हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १७८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- जलमें ज्वर सिवालनामसे उपजता है पृथिवीमें ऊषरनामसे ज्वर उपजता है, वृक्षमें कोटराक्ष- नामसे ज्वर उपजता है ऐसे सब जगह ज्वर दीखता है ॥ ३५ ॥ अथ ज्वरका स्वरूप । त्रिपाद्भस्मप्रहरणस्त्रिशिराः सुमहोदरः॥वैयाघ्रचर्मवसनः कपि- लोज्ज्वलविग्रहः ॥ ३६ ॥ पिङ्गेक्षणो ह्रस्वजङ्घो विमत्स्यो बल- वानयम्॥पुरुषो लोकनाशाय चासौ ज्वर इति स्मृतः ॥३७॥ दग्धेन्धनो यथावह्निर्धातून्हत्वा यथा विषम्॥कृतकृत्यो व्रजे- च्छांतिं देहं हत्वा तथा ज्वरः ॥ ३८ ॥ तीन पैरोंवाला,भस्मको धारण करनेवाला,तीन शिरोंवाला, सुंदर बड़ा पेटवाला,सिंहके चामके वस्त्रोंको पहननेवाला, पीलेवर्णवाला और प्रकाशित शरीरवाला॥ ३६ ॥ पीले नेत्रोंवाला, ढींगनी जांघोंवाला, विशेषकर पुरुषोंमें रहनेवाला, बलवान् और पुरुष संज्ञक लोकका नाश करनेवाला, वह ज्वर कहाता है ॥ ३७ ॥ जैसे इंधनको दग्ध करके अग्नि और धातुओंको दग्ध करके विष कृतकृत्य होके शांत हो जाता है तैसे देहका नाश कर ज्वर शांत हो जाता है ॥३८ ॥ अथ ज्वरकी उत्पत्ति । तस्मात्तस्य समुत्पत्तिं वक्ष्यामि शृणु पुत्रक ॥ चतुर्विधो महा- घोरो जातो येन तु चाष्टधा ॥ दक्षाद्ध्वरप्रशमनः कुपितो हि महेश्वरः॥३९॥ श्वासं मुमोच दयिताविधुरश्च तीव्रं तेन ज्वरोऽष्ट- विधसम्भवतोऽष्टधा स्यात् ॥ ४० ॥ इस कारणसे हे पुत्र ! उसकी उत्पत्तिको कहता हूं सुनो । चारप्रकारका महाघोररूपी ज्वर है फिर उससे आठ प्रकारका हुआ है सो दक्षप्रजापतिसे कुपित हुए महेश्वर ॥ ३९ ॥ सतीजीके वास्ते आठ बार श्वासको छोडते भये उससे ज्वर आठ प्रकारका हुआ है ॥ ४० ॥ अथ ज्वरकी निदानसहित संप्राप्ति । वातादिपित्तकफशोणितसन्निधानात्स्वेच्छान्नपाननिरताहतुवैप- रीत्यात्॥दोषा मलाशयगता जठराग्निबाह्याः संप्रेरयन्ति रुधिरा- श्रितवह्निपातम् ॥तेषां ततो हि दधते ज्वरनाम सिद्धम्॥४१॥ वात, पित्त, कफ, रक्त, इनके सन्निधानसे और अपनी इच्छापूर्वक अन्न और पानके सेवनसे और ऋतुके विपरीतपनेसे मलाशयमें प्राप्त हुए पेटके अग्निको बाहर हुए दोष रक्तसे आश्रित हुए अग्निके पातको प्रेरते हैं उसको ज्वर कहते हैं ॥ ४१ ॥ १ "मत्स्यो मीनेऽथ पुंभूम्नि देशे" इतिमेदिनी । २ लोकानां जनानां नाशमूअयतेऽसौ लोकनाशायः ।