भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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( १८० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- निशासु क्षीरेण सकोल‌मिश्रं पानं सपित्तज्वरपाचनाय ॥४८॥ हलदी, नीमकी छाल, गिलोय, धनियां, सोंठ इनका क्वाथ बनाकर उसमें गुड मिलाकर पीवे अथवा दूबमें गजपीपलके चूर्णको मिलाकर रातको पीवे यह पाचनः पित्तज्वरमें मनु- ष्यको सुख देता है ॥ ४८ ॥ अथ कफज्वरमें पाचन । वचायवानी त्रिफला सविश्वा क्वाथो निशायां कफजे ज्वरे वा॥ सपाचनं स्यान्मनुजस्य दोषे शूले प्रतिश्यायकपीनसेषु॥४९॥ वच, अजवायन, हरड़े, बहेड़ा, आंवला, सोंठ इनका क्वाथ कफसे उपजे ज्वरमें और शूल, जुकाम, पीनस, इनमें रातको देना ॥ ४९ ॥ अथ सन्निपातज्वरमें पाचन । शटीवचानागरकाफलानां वत्साडनीधन्वयवासकानाम् ॥ क्वाथो हितःसर्वभवे ज्वरे च सम्पाचनं स्यान्मनुजत्रिदोषे५०॥ कचूर, वच, सोंठ, हरडैं, बहेडा, आंवला, गिलोय, जवासा इनका क्वाथ सब प्रकारके ज्वरमें और मनुष्योंके त्रिदोषज ज्वरमें पाचन है ॥ ५० ॥ अथ ज्वरमें पथ्य । रात्रौ सुखोष्णतोयेन प्रचुरेण च धीमताम् ॥ अङ्गसंमर्दनं पथ्यं निद्राव्यायामवार्जितम् ॥ ५१ ॥ रात्रिमें सुखपूर्वक गरम पानी करके अतिशयसे मनुष्योंके अगोंका मर्दन पथ्य है परंतु नींद और कसरतको वर्जना ॥ ५१ ॥ अथ वातज्वरका निदान और चिकित्सा । वेपथुर्विषमवेगशोषणं कण्ठतालुवदने विरस्यता॥रूक्षता वपुषि बन्धकुक्षयोर्जृम्भणं शिरसि रुग्विद्रिता ॥ ५२ ॥ कृष्णता कररुहां प्रलापको गात्रभङ्गबलवान् बिभत्सयति ॥भीतवत्स्व- पिति जाग्रतो नरो लक्षणैर्भवति वातकृज्ज्वरः ॥ ५३ ॥ शरीर कांपे, ज्वरका विषमवेग हो, कंठ, तालु, मुख इनमें शोष उपजे, मुखमें विरस- पना हो, शरीरमें रूखापन हो, कुक्षिबन्ध हो जावे, जँभाई आवे और शिरमें शूल उपजे और नींद आवे नहीं ॥ ५२ ॥ नख काले हो जावें, बकवाद करे, शरीरका भंगहोवे और बल- १ "प्रलापो ऽनर्थकं वचः” इत्यमरः ।