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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

( १८० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- निशासु क्षीरेण सकोल‌मिश्रं पानं सपित्तज्वरपाचनाय ॥४८॥ हलदी, नीमकी छाल, गिलोय, धनियां, सोंठ इनका क्वाथ बनाकर उसमें गुड मिलाकर पीवे अथवा दूबमें गजपीपलके चूर्णको मिलाकर रातको पीवे यह पाचनः पित्तज्वरमें मनु- ष्यको सुख देता है ॥ ४८ ॥ अथ कफज्वरमें पाचन । वचायवानी त्रिफला सविश्वा क्वाथो निशायां कफजे ज्वरे वा॥ सपाचनं स्यान्मनुजस्य दोषे शूले प्रतिश्यायकपीनसेषु॥४९॥ वच, अजवायन, हरड़े, बहेड़ा, आंवला, सोंठ इनका क्वाथ कफसे उपजे ज्वरमें और शूल, जुकाम, पीनस, इनमें रातको देना ॥ ४९ ॥ अथ सन्निपातज्वरमें पाचन । शटीवचानागरकाफलानां वत्साडनीधन्वयवासकानाम् ॥ क्वाथो हितःसर्वभवे ज्वरे च सम्पाचनं स्यान्मनुजत्रिदोषे५०॥ कचूर, वच, सोंठ, हरडैं, बहेडा, आंवला, गिलोय, जवासा इनका क्वाथ सब प्रकारके ज्वरमें और मनुष्योंके त्रिदोषज ज्वरमें पाचन है ॥ ५० ॥ अथ ज्वरमें पथ्य । रात्रौ सुखोष्णतोयेन प्रचुरेण च धीमताम् ॥ अङ्गसंमर्दनं पथ्यं निद्राव्यायामवार्जितम् ॥ ५१ ॥ रात्रिमें सुखपूर्वक गरम पानी करके अतिशयसे मनुष्योंके अगोंका मर्दन पथ्य है परंतु नींद और कसरतको वर्जना ॥ ५१ ॥ अथ वातज्वरका निदान और चिकित्सा । वेपथुर्विषमवेगशोषणं कण्ठतालुवदने विरस्यता॥रूक्षता वपुषि बन्धकुक्षयोर्जृम्भणं शिरसि रुग्विद्रिता ॥ ५२ ॥ कृष्णता कररुहां प्रलापको गात्रभङ्गबलवान् बिभत्सयति ॥भीतवत्स्व- पिति जाग्रतो नरो लक्षणैर्भवति वातकृज्ज्वरः ॥ ५३ ॥ शरीर कांपे, ज्वरका विषमवेग हो, कंठ, तालु, मुख इनमें शोष उपजे, मुखमें विरस- पना हो, शरीरमें रूखापन हो, कुक्षिबन्ध हो जावे, जँभाई आवे और शिरमें शूल उपजे और नींद आवे नहीं ॥ ५२ ॥ नख काले हो जावें, बकवाद करे, शरीरका भंगहोवे और बल- १ "प्रलापो ऽनर्थकं वचः” इत्यमरः ।

अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १८१ ) धान रहे और भयकी इच्छा करे और भयभीतकी तरह सोवे परन्तु जागता ही रहे ये लक्षण वातज्वरके हैं ॥ ५३ ॥ अथ वातज्वरका पाचन । नागरं सुरतरुश्च धान्यकं कुण्डली बृहत्तिकायुग निशम् ॥ सप्तमे निशि प्रशस्यते ज्वरे चाष्टमांशगतको हि अष्टवान्॥५४॥ सोंठ, देवदारु, धनियां, गिलोय, दोनों कटेली, हल्दी, दारुहल्दी इन आठ औषधोंकी अष्टमावशेष पाचन संज्ञक काथ बना ज्वरमें सातवीं रात्रीको देना ॥ ५४॥ यह शुंठ्यादि पाचन सब प्रकारके ज्वरोंमें देना चाहिये ॥ अथ अन्नहीन औषधका गुण । वीर्याधिकं भवति भेषजमन्नहीनं हन्यात्तदामयमसंशयमाशु चैव ॥ तद्वालवृद्धयुवतीमृदुभिश्च पीतंग्लानिं परां नयति चाशु बलक्षयं च ॥ ५५ ॥ अन्नसे हीन हुआ औषध अधिक वीर्यवाला हो जाता है और रोगको निश्चय शीघ्र नाशता है ॥ परन्तु बालक, वृद्ध, युवतीस्त्री, कोमल, इनकरके पिया हुआ वह अन्नरहित औषध परम- ग्लानिको और बलक्षयको करता है ॥ ५५ ॥ अथ पाचन हुए औषधका लक्षण । इन्द्रियाणां लघुत्वञ्च नेत्रास्यस्य प्रसादता ॥ सोद्गारमुष्णता कोष्ठे जीर्णभेषजलक्षणम् ॥ ५६ ॥ इंद्रियोंका हलकापन हो नेत्र और मुखकी प्रसन्नता रहे , डकार आवे, कोष्ठमें गर्माई रहे ये पके हुए औषधके लक्षण हैं ॥ ५६ ॥ अथ अपक्व औषधका गुण । क्लमहृल्लाससदनं शिरोरुग्भ्रंशमेव च उत्क्लेदो जायते यस्य विद्यादुत्क्राममौषधम् ॥ ५७ ॥ ग्लानि और थुकथुकी हो, शरीर शिथिल हो जावे, शिरमें शूल और फूटन उपजे और वम नसा आनेकी तरह होवे ये नहीं जीर्ण हुए औषधके लक्षण हैं ॥ ५७ ॥ अथ पाचन होनेमें कुछ शेषरहे औषधका लक्षण । दाहाङ्गसदनं मूर्च्छा शिरोरुक्क्लसदीनता ॥ भ्रमोऽरतिविशेषेण सविशेषौषधाकृतिः ॥ ५८ ॥ तस्मादौषधशेषे तु न दोषशमनं क्वचित् ॥ कुप्यन्त्यनेकधा दोषा न देयं पाचनं विना ॥५९॥ १ सर्वज्वरेषु नागरादिपाचनं देयम् । Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

( १८२ ) हारीतसंहिता ! [ तृतीयस्थाने- दाह हो, अंग शिथिल हो जावे, मूर्च्छा, शिरमें शूल, ग्लानि, दीनपना ये उपजे, भ्रम हो और विशेष करके अरति हो ये लक्षण कुछ कमपकी औषधके हैं ॥ ५८ ॥ इसकारणसे औष- धिके शेषमें कहीं भी दोषका शमन नहीं है क्योंकि पाचनके विना दोष अनेक प्रकारसे कुपित होते हैं ॥ ५९ ॥ अथ भोजनके उपरांत देनेके औषधके गुण । शीघ्रं विपाकमुपयाति बलं न हन्यादन्नावृतं न च मुहुर्वदनान्निरे- ति ॥ प्राग्भुक्तसेवितमहौषधमेतदेव दद्याच्च वृद्धशिशुभीरुवराङ्ग- नाभ्यः ॥ ६० ॥ अन्नसे आवृत हुआ औषध शीघ्र पकजाता है और बलको नाशता नहीं है और वारंवार मुखसे नहीं निकलता है इसलिये प्रभातके भोजनके साथ सेवित किया औषध-वृद्ध, बालक, डर- पोंक और स्त्री इनको सुख देता है ॥ ६० ॥ अथ वातज्वरमें पंचमूलका क्वाथ । बिल्वाग्निमन्थशुकनासकपाटलीनां कुम्भारिकाप्रयुतकं क्वथितं कषायम् ॥ दन्तान्विशोधयति वारयते समीरं नाशं करोति मरुतज्वरमाशु पुंसाम् ॥ ६१ ॥ मुस्ताकिरातसुरवल्लिकणास- वित्र्यो गोकण्टको बृहतियुग्ममुदीच्यतिक्ताः॥स्याच्छाखिपर्णि- कलशीक्वथितः समन्तात्क्वाथः समीरणभवं ज्वरमाशु हन्ति ॥ ६२ ॥ गुडूची शतपुष्पा च पृक्षी रास्ना पुनर्नवा ॥ त्राय- माणकक्वाथश्च गुडैर्वातज्वरापहः ॥ ६३ ॥ बेलगिरी, अरनी, सोनापाठा, पाडल, कोहला, कुंभेरन इनका क्वाथ बना पीवे यह दन्तोंको शोधता है और वातको दूर करता है मनुष्योंके वातज्वरको शीघ्र नाशता है ॥ ६१ ॥ चिरा- यता, नागरमोथा, गिलोय, पीपल, लालआक, गोखरू, दोनोंकटेली, नेत्रवाला, कुटकी, पिठ- वन, चौलाई, इन्होंका क्वाथ वातज्वरको अच्छीतरह नाशता है ॥ ६२ ॥ गिलोय, सौंफ, पिठवन, रायसन, सांठी, त्रायमाण इनके क्वाथमें गुड़मिलाकर पीवे यह वातज्वरको हरता है ॥ ६३ ॥ अथ पित्तज्वरके निदान और चिकित्सा । मूर्च्छादाहो भ्रममदतृषावेगतीक्ष्णोऽतिसारस्तन्द्रालस्यं प्रलपन- वमीपाकतापश्च वक्त्रे ॥ स्वेदः श्वासो भवति कटुकं विह्वलत्वं क्षुधा वा एतैर्लिङ्गैर्भवति मनुजे पैत्तिको वै ज्वरस्तु ॥ ६४ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

अ० २] भाषाटीकासमेता । ( १८३ ) मूर्च्छा और दाह उपजे, भ्रम,मद, तृषा ये भी होवें और ज्वरका तीक्ष्ण वेग हो अतीसार हो तंद्रा और आलस्य हो और बकवाद करे और छर्दि आवे और मुखमें पाक और दाह हो,पसीना और श्वास उपजे मुख कडुआ हो जावे विह्वलपना और भूख भी होवे, ये सब लक्षण होवें तब पित्तज्वर जानना ॥ ६४ ॥ अथ रोध्रादि क्वाथ । रोध्रोत्पलामृतलताकमलं सिताढ्यं तत्सारिवासहितमेव हि पाच- नेषु॥निष्क्वाथ्य क्वाथमति चाशु निहन्ति पित्तं पित्तज्वरप्रश- मनं प्रकरोति पुंसाम् ॥ ६५ ॥ लोध, नीलाकमल, गिलोय, श्वेतकमल, सफेद भटकटैया, सारिवा इन्होंका पाचन क्वाथ बना तिसमें मिश्री डाल पीवे यह पित्तको शीघ्र शांत करता है और मनुष्योंके पित्तज्वरको भी नाशता है ॥ ६५ ॥ अथ शक्राह्वादि क्वाथ । क्वथितं तण्डुलपयसा शक्राह्वं कटुरोहिणीसहितम् ॥ क्वाथं यष्टीमधुना विनाशनं पित्तज्वराणाम्तु ॥ ६६ ॥ इन्द्रयव, कुटकी, मुलहटी इनका क्वाथ चावलोंके पानीमें बनाकर मधुके साथ पीवे यह पित्त- ज्वरको नाशता है ॥ ६६ ॥ दुरालभादि क्वाथ । दुरालभावासकपर्पटानां प्रियङ्गुनिम्बोत्कटुरोहिणीनाम्॥किरात- तिक्तं क्वथितं कषायं सशर्कराढ्यं क्वथितञ्च पाचनम् ॥ ६७ ॥ सदाहपित्तज्वरमाशु हन्ति तृष्णाभ्रमं शोषविकारयुक्तम् ॥६८॥ जवासा, वासा, पित्तपापडा, प्रियंगु, नींवकी छाल, कटुकी, चिरायता, इन्होंका क्वाथ बना खांडसे संयुक्तकर पीवे पाचन है ॥ ६७ ॥ यह दाह, पित्तज्वर, तृषा, भ्रम, शोषरोग, इनको नाशता है ॥ ६८ ॥ अथ पित्तपापडाका क्वाथ । एकोऽपि वै पर्पटको वरिष्ठः पित्तज्वराणां शमनाय योग्यः ॥ तस्मात्पुनर्नागरवालकान्यैः सिंहो यथा कङ्कटकप्रवृत्तः॥६९॥ १-प्रियंगु गोंदींके समान फल है जिसे मालवेमें गेहुला कहते हैं इसमें सुगंधी भी होती है, यह गंध प्रियंगु है और प्रियंगु गोंदी फल ही समझिये । Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

( १८४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अकेला पित्तपापडाका क्वाथ भी पित्तज्वरको शांत करनेके लिये योग्य और अति उत्तम है फिर सोंठ और नेत्रवालासे युक्तकिये पित्तपापडाका क्वाथ पित्तज्वरको ऐसे नाशता है जैसे हाँसके भिंडेमें प्राप्तहुआ सिंह वनके पशुको नाशता है ॥ ६९ ॥ अथ शुंठादि क्वाथ । नागरोशीरमुस्ता च चन्दनं कटुरोहिणी ॥ धान्यकानां तु क्वाथश्च पित्तज्वरविनाशनः ॥ ७० ॥ सोंठ, खस, नागरमोथा, रक्तचंदन, कुंटकी, धनियां इनका क्वाथ पित्तज्वरको ना- शता है ॥ ७० ॥ अथ गुडूच्यादि क्वाथ । अमृतं पर्पटो धात्री क्वाथः पित्तज्वरं हरेत् ॥७१ ॥ गिलोय, पित्तपापडा, आंवला, इनका क्वाथ पित्तज्वरको नाशता है ॥ ७१ ॥ अथ द्राक्षादि क्वाथ । द्राक्षापर्पटिकातिक्तापथ्यारग्वधमुस्तकैः ॥ क्वाथो भ्रमस्तृषादाहयुक्तपित्तज्वरापहः ॥ ७२ ॥ दाख, पित्तपापडा, कुटकी, हरड़, अमलतास, नागरमोथा, इनका क्वाथ तृषा, भ्रम, दाह इनसे युक्तहुए पित्तज्वरको नाशता है ॥ ७२ ॥ अथ दाहतृषामूर्च्छाके ऊपर विदार्यादिकोंका उपचार । विदारिकारोध्रकपित्थकानां स्यान्मातुलुङ्‌गस्य च दाडिमानाम्॥ यथानुलाभेन च तालुलेपो दाहं तृषामूर्च्छनमाशु हन्ति ॥७३॥ विदारीकंद, लोध, कैथ, बिजौरा, अनार, इनमेंसे जितने मिलें उनका लेप बनाकर तालुके ऊपर लगावे यह दाह, तृषा, मूर्च्छा, इनको नाशता है ॥ ७३ ॥ अथ दाहज्वरका उपाय । उत्तानस्य प्रसुप्तस्य कांस्ये वा ताम्रभाजने ॥ नाभौ निधाय धारां तु शीतां दाहं निवारयेत् ॥ ७४ ॥ रोगीको सीधा शयन कराके तिसकी नाभीपर कांसीके अथवा तांबाके पात्रमें पानीकी धारा देनी यह दाहको नाशती है ॥ ७४ ॥ रम्यरामाकुचभरनतालिङ्गनं चेष्टसङ्गाद्राक्षापानं निगदितमथो शीतलं सेवनं स्यात् ॥ शुभ्राम्भोजं मलयजजलासिक्तसंशीत-

अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १८५ ) वासो मुक्ताहारो विशदतुहिनं कौमुदी वा सुखाय ॥७५॥ एत घ्नन्ति द्रुततरनिभं मानुषाणां तु पित्तं दाहं शोषं क्लममपि तथा तृड्भ्रमं मूर्च्छनाञ्च॥एतद्योगं भवति नितरां पित्तदाहस्य शान्ति- योग्या चैवं भवति सततं तत्क्रिया श्रीमताञ्च ॥ ७६ ॥ सुंदर और रमणीक चूचियोंके भारसे नम्रहुई स्त्रीका आलिंगन करे परंतु मथुनको नहीं करे और दाखके रस सेवन करे, शीतलपदार्थको सेवता रहे सफेद कमल और मलयागिरि चदनके पानीसे भिगोयाहुआ शीतलवस्त्रको धारे और मोतियोंकी मालाको पहने और सुंदर शीतल हवा और चांदनी ये सब पित्तज्वरको सुख देते हैं ॥ ७५ ॥ यह सब मनुष्योंके पित्त, दाह, शोष, ग्लानि, तृषा, भ्रम और मूर्च्छाको शांत करते हैं और इन योगोंसे पित्तका दाह दूर होजाता है, धनवान् मनुष्योंके वास्ते यह क्रिया निरंतर योग्य है ॥ ७६ ॥ अथ ज्वरशोषका उपाय । यदि जिह्वागलतालुशोषश्चेन्मनुजस्य च ॥ केसरं मातुलुङ्गस्य मधुसैन्धवसंयुक्तम् ॥ पेष्यमाणं तालुलेपे सद्यः पित्तज्व- रापहम् ॥ ७७ ॥ और जो मनुष्यके जीभ, गल, तालु इनमें शोष उपजे तो बिजौराका केसर ले उसमें शहद और सैंधानमक मिला पीसकर तालुपे लेप करें यह शीघ्र पित्तज्वरको नाशता है ॥७७॥ अथ कफज्वरका निदान और चिकित्सा । स्तैमित्यं मधुरास्यता च जडता तन्द्रा भृशं स्यात्तथा गात्राणां गुरुतारुचिर्विरसता रोमोद्गमः शीतता ॥ प्रस्वेदाः श्रुतिरोधनञ्च भवते नेत्रे च पाण्डुच्छवी विष्टब्धं मलमूत्रिकासवमनं श्लेष्म- ज्वरे ज्ञायताम् ॥ ७८ ॥ शरीरका गीलापन हो, मुख मीठा रहे, जडपना,अत्यंत तंद्रा हो, शरीरका भारीपन, अरुचि, ग्लानि, रोमोंका खडा होना, शीतलपना ये उपजे और पसीना आवे और कानोंका छिद्र रुक जावे और आधा पीला और आधा सफेद ऐसे वर्णकी कांतिसे संयुक्त नेत्र होजावें मलकी प्रवृत्ति बँधी हो, खांसी और छर्दि आवे ये सब लक्षण हों तब कफज्वर जानना ॥ ७८ ॥ अथ कफज्वरका पाचन पिप्पल्यादिकल्क । पिप्पलादिककल्कं तु कफजे पाचनं हितम् ॥ ७९ ॥ १ “पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरैः । वचासातिविषाजाजीपाठावत्सकरेणुकैः १ किराततिक्तरुकंमूवा सर्षपा मरिचानि च । कटुकं पुष्करं भार्ङ्गी विडङ्गं कर्कटाह्वयम् २ अर्कमूलं बृहत्सिंही श्रेयसी सुदुरालभा।दीपक चाजमोदाच शुकनासाद्धिहङ्गुभिः ३ एतानि समभागानि गणोऽष्टाविंशको मतः। कषायमुपभुञ्जीत वातश्लेष्मज्व- रापहम् ४ हन्ति वातं तथा शीतं स्वेदजं प्रवलं कफम्।प्रलापंचातितन्द्रां च रोमहार्च्चितथा ५ महावातेऽपत- मन्त्रे च सर्वगात्रेच शून्यताम् । अयं सर्वज्वरान् हन्ति सन्निपातांस्त्रयोदशति ॥ ६ ॥” इति शार्ङ्गधरे ।

( १८६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- पिप्पलादि गणके औषधोंका कल्क कफके ज्वरमें सुंदर पाचन है ॥ ७९ ॥ अथ व्याघ्यादिकल्क । तद्वद्याघ्री च सिंही च रोध्रं कुष्ठपटोलकम् ॥ ज्वरे कफात्मजे चैतत्पाचनं स्यात्तदुत्तमम् ॥ ८० ॥ छोटी कटेली, बड़ी भटकटैया, लोध, कूट, परवल, इनका पाचन कफज्वरमें हित है॥८०॥ अथ वासादिक्वाथ । वासा गुडूची त्रिफला पटोली शटी च तिक्ता मधुनीकषायम्॥ श्लेष्मप्रभूतेषु रुजेषु सम्यग् ज्वरं निहन्यात्कफजञ्च शीघ्रम्॥८१॥ वांसा, गिलोय, हरड़, बहेड़ा, आंवला, परवल, कचूर, कुटकी, इनके क्वाथमें शहद मिला- कर श्लेष्मासे उत्पन्न होनेवाले रोगोंमें पीवे यह कफके ज्वरको शीघ्र नाशता है ॥ ८१ ॥ अथ आमलक्यादिक्वाथ । आमलक्यभया कृष्णा षड्ग्रन्था त्रित्रिकन्तथा ॥ मलभेदी कफान्तको ज्वरनाशनदीपनः ॥ ८२ ॥ आमला, हरडै, पीपल, वच, सोंठ, मिर्च, पीपल, हरडे, बहेडा, आंवला और दालचिनी, इलायची, तेजपात, इनका क्वाथ मलको पतला करता है कफको हरता है ज्वरको नाशता है और अग्निको जगाता है ॥ ८२ ॥ अथ पिप्पल्यादिक्वाथ । पिप्पली शृङ्गवेरञ्च षड्ग्रन्था वत्सकं फलम् ॥ क्वाथो मधुप्रगाढः स्याच्छ्लेष्मज्वरविनाशनः ॥ ८३ ॥ पीपल, अदरख, वच, इंद्रयव, इन्होंका क्वाथ बना तिसमें शहद मिला पीनेसे कफज्वरका नाश होता है ॥ ८३ ॥ अथ पिप्पलीका अवलेह । क्षौद्रेण पिप्पलीचूर्णं लिह्येच्छ्लेष्मज्वरापहम् ॥ प्लीहानाहविषं हन्ति कासश्वासाममर्द्दनम् ॥ ८४ ॥ पीपलके चूर्णको शहदमें मिला चाटनेसे कफज्वर, तिल्लीरोग, अफारा, विष, खांसी, श्वासरोग, आम, इनका नाश होता है ॥ ८४ ॥ अथ वातपित्तज्वरका निदान और चिकित्सा । तृष्णा मूर्च्छा वमन कटुता चानने रूक्षता स्यादन्तर्दाहो वपुषि Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

'अ० २] भाषाटीकासमेता । ( १८७ ) नयने रक्तता कण्ठशोषः॥निद्रानाशः श्वसनशिरसो रुकप्रभे- दोऽङ्गभङ्गो रोमोद्धर्षस्तमकमितिचेद्वातपित्तज्वरःस्यात् ॥८५॥ तृषा, मूर्च्छा, छर्दि, ये उपजें और मुखमें कडुआपन हो और शरीर रूखा होजावे, शरीर- के भीतर दाह हो और लालनेत्र होजावें और कंठमें शोष होवे और नींदका नाश हो, श्वास और शिरमें शूल और फूटनहो और अँगडाइ टूटे रोमावली खडी हो, और अँघेरी आवे ये सब लक्षण हों तब वातपित्तज्वर जानना ॥ ८५ ॥ अथ वातपित्तज्वरका पाचन त्रिफलाद क्वाथ। संसृष्टदोषैर्विहितञ्च सम्यग्विपाचनं पित्तमरुज्ज्वरे च ॥ फलत्रिकं शाल्मलिसंप्रयुक्तं रास्नाकिरातस्य पिवेत्कषायम्॥८६॥ मिलेहुए दोषोंसे युक्त ज्वरमें योग्य पाचनको वातपित्तज्वरमें देवे और हरडे, बहेडा, आंवला, शमलकी छाल, रायसन, चिरायता, इनके क्वाथको पीवे ॥ ८६ ॥ अथ शालिपर्ण्यादिकल्क । द्विपञ्चमूली सह नागरेण गुडूचिभूनिम्बनघनैः समेतः ॥ कल्कः प्रशस्तः सगुडो मरुत्सु स पित्तवातज्वरनाशहेतुः॥८७॥ दशमूल, सोंठ, गिलोय, चिरायता, नागरमोथा इनके कल्कमें गुड़ मिला खावे, यह वात- पित्तज्वरको नाशता है और वातसे उत्पन्न होनेवाले रोगोंमें हित है ॥ ८७ ॥ अथ किरातादि क्वाथ । किराततिक्तामलकीशटीनां द्राक्षोषणानागरकामृतानाम् ॥ क्वाथः सुशीतो गुडसंयुक्तः स्यात्स पित्तवातज्वरनाशहेतुः॥८८॥ चिरायता, कुटकी, आंवला, कचूर, मुनक्का, दाख, मिर्च, सोंठ, गिलोय, इनका क्वाथ गुड़ मिलाकर ठंडा पीवे यह वातपित्तज्वरको नाशता है ॥ ८८ ॥ अथ पंचभद्रक्वाथ । अमृतमुस्त कवासापर्पटविश्वाजलेन क्वाथः ॥ पानं पित्तमरुत्सु ज्वरं निहन्याच्च भद्रपुञ्जः ॥८९ ॥ गिलोय, नागरमोथा, वांसा, पित्तपापडा, सोंठ इनका पानीमें क्वाथ बनावे, यह पंचभद्र- क्वाथ वातपित्तज्वरको नाशता है ॥ ८९ ॥ अथ पित्तकफज्वरका निदान और चिकित्सा । निद्रागौरवकात्ससन्धिशिरोरुक्चार्तिस्तथा पर्वणां भेदो मध्य- मवेगमत्र नयनेवातान्विते श्लेष्मणि॥सन्तापः श्वसनं रुचिःश्रु-

