हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 206, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( १७४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- दोषोंके बिना रोग नहीं होता और वे दोष वातआदि कहाते हैं और ज्वरआदि रोग हैं उन सबोंकी अच्छीतरह परीक्षा करे ॥ ११ ॥ अथ रोगपरीक्षाके प्रकार । आप्तानाञ्चोपदेशेन प्रत्यक्षीकरणेन च॥आतुराद्दिदृशः स्पर्शा- च्छीतादिप्रश्नतः परम्॥१२॥दर्शनस्पर्शनप्रश्नै रोगज्ञानं त्रिधा मतम्॥मुखाक्षिदर्शनात्स्पर्शाच्छीतादिप्रश्नतः परम् ॥ १३ ॥ वैद्योंके उपदेशसे और प्रत्यक्षीकरणसे और वैद्य आदिकी दृष्टिसे और स्पर्शसे और शीतआदिके पूछनेसे रोगका ज्ञान करे ॥ १२ ॥ दर्शन, स्पर्श और प्रश्न इन भेदोंसे रोगोंका तीन प्रकारका ज्ञान होता है, तहां मुख और नेत्र इन्होंके दर्शनसे, अंगके शीत उष्ण आदिक स्पर्शसे और कैसा है क्या क्या होता है इत्यादिक प्रश्नसे तीन प्रकारका रोग ज्ञान होता है ॥ १३ ॥ अथ साध्यासाध्यका लक्षण । कृच्छ्रयाप्यसुखोपायो द्विविधः साध्य उच्यते ॥ असाध्यो द्विविधो ज्ञेयः कृच्छ्रः कृच्छ्रतमोऽपरः ॥१४॥ कष्टसाध्य और सुखसाध्य इन भेदोंसे साध्य दो प्रकारका है और कष्टसाध्य और अतिकष्ट- साध्य इन भेदोंसे असाध्यभी दो प्रकारका है ॥ १४ ॥ अथ साध्यादिकहोनेका कारण । याप्याःकेचित्प्रकृत्यैव याप्याःसाध्या उपेक्षया॥स्वभावाद्रुचा- धयः साध्याः केचित्साध्या उपेक्षिताः॥१५॥ साध्या याप्य- त्वमायान्ति याप्याश्चासाध्यतां तथा॥घ्नन्ति प्राणांश्च साध्या- स्तुनराणामक्रियावताम् ॥ १६ ॥ कोई रोग स्वभावसे ही कष्टसाध्य होते हैं और कोई साध्यरोग चिकित्सासे अभावसे कष्टसाध्य होते हैं और कितनेक रोग स्वभावसे साध्य होते हैं और कितनेक नहीं चिकित्सित किये रोग साध्य होते हैं ॥ १५ ॥ साध्यरोग कष्टसाध्यपनेको प्राप्त होते हैं और कष्टसाध्यरोग असाध्यपनेको प्राप्त होते हैं, इससे क्रियाको नहीं करनेवाले मनुष्योंको साध्यरोगभी मार देते हैं ॥ १६ ॥ उपद्रवका लक्षण । व्याधेरुपरि यो व्याधिःसोपद्रव उदाहृतः॥सोपद्रवा न जीवन्ति १ 'प्रत्यक्षीकरणेन च'इत्यत्र प्रत्यक्षादनुमानतःइति वा पाठान्तरम् ।२ आतुरे आदियैषां तेषां भिषजीं दृशा विचारणार्थात् पूर्ववैद्यैः किमाचरितमित्यपि विचारणीयम्। अथवा तुरस्य रोगिण आदिदृशः प्रथमदृष्टेः दर्शना- दितिभावात्तत्र पाठान्तरम् आतुरादिदृशः ।