भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 209

अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १७७ ) अथ मनुष्य ज्वर सहसकता है इसका कारण । कर्मणालभते यस्माद्देवत्वं मानुषो दिवि॥ततश्चैवाच्युतःस्वर्गा- न्मानुष्यमपि वर्त्तते ॥२९॥ तस्मात्स देवभावाच्च सहते मानुषो ज्वरम् ॥ शेषाः सव विपद्यन्ते पशुवर्गा ज्वरार्दिताः ॥ ३० ॥ कर्मसे मनुष्य स्वर्गमें जाके देवताके शरीरको प्राप्त होता है, पीछे स्वर्गसे भ्रष्ट हुआ मनुष्य शरीरको प्राप्त होता है ॥ २९ ॥ इस कारणसे देवभावकरके मनुष्य ज्वरको सहते हैं शेष रहे पशुओंके समूह ज्वरसे मर जाते हैं ३० ॥ अथ सर्वरोगान ज्वरकी श्रेष्ठता । रोगाणां रोगराजोऽयं यथा मृगपतिर्मृगे ॥ दाहात्मसु यथा वह्नि- स्तथा रोगे ज्वरोऽधिकः॥रुद्रक्रोधाग्निसम्भूतःसर्वभूतप्रतापनः ३१ जैसे वनमें पशुओंका राजा सिंह है तसे शरीरमें रोगोंका राजा ज्वर है,जैसे दाह करनेवालोंमें अग्नि अधिक है तैसे ही ज्वर भी अधिक है, महादेवके क्रोधरूपी अग्निसे उपजनेवाला और सब जीवोंको तपानेवाला ऐसा ज्वर है ॥ ३१ ॥ अथ पृथक् प्राणिभेदसे ज्वरके नामांतर । पातकः स तु नागानामभितापस्तु वाजिनाम् ॥ गवामीश्वरसं- ज्ञस्तु मानवानां ज्वरो मतः ॥ ३२ ॥ दारिद्रो महिषीणां तु मृगरोगो मृगेषु च ॥ अजावीनां प्रलापाख्यः करभेष्वलसो भवेत् ॥३३॥ शुनोऽलर्कः समाख्यातो मत्स्येष्विन्द्रमतो मतः पक्षिणामधिघातस्तु व्यालेष्वैक्षितसंज्ञितः ॥ ३४ ॥ जलस्य नीलिका प्रायो भूमिषूषरनामतः ॥ वृक्षस्य कोटराक्षस्तु ज्वरः सर्वत्र दृश्यते ॥ ३५ ॥ हस्तियोंके पातकनामसे ज्वर होता है, घोड़ोंके अभितापनामसे ज्वर होता है, गायोंके ईश्वरनाम वाला ज्वर होता है, मनुष्योंके ज्वरनामसे ही प्रसिद्ध है॥३२॥भैंसोंके दारिद्र नामसे ज्वर होता है मृगोंमें ज्वर मृगरोगनामसे प्रसिद्ध है, बकरी और भेड़ोंके ज्वर प्रलापाख्यनामसे होता है, ऊंटोंमें ज्वर अलसनामसे होता है ॥३३॥ कुत्ताके ज्वर अलर्क नामसे और मछलियोंमें ज्वर इंद्रमतनामसे उपजता है, पक्षियोंके ज्वर अभिघातनामसे, सर्पोंमें केंचलीनामसे ज्वर उपजता है ॥३४॥और १२