भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 204

( १७२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- उत्तरको अथवा पूर्वको या अपनी और मुख कराकर रोगीको बैठावे पीछे ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवा- चन कराके काथका पान करावे ॥ ७२ ॥ पीछे पीनेके पात्रको अधोमुख स्थापित कर जागता हुआ शयन करे और काथका पान करक तृषावाला भी दो घडीतक पानीको नहीं पीवे ॥ ७३ ॥ जब रोगीकी ग्लानि दूर होजावे तब रोगी सुखको प्राप्त होता है ॥ ७४ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने औषधपरिज्ञानविधिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ द्वितीयोऽध्यायः २. अथ ज्वरचिकित्सा । आत्रेय उवाच॥अनभिज्ञश्चिकित्सायां शास्त्राणां पठनेन किम् ॥ यथा पलाल बीजास्तु रहितं निष्प्रयोजकम् ॥ १ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-जो वैद्य चिकित्साकर्ममें कुशल नहीं हो और वैद्यशास्त्रके पठनमें कुशल हो तिसको क्या फल होता है अर्थात् कुछ नहीं अन्नसे रहित निष्प्रयोजन तुषसे क्या तत्त्व निकलता है ? ॥ १ ॥ अथ कुवैद्यनिंदा । वरमाशीविषविषं क्वथितं ताम्रमेव च॥ पीतमत्यग्निसन्तप्ता भ- क्षिता वाप्ययोगुडाः ॥२॥ न तु श्रुतवतां वेशं बिभ्रतां शरणाग- तात् ॥ ग्रहीतुमन्नपानं वा वित्तं वा रोगपीडितात्॥ ३ ॥ सर्पादिकका विष, उबाला हुआ तांबा, अत्यंत अग्निमें तप्त किये लोहाके गोले इन सबोंको सेवना भी हित है ॥ २ ॥ परंतु वैद्योंके वेशको धारण करनेवाले और रोगियोंसे अन्न, पान, धन इनको हरनेवाले ऐसे वैद्योंकी औषधको नहीं खावे ॥ ३ ॥ अथ वैद्यका लक्षण । तदेव युक्तं भैषज्यं यदारोग्याय जायते ॥ स चैव भिषजां श्रेष्ठो रोगेभ्योयो विमोक्षयेत् ॥ ४ ॥ जो आरोग्यको करता है वही योग्य औषध है और जो रोगोंसे छुडावे वह ही उत्तम वैद्य कहाता है ॥ ४ ॥ अथ वैद्यकशास्त्रपठनकी आवश्यकता । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन रोगवारणहेतुना॥युक्ता निदानलक्षैस्तु संहि-