हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १७५ ) जीवन्ति निरुपद्रवाः ॥१७॥ ज्ञात्वाल्पकोऽपि भिषजा परि- चिन्तनीयो नोपेक्षणीय इति रोगगणो ह्यसाध्यः ॥ स्वल्पोऽप्य- रिर्गरलवह्निसमानरूप आप्तोबलो न शमतामुपयाति काले १८ शत्रुः स्थानबलं प्राप्य विक्रमं कुरुते बली॥तथा धात्वन्तरं प्राप्य विक्रमं कुरुते गदः ॥ १९ ॥ रोगके ऊपर जो रोग उपजे वह उपद्रवसहित रोग कहाता है उपद्रवसहित रोगवाले नहीं जीवते हैं और उपद्रवसे रहित रोगवाले जीवते हैं ॥ १७ ॥ अल्परोग भी वैद्योंको चिंतवन करना चाहिये किंतु असाध्य रोग छोड़ना नहीं चाहिये छोटासा भी वैरी विष और अग्निके समान है बलको पाकर फिर वह तत्काल ठंडा नहीं होता ॥ १८ ॥ जैसे बली शत्रु स्थान और बलको प्राप्तहोकर पराक्रमको करता है तैसे ही धातुओंके अंतरमें प्राप्तहुआ रोग पराक्रमको करता है १९ रोग निर्मूल करनेकी आज्ञा । बहुविधपरिकार्येणापि नीतं शमं यत्कृशमपि हि न धार्य्यं रोग- मूलं विधिज्ञ॥कथमपि बहुपथ्यैर्व्यावृतो वा बलिष्ठो न शमय- ति हि रोगं बाल्यमात्रेण सम्यक् ॥ २० ॥ हे विधिज्ञ ! बहुतसे भांतिके कर्मोंसे शान्त किया अलग भी रोग नहीं रहने देना चाहिये । क्योंकि,बहुतसे अपथ्योंकरके व्यावृत्त हुआ अत्यंत बलवान् रोग शांतिको प्राप्त नहीं होता॥२०॥ सूक्ष्म भी रोग शत्रुसमान है । यथा स्वल्पं विषं तीव्रं यथा स्वल्पो भुजङ्गमः ॥ यथा स्वल्पतरश्चाग्निस्तथा सूक्ष्मोऽपि रुग्रिपुः ॥ २१ ॥ जैसे स्वल्प विष तीक्ष्ण होता है,जैसे छोटासा सर्प बुरा होता है,जैसे अत्यंत स्वल्प भी अग्नि बढ़ती है तैसे सूक्ष्म रोग भी वैरी होता है ॥ २१ ॥ रोगके फैलनके प्रथम ही प्रतीकार करना । यावत्स्थानं समाश्रित्य विकारं कुरुते गदः ॥ तावत्तस्य प्रतीकारः स्थानत्यागाद्वलीयसः॥ २२ ॥ जबतक स्थानमें आश्रित होके रोग विकारको करता है,जबतक वह उस स्थानको नहीं त्यागे तबतक उस बलवाले रोगकी क्रिया करता रहे ॥ २२ ॥ व्याधियोंका प्रकार । कर्मजा व्याधयः केचिद्दोषाजाः सन्ति चापरे ॥ सहजाः कथिताश्चान्ये व्याधयस्त्रिविधा मताः॥ २३ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu