भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० १] भाषाटीकासमेता । ( १६१ ) और बनते हुए काथको लांघे नहीं और बीचमें चलावे किंतु यथायोग्य पकावे ॥ ५२ ॥ स्थापित किये काथको फिर शोषित करे नहीं और अशुद्ध जगहमें काथको बनावे नहीं और अंधेरेमें भी काथ न बनावे क्योंकि ऐसा काथ अच्छा नहीं होता किंतु रोगोंके मिलापका कारण होता है ॥ ५३ ॥ काथको फिर शोषित नहीं करे और पृथिवीमें प्राप्तहुए काथको फिरं नहीं ग्रहण करे क्योंकि रोगके नाशमें दोषको शांत करनेमें काथ श्रेष्ठ है इस लिये ओषधिके काममें काथ अच्छा है ॥ ५४ ॥ अथ क्वाथसंबन्धी अनिष्ट लक्षण। विदीर्य्यत पततेऽपि स्फुटते क्वाथतो जनः ॥ एतेऽनिष्टकराः क्वाथा न दोषशमनाय च ॥ ५५ ॥ बुरे काथसे रोगी विदीर्ण हो जाता है, गिरजाता है और फटजाता है । ये बुरे काथ दुःखको देते हैं और दोषको शांत नहीं करते ॥ ५५ ॥ अथ हीनक्वाथके लक्षण। एतैर्हिलक्षणैर्हीनंक्वाथं दृष्ट्वा परीक्षयेत् ॥ ५६ ॥ कृष्णं नीलं घनं रक्तं पिच्छिलं शिथिलञ्च यत् ॥ दग्धं कुणपगन्धञ्च विस्रग- न्धं विवर्जयेत् ॥५७॥ एतैर साध्यं जानीयाद्रोगिणं नात्र संशयः ॥ इन पूर्वोक्तलक्षणोंसे हीनहुए काथकी परीक्षा करनी ॥ ५६ ॥ काला, नीला, कठिन, लाल झागोंवाला, शिथिल, दग्ध हुआ, मुर्दाकेसी गन्धवाला, कच्ची गन्धवाला, ऐसे काथको वर्ज देवे ॥ ५७ ॥ इस तरहके काथसे रोगी असाध्य होजाता है इसमें संशय नहीं ॥ अथ उत्तम क्वाथका लक्षण । द्रव्यगुणानुवर्णेन द्रव्यगन्धं विनिर्दिशेत् ॥ ५८ ॥ तद्वद्विशुद्धं सच्छायं कषायममृतोपमम् ॥ द्रव्यके गुणके अनुबन्धसे द्रव्यके गन्धको कहे ॥ ५८ ॥ विशेषकरके शुद्ध और सुन्दर कांतिवाला काथ अमृतके समान होता है ॥ अथ वातज्वरमें पाचनका विधि । वातज्वरे लङ्घनान्ते दत्त्वा चान्नं तथोपरि ॥ निशासु पाचनं देयं ज्ञात्वा दोषबलाबलम् ॥ ५९ ॥ वातज्वरमें लंघनके अन्तमें अन्नको देकर रातको पाचन काथ देवे परन्तु दोषके बल और अबलको देखे ॥ ५९ ॥ अथ पित्तज्वर और कफज्वरमें पाचनका विधि। त्रिरात्रे पैत्तिके देयं श्लैष्मिके प्रथमेऽहनि ॥ पित्तके ज्वरमें तीसरे दिन और कफज्वरमें प्रथम दिन पाचन देना ॥