ ज्वरकी मर्यादा सातदिनकी प्रसिद्ध है इस वास्ते नवीन ज्वरमें पानकिया पाचनरूपी औषधः दोषको करता है किंतु दोषको हरता नहीं है ॥ ६१ ॥ अथ ज्वरमें पाचनादि देनेकी मर्यादा । तस्मादादौ प्रदेयन्तु पाचनञ्च दिनत्रयम् ॥ शमनीयं प्रदेयन्तु पञ्चरात्रं ततः परम् ॥ ६२ ॥ शोधनं दीपनीयन्तु एकरात्रं प्रदा- पयेत् ॥ ६३ ॥ इसलिये आदिमें तीनदिन पाचनको देवे उसके पीछे पांचरात शमनक्वाथको देवे ॥ ६२ ॥ शोधन और दीपनक्वाथको एकदिन देवे ॥ ६३ ॥ अथ क्वाथके विपत्तिका प्रकार । क्वाथपाने क्रमो मूर्च्छा वैक्लव्यञ्च प्रदृश्यते ॥ वमनञ्च तदा प्रोक्तं शमनं पथ्यकेऽपि वा ॥ ६४ ॥ जब क्वाथके पीनेमें ग्लानि, मूर्च्छा, विकलपना ये उपजें तब वमनसंज्ञक औषध देना और पथ्यमें शमनक्वाथ देना ॥ ६४ ॥ अथ पथ्यकी आवश्यकता । सदा पथ्यं प्रयोक्तव्यं नापथ्येन स सिध्यति ॥ औषधेन विना पथ्यैः सिद्धयते भिषगुत्तमैः ॥ ६५ ॥ विना पथ्यं न साध्यः स्यादौषधानां शतैरपि ॥ सब कालमें पथ्य देना चाहिये क्योंकि, अपथ्यसे कोई भी रोग सिद्ध नहीं होता किंतु ओष- धिके बिना भी पथ्योंकरके रोग शांत हो जाता है ॥ ६५ ॥ सैकड़ों औषधियोंको सेवतेहुए भी पथ्यके बिना रोग शांत नहीं होता ॥ अथ ज्वरितको पथ्यभोजनका उपदेश । ज्वरितो हितमश्नीयाद्यद्यप्यस्यारुचिर्भवेत् ॥६६॥ अन्नकाले- ष्वभुञ्जानो हीयत म्रियतेऽपि वा ॥ स क्षीणः कृच्छ्रतां याति
अ० १ ] भाषाटीकासमेता । ( १७१ ) यात्यसाध्यत्वमेव च ॥ ६७॥ तस्माद्रक्षेद्बलं पुंसां बलशान्तिर्हि जीवितम् ॥ और ज्वरवाला रोगी पथ्यको सेवे चाहे रोगीको अरुचि भी हो तब भी ॥६६॥ अन्नकालमें नहीं भोजन करता हुआ ज्वररोगी क्षीण हो जाता है अथवा मर जाता है और क्षीण हुआ वह कष्टपनेको प्राप्त होके पीछे असाध्यपनेको प्राप्त होता है ॥६७॥ इसकारणसे मनुष्योंके बलकी रक्षा करनी । क्योंकि, बलकी शांति ही जीवन कहा है ॥ लंघिते चैव दोषे च यवागूपानमाचरेत् ॥ ६८ ॥ शालिषाष्टिकमुद्गं च यूषं शस्तं वदन्ति हि ॥ ६९ ॥ लंघनके करनेमें और दोषमें यवागूको पीता रहे ॥६८॥ सांठी चावल और मूंगका यूष ही लंघनमें श्रेष्ठ कहते हैं ॥ ६९ ॥ अथ मध्यलंघितको अन्नविधि । पञ्चकोलकसंसिद्धा यवागूर्मध्यलंघिते ॥ भवेत्प्रशस्ता सततं तस्य सन्तर्पणं हितम् ॥ ७० ॥ पीपल, पीपलामूल, चीता, चव्य और सोंठ इन पांचों मूलको कूटकर काथ बनावे इस काथमें तंदुलकी या मूंगकी यवागू बनावे और पकावे, फिर सिद्ध हुई यह यवागू मध्यलंघितको प्रशस्त है और रोगीको तृप्त रखती है ॥ ७० ॥ अथ क्लमशांतिकी विधि । आजं दुग्धं गुडोपेतं पानाय ज्वरशान्तये ॥ तेन क्लमविनाशः स्यात्सुखमाशु प्रपद्यते ॥ ७१ ॥ बकरीके दूधमें गुड मिला पीवे इसे ज्वरकी शांति होती है तब ग्लानिका नाश और तत्का- ल सुख उपजता है ॥ ७१ ॥ अथ काथपीनेकी विधि । उदीच्यां वा पूर्वस्यां वाऽभिमुखंचोपवेशयेत्॥ पाययेत्काथपानं च कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् ॥ ७२ ॥ पानपात्रमधः कृत्वा शयीत ज्ञानमेव च ॥ पीत्वा चैव तृषार्त्तोऽपि न जलं पाययेत्क्षणम् ॥ ७३ ॥ गतक्लमं नरं दृष्ट्वा तदा संपद्यते सुखम् ॥७४॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने भेषजपरिज्ञानविधिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
( १७२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- उत्तरको अथवा पूर्वको या अपनी और मुख कराकर रोगीको बैठावे पीछे ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवा- चन कराके काथका पान करावे ॥ ७२ ॥ पीछे पीनेके पात्रको अधोमुख स्थापित कर जागता हुआ शयन करे और काथका पान करक तृषावाला भी दो घडीतक पानीको नहीं पीवे ॥ ७३ ॥ जब रोगीकी ग्लानि दूर होजावे तब रोगी सुखको प्राप्त होता है ॥ ७४ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने औषधपरिज्ञानविधिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ द्वितीयोऽध्यायः २. अथ ज्वरचिकित्सा । आत्रेय उवाच॥अनभिज्ञश्चिकित्सायां शास्त्राणां पठनेन किम् ॥ यथा पलाल बीजास्तु रहितं निष्प्रयोजकम् ॥ १ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-जो वैद्य चिकित्साकर्ममें कुशल नहीं हो और वैद्यशास्त्रके पठनमें कुशल हो तिसको क्या फल होता है अर्थात् कुछ नहीं अन्नसे रहित निष्प्रयोजन तुषसे क्या तत्त्व निकलता है ? ॥ १ ॥ अथ कुवैद्यनिंदा । वरमाशीविषविषं क्वथितं ताम्रमेव च॥ पीतमत्यग्निसन्तप्ता भ- क्षिता वाप्ययोगुडाः ॥२॥ न तु श्रुतवतां वेशं बिभ्रतां शरणाग- तात् ॥ ग्रहीतुमन्नपानं वा वित्तं वा रोगपीडितात्॥ ३ ॥ सर्पादिकका विष, उबाला हुआ तांबा, अत्यंत अग्निमें तप्त किये लोहाके गोले इन सबोंको सेवना भी हित है ॥ २ ॥ परंतु वैद्योंके वेशको धारण करनेवाले और रोगियोंसे अन्न, पान, धन इनको हरनेवाले ऐसे वैद्योंकी औषधको नहीं खावे ॥ ३ ॥ अथ वैद्यका लक्षण । तदेव युक्तं भैषज्यं यदारोग्याय जायते ॥ स चैव भिषजां श्रेष्ठो रोगेभ्योयो विमोक्षयेत् ॥ ४ ॥ जो आरोग्यको करता है वही योग्य औषध है और जो रोगोंसे छुडावे वह ही उत्तम वैद्य कहाता है ॥ ४ ॥ अथ वैद्यकशास्त्रपठनकी आवश्यकता । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन रोगवारणहेतुना॥युक्ता निदानलक्षैस्तु संहि-
अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १७३ ) तोपायसंयुता ॥ ५ ॥ पठितव्या समासेन संहिताज्ञानहेतवे ॥ ज्ञात्वा रोगप्रतीकारं ततः कुर्य्यात्प्रतिक्रियाम् ॥ ६ ॥ इसलिये रोगके निवारण करनेवाले कारणसे संयुक्त सब उपाय करके निदानके लक्षण और रोगोंसे तथा रोगप्रतीकारकी चिकित्सासे अन्वित हुई वैद्यकसंहिता ॥ ५ ॥ विस्तार करके पठितकरनी योग्य है, संहिताके ज्ञानके लिये और रोगको दूर करनेके उपायको जानकर पीछे चिकित्साको करे ॥ ६ ॥ रोग नहीं जाननेसे हानि । अविज्ञाय रुजं सम्यङ्मोहादारभते क्रियाः ॥ विधानज्ञोऽथ शास्त्रज्ञो न तत्सिद्धिः प्रजायते ॥ ७ ॥ जो वैद्य रोगको नहीं जानके क्रियाका आरंभ करता है वह विधानको और शास्त्रको जानने- वाला भी सिद्धिको प्राप्त नहीं होता ॥ ७ ॥ अथ वैद्यशास्त्रज्ञाताको फल । निदानं रोगविज्ञानं भेषजानां गुणागुणम् ॥ विज्ञाय कुरुते यस्तु तस्य सिद्धिर्न दूरतः ॥ ८ ॥ निदान और रोगको जानना, औषधियोंके गुण और दोष इनको जानके जो वैद्य क्रियाको दूर नहीं करता है उसको शीघ्र सिद्धि होती है ॥ ८ ॥ रोगादिक जाननेकी आवश्यकता । आदावेव रुजां ज्ञानं साध्यासाध्यं विचक्षणः ॥ याप्यं सर्वरुजाञ्चैव ततः कुर्य्यात्प्रतिक्रियाम् ॥ ९ ॥ आदिमें वैद्य रोगके ज्ञानको और साध्य और असाध्यरूपको तथा कष्टसाध्यपनेको जाने पीछे क्रियाको करे ॥ ९ ॥ अथ देशकालआदिक जाननेकी आवश्यकता । देशं कालं वयो वह्निसात्म्यं प्रकृतिभेषजम् ॥ एवं विज्ञाय सद्वैद्यस्ततः कुर्य्यात्प्रतिक्रियाम् ॥ १० ॥ देश, काल, अवस्था, अग्नि, स्वभाव, प्रकृति इनको जानके कुशल वैद्य चिकित्साको करे ॥ १० ॥ अथ रोगहेतुवातादिदोष । नास्ति रोगो विना दोषैर्दोषा वातादयः स्मृताः॥ ज्वराद्यः स्मृता रोगास्तान्सम्यक्परिलक्षयेत् ॥ ११ ॥
( १७४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- दोषोंके बिना रोग नहीं होता और वे दोष वातआदि कहाते हैं और ज्वरआदि रोग हैं उन सबोंकी अच्छीतरह परीक्षा करे ॥ ११ ॥ अथ रोगपरीक्षाके प्रकार । आप्तानाञ्चोपदेशेन प्रत्यक्षीकरणेन च॥आतुराद्दिदृशः स्पर्शा- च्छीतादिप्रश्नतः परम्॥१२॥दर्शनस्पर्शनप्रश्नै रोगज्ञानं त्रिधा मतम्॥मुखाक्षिदर्शनात्स्पर्शाच्छीतादिप्रश्नतः परम् ॥ १३ ॥ वैद्योंके उपदेशसे और प्रत्यक्षीकरणसे और वैद्य आदिकी दृष्टिसे और स्पर्शसे और शीतआदिके पूछनेसे रोगका ज्ञान करे ॥ १२ ॥ दर्शन, स्पर्श और प्रश्न इन भेदोंसे रोगोंका तीन प्रकारका ज्ञान होता है, तहां मुख और नेत्र इन्होंके दर्शनसे, अंगके शीत उष्ण आदिक स्पर्शसे और कैसा है क्या क्या होता है इत्यादिक प्रश्नसे तीन प्रकारका रोग ज्ञान होता है ॥ १३ ॥ अथ साध्यासाध्यका लक्षण । कृच्छ्रयाप्यसुखोपायो द्विविधः साध्य उच्यते ॥ असाध्यो द्विविधो ज्ञेयः कृच्छ्रः कृच्छ्रतमोऽपरः ॥१४॥ कष्टसाध्य और सुखसाध्य इन भेदोंसे साध्य दो प्रकारका है और कष्टसाध्य और अतिकष्ट- साध्य इन भेदोंसे असाध्यभी दो प्रकारका है ॥ १४ ॥ अथ साध्यादिकहोनेका कारण । याप्याःकेचित्प्रकृत्यैव याप्याःसाध्या उपेक्षया॥स्वभावाद्रुचा- धयः साध्याः केचित्साध्या उपेक्षिताः॥१५॥ साध्या याप्य- त्वमायान्ति याप्याश्चासाध्यतां तथा॥घ्नन्ति प्राणांश्च साध्या- स्तुनराणामक्रियावताम् ॥ १६ ॥ कोई रोग स्वभावसे ही कष्टसाध्य होते हैं और कोई साध्यरोग चिकित्सासे अभावसे कष्टसाध्य होते हैं और कितनेक रोग स्वभावसे साध्य होते हैं और कितनेक नहीं चिकित्सित किये रोग साध्य होते हैं ॥ १५ ॥ साध्यरोग कष्टसाध्यपनेको प्राप्त होते हैं और कष्टसाध्यरोग असाध्यपनेको प्राप्त होते हैं, इससे क्रियाको नहीं करनेवाले मनुष्योंको साध्यरोगभी मार देते हैं ॥ १६ ॥ उपद्रवका लक्षण । व्याधेरुपरि यो व्याधिःसोपद्रव उदाहृतः॥सोपद्रवा न जीवन्ति १ 'प्रत्यक्षीकरणेन च'इत्यत्र प्रत्यक्षादनुमानतःइति वा पाठान्तरम् ।२ आतुरे आदियैषां तेषां भिषजीं दृशा विचारणार्थात् पूर्ववैद्यैः किमाचरितमित्यपि विचारणीयम्। अथवा तुरस्य रोगिण आदिदृशः प्रथमदृष्टेः दर्शना- दितिभावात्तत्र पाठान्तरम् आतुरादिदृशः ।
अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १७५ ) जीवन्ति निरुपद्रवाः ॥१७॥ ज्ञात्वाल्पकोऽपि भिषजा परि- चिन्तनीयो नोपेक्षणीय इति रोगगणो ह्यसाध्यः ॥ स्वल्पोऽप्य- रिर्गरलवह्निसमानरूप आप्तोबलो न शमतामुपयाति काले १८ शत्रुः स्थानबलं प्राप्य विक्रमं कुरुते बली॥तथा धात्वन्तरं प्राप्य विक्रमं कुरुते गदः ॥ १९ ॥ रोगके ऊपर जो रोग उपजे वह उपद्रवसहित रोग कहाता है उपद्रवसहित रोगवाले नहीं जीवते हैं और उपद्रवसे रहित रोगवाले जीवते हैं ॥ १७ ॥ अल्परोग भी वैद्योंको चिंतवन करना चाहिये किंतु असाध्य रोग छोड़ना नहीं चाहिये छोटासा भी वैरी विष और अग्निके समान है बलको पाकर फिर वह तत्काल ठंडा नहीं होता ॥ १८ ॥ जैसे बली शत्रु स्थान और बलको प्राप्तहोकर पराक्रमको करता है तैसे ही धातुओंके अंतरमें प्राप्तहुआ रोग पराक्रमको करता है १९ रोग निर्मूल करनेकी आज्ञा । बहुविधपरिकार्येणापि नीतं शमं यत्कृशमपि हि न धार्य्यं रोग- मूलं विधिज्ञ॥कथमपि बहुपथ्यैर्व्यावृतो वा बलिष्ठो न शमय- ति हि रोगं बाल्यमात्रेण सम्यक् ॥ २० ॥ हे विधिज्ञ ! बहुतसे भांतिके कर्मोंसे शान्त किया अलग भी रोग नहीं रहने देना चाहिये । क्योंकि,बहुतसे अपथ्योंकरके व्यावृत्त हुआ अत्यंत बलवान् रोग शांतिको प्राप्त नहीं होता॥२०॥ सूक्ष्म भी रोग शत्रुसमान है । यथा स्वल्पं विषं तीव्रं यथा स्वल्पो भुजङ्गमः ॥ यथा स्वल्पतरश्चाग्निस्तथा सूक्ष्मोऽपि रुग्रिपुः ॥ २१ ॥ जैसे स्वल्प विष तीक्ष्ण होता है,जैसे छोटासा सर्प बुरा होता है,जैसे अत्यंत स्वल्प भी अग्नि बढ़ती है तैसे सूक्ष्म रोग भी वैरी होता है ॥ २१ ॥ रोगके फैलनके प्रथम ही प्रतीकार करना । यावत्स्थानं समाश्रित्य विकारं कुरुते गदः ॥ तावत्तस्य प्रतीकारः स्थानत्यागाद्वलीयसः॥ २२ ॥ जबतक स्थानमें आश्रित होके रोग विकारको करता है,जबतक वह उस स्थानको नहीं त्यागे तबतक उस बलवाले रोगकी क्रिया करता रहे ॥ २२ ॥ व्याधियोंका प्रकार । कर्मजा व्याधयः केचिद्दोषाजाः सन्ति चापरे ॥ सहजाः कथिताश्चान्ये व्याधयस्त्रिविधा मताः॥ २३ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
( १७६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- कितनेक रोग कर्मसे उपजते हैं और कितनेक रोग दोषसे उपजते हैं और कितनेक रोग शरीरके साथ उपजते हैं ऐसे तीन प्रकारके रोग कहे हैं ॥ २३ ॥ तीन प्रकारके व्याधियोंका लक्षण । बहुभिरुपचारैस्तु ये न यान्ति शमं ततः॥ते कर्मजाः समुद्दिष्टा व्याधयो दारुणाः पुनः ॥२४॥दोषजा वातपित्ताद्याः सहजाः क्षुत्तृषादयः ॥ २५ ॥ जो बहुतसी चिकित्साके करनेसे शांतिको प्राप्त नहीं होते उनको कर्मसे उपजे रोग जानना, ये दारुण हैं ॥ २४ ॥ वातपित्तादिसे उपजे रोग दोषज कहाते हैं, भूख और तृषाआदिके साथ उपजनेवाले सहज कहलाते हैं ॥ २५ ॥ ज्वरकी व्यापकता । तस्माद्वक्ष्यामि चादौ ज्वरमतुलगदं वाजिनां कुञ्जराणां मानुष्या- णां पशूनांमृगमहिषखरोष्ट्रादिवानस्पतीनाम् ॥ वल्लीनामोषधी- नां क्षितिधरफणिनां पत्रिणां मूषिकाणामेषः प्राणापहारी ज्वर इति गदितो दुर्निवारो हि लोके ॥ २६ ॥ इस लिये आदिमें घोड़ा, हस्ती, मनुष्य, गाय आदि,पशु मृग, भैंसा,ऊंट आदि, जीव, वन- स्पति, वेल, ओषधी, सर्प,पक्षी, मूषा इनके ज्वरको मैं कहता हूँ, यह ज्वर प्राणोंको हरता है और संसारमें दुःखसे दूर होता है ॥ २६ ॥ अथ जातिपरत्वमें ज्वरकी असाध्यता । असाध्योऽयं ज्वरो व्याधिर्गोमहिष्यश्वकुञ्जरे ॥ किञ्चित्कृच्छ्रतमो नृणामन्येषां जीवघातकः ॥ २७ ॥ गाय, भैंसा, हस्ती, इनमें ज्वर असाध्य कहा है और मनुष्योंका ज्वर कुछ कष्टसाध्य कहा है और शेष रहे जीवोंको ज्वर मारता है ॥ २७ ॥ अथ ज्वरकी बलिष्ठता । यथा मृगाणां मृगयुर्बलिष्ठस्तथा गदानां प्रबलो ज्वरोऽयम् ॥ नान्योऽपिशक्तो मनुजं विहाय सोढुं भुवि प्राणभृतं सुराद्यम्॥२८॥ जैसे मृगोंमें सिंह बलवान् है वैसे ही रोगोंमें यह ज्वर प्रवल है । कोई भी अन्यजीव संसारमें प्राणको धारण करनेवाले पृथिवीमें देव मनुष्यके बिना ज्वरको सह नहीं सकता है ॥ २८ ॥
अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १७७ ) अथ मनुष्य ज्वर सहसकता है इसका कारण । कर्मणालभते यस्माद्देवत्वं मानुषो दिवि॥ततश्चैवाच्युतःस्वर्गा- न्मानुष्यमपि वर्त्तते ॥२९॥ तस्मात्स देवभावाच्च सहते मानुषो ज्वरम् ॥ शेषाः सव विपद्यन्ते पशुवर्गा ज्वरार्दिताः ॥ ३० ॥ कर्मसे मनुष्य स्वर्गमें जाके देवताके शरीरको प्राप्त होता है, पीछे स्वर्गसे भ्रष्ट हुआ मनुष्य शरीरको प्राप्त होता है ॥ २९ ॥ इस कारणसे देवभावकरके मनुष्य ज्वरको सहते हैं शेष रहे पशुओंके समूह ज्वरसे मर जाते हैं ३० ॥ अथ सर्वरोगान ज्वरकी श्रेष्ठता । रोगाणां रोगराजोऽयं यथा मृगपतिर्मृगे ॥ दाहात्मसु यथा वह्नि- स्तथा रोगे ज्वरोऽधिकः॥रुद्रक्रोधाग्निसम्भूतःसर्वभूतप्रतापनः ३१ जैसे वनमें पशुओंका राजा सिंह है तसे शरीरमें रोगोंका राजा ज्वर है,जैसे दाह करनेवालोंमें अग्नि अधिक है तैसे ही ज्वर भी अधिक है, महादेवके क्रोधरूपी अग्निसे उपजनेवाला और सब जीवोंको तपानेवाला ऐसा ज्वर है ॥ ३१ ॥ अथ पृथक् प्राणिभेदसे ज्वरके नामांतर । पातकः स तु नागानामभितापस्तु वाजिनाम् ॥ गवामीश्वरसं- ज्ञस्तु मानवानां ज्वरो मतः ॥ ३२ ॥ दारिद्रो महिषीणां तु मृगरोगो मृगेषु च ॥ अजावीनां प्रलापाख्यः करभेष्वलसो भवेत् ॥३३॥ शुनोऽलर्कः समाख्यातो मत्स्येष्विन्द्रमतो मतः पक्षिणामधिघातस्तु व्यालेष्वैक्षितसंज्ञितः ॥ ३४ ॥ जलस्य नीलिका प्रायो भूमिषूषरनामतः ॥ वृक्षस्य कोटराक्षस्तु ज्वरः सर्वत्र दृश्यते ॥ ३५ ॥ हस्तियोंके पातकनामसे ज्वर होता है, घोड़ोंके अभितापनामसे ज्वर होता है, गायोंके ईश्वरनाम वाला ज्वर होता है, मनुष्योंके ज्वरनामसे ही प्रसिद्ध है॥३२॥भैंसोंके दारिद्र नामसे ज्वर होता है मृगोंमें ज्वर मृगरोगनामसे प्रसिद्ध है, बकरी और भेड़ोंके ज्वर प्रलापाख्यनामसे होता है, ऊंटोंमें ज्वर अलसनामसे होता है ॥३३॥ कुत्ताके ज्वर अलर्क नामसे और मछलियोंमें ज्वर इंद्रमतनामसे उपजता है, पक्षियोंके ज्वर अभिघातनामसे, सर्पोंमें केंचलीनामसे ज्वर उपजता है ॥३४॥और १२
( १७८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- जलमें ज्वर सिवालनामसे उपजता है पृथिवीमें ऊषरनामसे ज्वर उपजता है, वृक्षमें कोटराक्ष- नामसे ज्वर उपजता है ऐसे सब जगह ज्वर दीखता है ॥ ३५ ॥ अथ ज्वरका स्वरूप । त्रिपाद्भस्मप्रहरणस्त्रिशिराः सुमहोदरः॥वैयाघ्रचर्मवसनः कपि- लोज्ज्वलविग्रहः ॥ ३६ ॥ पिङ्गेक्षणो ह्रस्वजङ्घो विमत्स्यो बल- वानयम्॥पुरुषो लोकनाशाय चासौ ज्वर इति स्मृतः ॥३७॥ दग्धेन्धनो यथावह्निर्धातून्हत्वा यथा विषम्॥कृतकृत्यो व्रजे- च्छांतिं देहं हत्वा तथा ज्वरः ॥ ३८ ॥ तीन पैरोंवाला,भस्मको धारण करनेवाला,तीन शिरोंवाला, सुंदर बड़ा पेटवाला,सिंहके चामके वस्त्रोंको पहननेवाला, पीलेवर्णवाला और प्रकाशित शरीरवाला॥ ३६ ॥ पीले नेत्रोंवाला, ढींगनी जांघोंवाला, विशेषकर पुरुषोंमें रहनेवाला, बलवान् और पुरुष संज्ञक लोकका नाश करनेवाला, वह ज्वर कहाता है ॥ ३७ ॥ जैसे इंधनको दग्ध करके अग्नि और धातुओंको दग्ध करके विष कृतकृत्य होके शांत हो जाता है तैसे देहका नाश कर ज्वर शांत हो जाता है ॥३८ ॥ अथ ज्वरकी उत्पत्ति । तस्मात्तस्य समुत्पत्तिं वक्ष्यामि शृणु पुत्रक ॥ चतुर्विधो महा- घोरो जातो येन तु चाष्टधा ॥ दक्षाद्ध्वरप्रशमनः कुपितो हि महेश्वरः॥३९॥ श्वासं मुमोच दयिताविधुरश्च तीव्रं तेन ज्वरोऽष्ट- विधसम्भवतोऽष्टधा स्यात् ॥ ४० ॥ इस कारणसे हे पुत्र ! उसकी उत्पत्तिको कहता हूं सुनो । चारप्रकारका महाघोररूपी ज्वर है फिर उससे आठ प्रकारका हुआ है सो दक्षप्रजापतिसे कुपित हुए महेश्वर ॥ ३९ ॥ सतीजीके वास्ते आठ बार श्वासको छोडते भये उससे ज्वर आठ प्रकारका हुआ है ॥ ४० ॥ अथ ज्वरकी निदानसहित संप्राप्ति । वातादिपित्तकफशोणितसन्निधानात्स्वेच्छान्नपाननिरताहतुवैप- रीत्यात्॥दोषा मलाशयगता जठराग्निबाह्याः संप्रेरयन्ति रुधिरा- श्रितवह्निपातम् ॥तेषां ततो हि दधते ज्वरनाम सिद्धम्॥४१॥ वात, पित्त, कफ, रक्त, इनके सन्निधानसे और अपनी इच्छापूर्वक अन्न और पानके सेवनसे और ऋतुके विपरीतपनेसे मलाशयमें प्राप्त हुए पेटके अग्निको बाहर हुए दोष रक्तसे आश्रित हुए अग्निके पातको प्रेरते हैं उसको ज्वर कहते हैं ॥ ४१ ॥ १ "मत्स्यो मीनेऽथ पुंभूम्नि देशे" इतिमेदिनी । २ लोकानां जनानां नाशमूअयतेऽसौ लोकनाशायः ।
अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १७९ ) अथ ज्वरके हेतु । व्यायामक्रोधभुक्त्यादिजनननाच्छीतसम्भवात्॥४२॥ विरुद्धा- न्नविशेषेण पाननिर्झरवारिणा॥ कूपोदकेन सन्तुष्टस्तिग्मतीव्रां- शुरश्मिभिः ॥४३॥गन्धवातेन दोषाणामभिघाताभिशापतः ॥ ज्वरोनाम महाघोरो जायते मनुजे भृशम् ॥ ४४ ॥ और कसरत, भोजनके ऊपर भोजन, क्रोध, इनके उपजनेसे और शीतके सम्भवसे भी ज्वर उपजता है ॥ ४२ ॥ विरुद्ध अन्नआदिके खानेसे, झरने अथवा कुवाके पानीसे और तेज सूर्यकी किरणोंकी गरमाईसे ॥ ४३ ॥ बुरे गन्धसे, वात आदि दोषोंसे, चोटके लगनेसे और ब्राह्मणके शापसे मनुष्यके देहमें महाघोररूपी ज्वरनाम उत्पन्न होता है ॥ ४४ ॥ अथ प्रकटहुए ज्वरका लक्षण । श्रमो जडत्वं नयनप्लवः स्याद्रोमोद्गमो घुर्घुरकश्च जृम्भा ॥ वैवर्णता द्वेषसशोषतास्ये ज्वरस्य च व्यक्तकलक्षणानि ॥४५॥ शरीरमें थकावट और जड़पना, नेत्रोंसे पानी गिरे, रोमावली खडी होवे, कंठमें घुर्घुरापना और जँभाई आवे, वर्ण बदलजावे, अन्नसे वैर होवे, मुखमें शोष उपजे ये प्रकट हुए ज्वरके लक्षण हैं ॥ ४५ ॥ अथ ज्वरकी विशेषता । समीरणेण वै जृम्भाकफाद्दैन्यं निषीदति ॥ पित्तान्नयनसन्तापः सर्वं वै सान्निपातिके ॥ तस्माद्वक्ष्ये प्रतीकारं येन सम्पद्यते सुखम् ॥ ४६ ॥ वातकी अधिकतासे जंभाई आवे, कफसे दीनपना उपजे और शिथिल हो जावे, पित्तसे नेत्रोंमें संताप हो, सन्निपातमें सब लक्षण मिले इस वास्ते जिस करिके सुख उत्पन्न हो, ऐसा उपाय करना सो कहूंगा ॥ ४६ ॥ अथ वातज्वरमें पाचन । वचा यवानी धनिका सविश्वा पिबेत्कषायं निशि सोष्णमेवम्॥ स वातिके वातरुजे ज्वराणां सम्पाचके स्यान्मनुजे सुखाय४७ बच, अजवायन, धनियां, सोंठ इनके गरम क्वाथको रात्रिमें पीवे यह पाचन वातज्वरमें और वातकी पीडामें मनुष्यको सुख देता है ॥ ४७ ॥ अथ पित्तज्वरका पाचन । निशा सनिम्बा मृतवल्लिका च धान्यं च विश्वा सगुडः कषायः॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
( १८० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- निशासु क्षीरेण सकोलमिश्रं पानं सपित्तज्वरपाचनाय ॥४८॥ हलदी, नीमकी छाल, गिलोय, धनियां, सोंठ इनका क्वाथ बनाकर उसमें गुड मिलाकर पीवे अथवा दूबमें गजपीपलके चूर्णको मिलाकर रातको पीवे यह पाचनः पित्तज्वरमें मनु- ष्यको सुख देता है ॥ ४८ ॥ अथ कफज्वरमें पाचन । वचायवानी त्रिफला सविश्वा क्वाथो निशायां कफजे ज्वरे वा॥ सपाचनं स्यान्मनुजस्य दोषे शूले प्रतिश्यायकपीनसेषु॥४९॥ वच, अजवायन, हरड़े, बहेड़ा, आंवला, सोंठ इनका क्वाथ कफसे उपजे ज्वरमें और शूल, जुकाम, पीनस, इनमें रातको देना ॥ ४९ ॥ अथ सन्निपातज्वरमें पाचन । शटीवचानागरकाफलानां वत्साडनीधन्वयवासकानाम् ॥ क्वाथो हितःसर्वभवे ज्वरे च सम्पाचनं स्यान्मनुजत्रिदोषे५०॥ कचूर, वच, सोंठ, हरडैं, बहेडा, आंवला, गिलोय, जवासा इनका क्वाथ सब प्रकारके ज्वरमें और मनुष्योंके त्रिदोषज ज्वरमें पाचन है ॥ ५० ॥ अथ ज्वरमें पथ्य । रात्रौ सुखोष्णतोयेन प्रचुरेण च धीमताम् ॥ अङ्गसंमर्दनं पथ्यं निद्राव्यायामवार्जितम् ॥ ५१ ॥ रात्रिमें सुखपूर्वक गरम पानी करके अतिशयसे मनुष्योंके अगोंका मर्दन पथ्य है परंतु नींद और कसरतको वर्जना ॥ ५१ ॥ अथ वातज्वरका निदान और चिकित्सा । वेपथुर्विषमवेगशोषणं कण्ठतालुवदने विरस्यता॥रूक्षता वपुषि बन्धकुक्षयोर्जृम्भणं शिरसि रुग्विद्रिता ॥ ५२ ॥ कृष्णता कररुहां प्रलापको गात्रभङ्गबलवान् बिभत्सयति ॥भीतवत्स्व- पिति जाग्रतो नरो लक्षणैर्भवति वातकृज्ज्वरः ॥ ५३ ॥ शरीर कांपे, ज्वरका विषमवेग हो, कंठ, तालु, मुख इनमें शोष उपजे, मुखमें विरस- पना हो, शरीरमें रूखापन हो, कुक्षिबन्ध हो जावे, जँभाई आवे और शिरमें शूल उपजे और नींद आवे नहीं ॥ ५२ ॥ नख काले हो जावें, बकवाद करे, शरीरका भंगहोवे और बल- १ "प्रलापो ऽनर्थकं वचः” इत्यमरः ।