हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १७६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- कितनेक रोग कर्मसे उपजते हैं और कितनेक रोग दोषसे उपजते हैं और कितनेक रोग शरीरके साथ उपजते हैं ऐसे तीन प्रकारके रोग कहे हैं ॥ २३ ॥ तीन प्रकारके व्याधियोंका लक्षण । बहुभिरुपचारैस्तु ये न यान्ति शमं ततः॥ते कर्मजाः समुद्दिष्टा व्याधयो दारुणाः पुनः ॥२४॥दोषजा वातपित्ताद्याः सहजाः क्षुत्तृषादयः ॥ २५ ॥ जो बहुतसी चिकित्साके करनेसे शांतिको प्राप्त नहीं होते उनको कर्मसे उपजे रोग जानना, ये दारुण हैं ॥ २४ ॥ वातपित्तादिसे उपजे रोग दोषज कहाते हैं, भूख और तृषाआदिके साथ उपजनेवाले सहज कहलाते हैं ॥ २५ ॥ ज्वरकी व्यापकता । तस्माद्वक्ष्यामि चादौ ज्वरमतुलगदं वाजिनां कुञ्जराणां मानुष्या- णां पशूनांमृगमहिषखरोष्ट्रादिवानस्पतीनाम् ॥ वल्लीनामोषधी- नां क्षितिधरफणिनां पत्रिणां मूषिकाणामेषः प्राणापहारी ज्वर इति गदितो दुर्निवारो हि लोके ॥ २६ ॥ इस लिये आदिमें घोड़ा, हस्ती, मनुष्य, गाय आदि,पशु मृग, भैंसा,ऊंट आदि, जीव, वन- स्पति, वेल, ओषधी, सर्प,पक्षी, मूषा इनके ज्वरको मैं कहता हूँ, यह ज्वर प्राणोंको हरता है और संसारमें दुःखसे दूर होता है ॥ २६ ॥ अथ जातिपरत्वमें ज्वरकी असाध्यता । असाध्योऽयं ज्वरो व्याधिर्गोमहिष्यश्वकुञ्जरे ॥ किञ्चित्कृच्छ्रतमो नृणामन्येषां जीवघातकः ॥ २७ ॥ गाय, भैंसा, हस्ती, इनमें ज्वर असाध्य कहा है और मनुष्योंका ज्वर कुछ कष्टसाध्य कहा है और शेष रहे जीवोंको ज्वर मारता है ॥ २७ ॥ अथ ज्वरकी बलिष्ठता । यथा मृगाणां मृगयुर्बलिष्ठस्तथा गदानां प्रबलो ज्वरोऽयम् ॥ नान्योऽपिशक्तो मनुजं विहाय सोढुं भुवि प्राणभृतं सुराद्यम्॥२८॥ जैसे मृगोंमें सिंह बलवान् है वैसे ही रोगोंमें यह ज्वर प्रवल है । कोई भी अन्यजीव संसारमें प्राणको धारण करनेवाले पृथिवीमें देव मनुष्यके बिना ज्वरको सह नहीं सकता है ॥ २८ ॥