हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 211, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १७९ ) अथ ज्वरके हेतु । व्यायामक्रोधभुक्त्यादिजनननाच्छीतसम्भवात्॥४२॥ विरुद्धा- न्नविशेषेण पाननिर्झरवारिणा॥ कूपोदकेन सन्तुष्टस्तिग्मतीव्रां- शुरश्मिभिः ॥४३॥गन्धवातेन दोषाणामभिघाताभिशापतः ॥ ज्वरोनाम महाघोरो जायते मनुजे भृशम् ॥ ४४ ॥ और कसरत, भोजनके ऊपर भोजन, क्रोध, इनके उपजनेसे और शीतके सम्भवसे भी ज्वर उपजता है ॥ ४२ ॥ विरुद्ध अन्नआदिके खानेसे, झरने अथवा कुवाके पानीसे और तेज सूर्यकी किरणोंकी गरमाईसे ॥ ४३ ॥ बुरे गन्धसे, वात आदि दोषोंसे, चोटके लगनेसे और ब्राह्मणके शापसे मनुष्यके देहमें महाघोररूपी ज्वरनाम उत्पन्न होता है ॥ ४४ ॥ अथ प्रकटहुए ज्वरका लक्षण । श्रमो जडत्वं नयनप्लवः स्याद्रोमोद्गमो घुर्घुरकश्च जृम्भा ॥ वैवर्णता द्वेषसशोषतास्ये ज्वरस्य च व्यक्तकलक्षणानि ॥४५॥ शरीरमें थकावट और जड़पना, नेत्रोंसे पानी गिरे, रोमावली खडी होवे, कंठमें घुर्घुरापना और जँभाई आवे, वर्ण बदलजावे, अन्नसे वैर होवे, मुखमें शोष उपजे ये प्रकट हुए ज्वरके लक्षण हैं ॥ ४५ ॥ अथ ज्वरकी विशेषता । समीरणेण वै जृम्भाकफाद्दैन्यं निषीदति ॥ पित्तान्नयनसन्तापः सर्वं वै सान्निपातिके ॥ तस्माद्वक्ष्ये प्रतीकारं येन सम्पद्यते सुखम् ॥ ४६ ॥ वातकी अधिकतासे जंभाई आवे, कफसे दीनपना उपजे और शिथिल हो जावे, पित्तसे नेत्रोंमें संताप हो, सन्निपातमें सब लक्षण मिले इस वास्ते जिस करिके सुख उत्पन्न हो, ऐसा उपाय करना सो कहूंगा ॥ ४६ ॥ अथ वातज्वरमें पाचन । वचा यवानी धनिका सविश्वा पिबेत्कषायं निशि सोष्णमेवम्॥ स वातिके वातरुजे ज्वराणां सम्पाचके स्यान्मनुजे सुखाय४७ बच, अजवायन, धनियां, सोंठ इनके गरम क्वाथको रात्रिमें पीवे यह पाचन वातज्वरमें और वातकी पीडामें मनुष्यको सुख देता है ॥ ४७ ॥ अथ पित्तज्वरका पाचन । निशा सनिम्बा मृतवल्लिका च धान्यं च विश्वा सगुडः कषायः॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu