भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 202

( १७० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ पाचनका निषेध । अविज्ञाते च दोषे च पाचनं न प्रदापयेत् ॥ ६० ॥ और बिना जाने दोषमें पाचन नहीं देना ॥ ६०॥ अथ ज्वरकी मर्यादा । सप्तरात्राद्धि मर्यादा ज्वरेणैवोपलक्ष्यत ॥ तस्मान्नवज्वरे पीतं दोषकृन्न च दोषहृत् ॥ ६१ ॥ ज्वरकी मर्यादा सातदिनकी प्रसिद्ध है इस वास्ते नवीन ज्वरमें पानकिया पाचनरूपी औषधः दोषको करता है किंतु दोषको हरता नहीं है ॥ ६१ ॥ अथ ज्वरमें पाचनादि देनेकी मर्यादा । तस्मादादौ प्रदेयन्तु पाचनञ्च दिनत्रयम् ॥ शमनीयं प्रदेयन्तु पञ्चरात्रं ततः परम् ॥ ६२ ॥ शोधनं दीपनीयन्तु एकरात्रं प्रदा- पयेत् ॥ ६३ ॥ इसलिये आदिमें तीनदिन पाचनको देवे उसके पीछे पांचरात शमनक्वाथको देवे ॥ ६२ ॥ शोधन और दीपनक्वाथको एकदिन देवे ॥ ६३ ॥ अथ क्वाथके विपत्तिका प्रकार । क्वाथपाने क्रमो मूर्च्छा वैक्लव्यञ्च प्रदृश्यते ॥ वमनञ्च तदा प्रोक्तं शमनं पथ्यकेऽपि वा ॥ ६४ ॥ जब क्वाथके पीनेमें ग्लानि, मूर्च्छा, विकलपना ये उपजें तब वमनसंज्ञक औषध देना और पथ्यमें शमनक्वाथ देना ॥ ६४ ॥ अथ पथ्यकी आवश्यकता । सदा पथ्यं प्रयोक्तव्यं नापथ्येन स सिध्यति ॥ औषधेन विना पथ्यैः सिद्धयते भिषगुत्तमैः ॥ ६५ ॥ विना पथ्यं न साध्यः स्यादौषधानां शतैरपि ॥ सब कालमें पथ्य देना चाहिये क्योंकि, अपथ्यसे कोई भी रोग सिद्ध नहीं होता किंतु ओष- धिके बिना भी पथ्योंकरके रोग शांत हो जाता है ॥ ६५ ॥ सैकड़ों औषधियोंको सेवतेहुए भी पथ्यके बिना रोग शांत नहीं होता ॥ अथ ज्वरितको पथ्यभोजनका उपदेश । ज्वरितो हितमश्नीयाद्यद्यप्यस्यारुचिर्भवेत् ॥६६॥ अन्नकाले- ष्वभुञ्जानो हीयत म्रियतेऽपि वा ॥ स क्षीणः कृच्छ्रतां याति