भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 203, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 203

अ० १ ] भाषाटीकासमेता । ( १७१ ) यात्यसाध्यत्वमेव च ॥ ६७॥ तस्माद्रक्षेद्बलं पुंसां बलशान्तिर्हि जीवितम् ॥ और ज्वरवाला रोगी पथ्यको सेवे चाहे रोगीको अरुचि भी हो तब भी ॥६६॥ अन्नकालमें नहीं भोजन करता हुआ ज्वररोगी क्षीण हो जाता है अथवा मर जाता है और क्षीण हुआ वह कष्टपनेको प्राप्त होके पीछे असाध्यपनेको प्राप्त होता है ॥६७॥ इसकारणसे मनुष्योंके बलकी रक्षा करनी । क्योंकि, बलकी शांति ही जीवन कहा है ॥ लंघिते चैव दोषे च यवागूपानमाचरेत् ॥ ६८ ॥ शालिषाष्टिकमुद्गं च यूषं शस्तं वदन्ति हि ॥ ६९ ॥ लंघनके करनेमें और दोषमें यवागूको पीता रहे ॥६८॥ सांठी चावल और मूंगका यूष ही लंघनमें श्रेष्ठ कहते हैं ॥ ६९ ॥ अथ मध्यलंघितको अन्नविधि । पञ्चकोलकसंसिद्धा यवागूर्मध्यलंघिते ॥ भवेत्प्रशस्ता सततं तस्य सन्तर्पणं हितम् ॥ ७० ॥ पीपल, पीपलामूल, चीता, चव्य और सोंठ इन पांचों मूलको कूटकर काथ बनावे इस काथमें तंदुलकी या मूंगकी यवागू बनावे और पकावे, फिर सिद्ध हुई यह यवागू मध्यलंघितको प्रशस्त है और रोगीको तृप्त रखती है ॥ ७० ॥ अथ क्लमशांतिकी विधि । आजं दुग्धं गुडोपेतं पानाय ज्वरशान्तये ॥ तेन क्लमविनाशः स्यात्सुखमाशु प्रपद्यते ॥ ७१ ॥ बकरीके दूधमें गुड मिला पीवे इसे ज्वरकी शांति होती है तब ग्लानिका नाश और तत्का- ल सुख उपजता है ॥ ७१ ॥ अथ काथपीनेकी विधि । उदीच्यां वा पूर्वस्यां वाऽभिमुखंचोपवेशयेत्॥ पाययेत्काथपानं च कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् ॥ ७२ ॥ पानपात्रमधः कृत्वा शयीत ज्ञानमेव च ॥ पीत्वा चैव तृषार्त्तोऽपि न जलं पाययेत्क्षणम् ॥ ७३ ॥ गतक्लमं नरं दृष्ट्वा तदा संपद्यते सुखम् ॥७४॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने भेषजपरिज्ञानविधिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu