भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 205, कुल 548 में से

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पृष्ठ 205

अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १७३ ) तोपायसंयुता ॥ ५ ॥ पठितव्या समासेन संहिताज्ञानहेतवे ॥ ज्ञात्वा रोगप्रतीकारं ततः कुर्य्यात्प्रतिक्रियाम् ॥ ६ ॥ इसलिये रोगके निवारण करनेवाले कारणसे संयुक्त सब उपाय करके निदानके लक्षण और रोगोंसे तथा रोगप्रतीकारकी चिकित्सासे अन्वित हुई वैद्यकसंहिता ॥ ५ ॥ विस्तार करके पठितकरनी योग्य है, संहिताके ज्ञानके लिये और रोगको दूर करनेके उपायको जानकर पीछे चिकित्साको करे ॥ ६ ॥ रोग नहीं जाननेसे हानि । अविज्ञाय रुजं सम्यङ्मोहादारभते क्रियाः ॥ विधानज्ञोऽथ शास्त्रज्ञो न तत्सिद्धिः प्रजायते ॥ ७ ॥ जो वैद्य रोगको नहीं जानके क्रियाका आरंभ करता है वह विधानको और शास्त्रको जानने- वाला भी सिद्धिको प्राप्त नहीं होता ॥ ७ ॥ अथ वैद्यशास्त्रज्ञाताको फल । निदानं रोगविज्ञानं भेषजानां गुणागुणम् ॥ विज्ञाय कुरुते यस्तु तस्य सिद्धिर्न दूरतः ॥ ८ ॥ निदान और रोगको जानना, औषधियोंके गुण और दोष इनको जानके जो वैद्य क्रियाको दूर नहीं करता है उसको शीघ्र सिद्धि होती है ॥ ८ ॥ रोगादिक जाननेकी आवश्यकता । आदावेव रुजां ज्ञानं साध्यासाध्यं विचक्षणः ॥ याप्यं सर्वरुजाञ्चैव ततः कुर्य्यात्प्रतिक्रियाम् ॥ ९ ॥ आदिमें वैद्य रोगके ज्ञानको और साध्य और असाध्यरूपको तथा कष्टसाध्यपनेको जाने पीछे क्रियाको करे ॥ ९ ॥ अथ देशकालआदिक जाननेकी आवश्यकता । देशं कालं वयो वह्निसात्म्यं प्रकृतिभेषजम् ॥ एवं विज्ञाय सद्वैद्यस्ततः कुर्य्यात्प्रतिक्रियाम् ॥ १० ॥ देश, काल, अवस्था, अग्नि, स्वभाव, प्रकृति इनको जानके कुशल वैद्य चिकित्साको करे ॥ १० ॥ अथ रोगहेतुवातादिदोष । नास्ति रोगो विना दोषैर्दोषा वातादयः स्मृताः॥ ज्वराद्यः स्मृता रोगास्तान्सम्यक्परिलक्षयेत् ॥ ११ ॥

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