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( १८८ ) हारीतसंहिता । [तृतीयस्थाने- त्तिपथे कण्ठे च शुष्कावृत्तिस्तन्द्रामोहमरोचकभ्रममथ श्लेष्मज्वरे पित्तले ॥ ९० ॥ नींद बहुत आवे, शरीर गुरु रहे,संधि और शिरमें शूल और संधि टूटे और वेग मध्य होवे नेत्रोंमें संताप हो, श्वास हो, सुननेमें रुचिहो और कंठमें सूखापन हो और तंद्रा, मोह,अरोचक, भ्रम, ये भी उपजें, ये सब लक्षण होव तब पित्तकफज्वर जानना ॥ ९० ॥ अथ पित्तकफज्वरका पाचन शुंठचादि क्वाथ । नागरं भद्रमुस्तां वा गुडूच्यामलकाह्वयम् ॥ पाठामृणालोदी- च्याश्च क्वाथः पित्तज्वरे कफे ॥ ९१ ॥ पाचनो दीपनीयः स्याद्रक्तशोषनिवारणः ॥ ९२ ॥ सोंठ, नागरमोथा, गिलोय, आंवला, पाठा, कमलकी डंडी, नेत्रवाला, इनका क्वाथ पित्त- कफज्वरमें हित है ॥ ९१ ॥ और पाचन है, अग्निको जगाता है, रक्तको और शोषको दूर करता है ॥ ९२ ॥ अथ द्राक्षादि क्वाथ । द्राक्षामृतावासकरिष्टकाश्च भूनिम्बतिक्तेन्द्रयवाः पटोलम् ॥ मुस्तासभाग्रां क्वथितः कषायःसश्लेष्मपित्तज्वरनाशनाय ९३॥ मुनक्का, दाख, गिलोय , वांसा, नींबकी छाल, चिरायता, कुटकी, इंद्रयव, परवल, नागर- मोथा, भारंगी इनका क्वाथ पित्तकफज्वरको नाशता है ॥ ९३ ॥ गुडूच्यादि क्वाथ । गुडूचिका निम्बदलानि शुण्ठी मुस्तञ्च कुस्तुम्बुरुचन्दनानि ॥ क्वाथं विदध्यात्कफपित्तवातज्वरं निहन्याच्च गुडूचिकाद्यः॥९४ एष सर्वज्वरान्हन्ति हृल्लासाद्यानरोचकान् ॥ प्रतिश्यायपिपा- साघ्नः शोषदाहनिवारणः ॥ ९५ ॥ गिलोय, नींबके कोंपल, सोंठ, नागरमोथा, धनियां, रक्तचंदन, यह गुडूच्यादि क्वाथ पित्त- कफज्वरको हरता है ॥ ९४ ॥ और यही क्वाथ सब प्रकारके ज्वर, थुकथुकी, अरोचक, जुकाम, पिपासा, शोष, दाहको नाशता है ॥ ९५ ॥ अथ अन्यगुडूच्यादि क्वाथ । गुडूचिकानिम्बकचक्रवासकं शटी किरातं मगधाष्टहल्यौ ॥ दार्वापटोलं क्वथितं कषायं पिबेन्नरः पित्तकफे ज्वरे च ॥९६॥ गिलोय, नींबकी छाल, तगर, बांसा, कचूर, चिरायता, पीपल, अष्टहली, दारुहलदी, परवल, इनके क्वाथको पीवे यह पित्तकफज्वरमें हित है ॥९६ ॥

३. तृतीय स्थान: चिकित्सा स्थान (कायचिकित्सा, शल्य व शालाक्य योग)

अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १८९ ) अथ पटोलादि क्वाथ। पटोली चन्दनं तिक्ता मूर्वा पाठामृतौगणः १॥ पित्तश्लेष्मज्वरच्छर्द्दिदाहकण्डूनिवारणः ॥९७॥ परवल, रक्तचंदन, कुटकी, मरोडफली, पाठा, गिलोय आदि गणके औषध, इन्होंका क्वाथ पित्तकफज्वर, छर्दि, दाह, खाज इनको दूर करता है ॥ ९७ ॥ अथ अन्यपटोलादि क्वाथ । पटोलवासापिचुमन्दकस्य मूलानि यष्टीमधुकं धना च ॥ कषा- यमेतत्प्रतिसाधितन्तु ज्वरे कफे पित्तभवे प्रशस्तः ॥ ९८ ॥ सन्दीपनो पित्तकफात्मके च तथैव पित्तासृजसंभवे च॥ ज्वरे मलानां प्रतिभेदनः स्यात्पटोलधान्याश्रितकः प्रशस्तः ॥९९॥ परवल, वांसा, नीमकी छाल, मुलहटी, धनियां इनका क्वाथ पित्तकफज्वरमें श्रेष्ठ है ॥९८॥ यह क्वाथ अग्निको जगाता है, पित्त कफज्वरमें हित है, पित्तरक्तके ज्वरमें हित है और मलोंको पतला करता है तथा परवल और धनियांका भी क्वाथ इन रोगोंमें ठीक है ॥ ९९ ॥ अथ वातकफज्वरका निदान और चिकित्सा । शीतं वेपथुपर्वभङ्गवमथुर्गात्रे जडत्वं चरुङ्मन्दोष्मारुचिबन्धनं परुषता कासस्तमःशूलवान् ॥ तन्द्रा कूजनमात्मलौल्यमथवा स्तैमित्यजृम्भारुचिःप्रस्वेदोमलमूत्ररोधसहितः स्याच्छ्लेष्मवात- ज्वरः ॥ १०० ॥ शीत लगे और शरीर कांपे और संधियें टूटें, वमन हो और शरीरमें जडपना, शूल, मंदाग्नि, अरुचि, बंधना, कठोरपना, खाँसी, अन्धकारमें जैसे प्रवेश करनेका कष्ट ये उपजैं, तंद्रा हो, शब्दको करे और शरीरमें चंचलपनाहो और शरीरका गीलापन, जंभाई, अरुचि, ये उपजैं और पसीना आवे मल और मूत्र रुकजावे ये सब लक्षण होवें तब वातकफज्वर जानना ॥ १०० ॥ अथ आरग्वधपंचक । आरग्वधस्तिक्तकरोहिणी च हरीतकी पिप्पलिमूलमुस्ता ॥ निष्क्वाथ्य कल्कः कफवातयुक्ते ज्वरे सशूले हितपाचनोऽयम् १०१ आरग्वध, कुटकी, हरडा, पीपलामूल, नागरमोथा, इनका क्वाथ करके कल्क करे, यह कल्क कफवातमें उत्पन्न शूलकरिके युक्त ज्वरमें हितकारक और पाचन है ॥ १०१ ॥ १ हर्र, गिलोय, नागरमोथा, चित्रा, चिरायता, हल्दी, इन्द्रजौ, सोंठि ।

( १९० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ क्षुद्रादिपाचन । क्षुद्रा गुडूची सह नागरेण वासाजलं पर्पटकञ्च पथ्याः॥मुस्ता च दुःस्पर्शयुतः कषायः पीतो हितो वातकफज्वरस्य॥१०२॥ कटैली, गिलोय, सोंठ, वांसा, नेत्रवाला, पित्तपापड़ा, हरड़े, नागरमोथा, जवासा इनका काथ वातकफज्वरको नाशता है ॥ १०२ ॥ अथ पर्पटादि क्वाथ । पर्पटनागाख्यवचातन्तुककट्फलैलाभयाविश्वभूतिका ॥ क्वाथो हिङ्गुमधुयुतः कफवाते सहिक्कारोगे सगलग्रहे च ॥ १०३ ॥ पित्तपापड़ा, नागकेशर, वच, रोहिषतृण, कायफल, इलायची, हरड, सोंठ, करंजुवा, इनके क्वाथमें हींग और शहद मिला पीवे यह कफवातज्वर, हिचकी रोग, गलग्रह इनमें हित है॥१०३॥ अथ दशमूल क्वाथ । द्विपञ्चमूलकः क्वाथः कणाचूर्णेन भावितः ॥ देयो वातकफे शूले ज्वरे श्वासे च पीनसे ॥ १०४ ॥ दशमूलके क्वाथमें पीपलका चूर्ण मिला पीवे यह वातकफज्वर, शूल, श्वास, पीनस, इनमें हित है ॥ १०४ ॥ अथ त्रिदोषजज्वरका निदान और चिकित्सा । तन्द्रालस्यं मुखमधुरता ष्ठीवनं कण्ठशोषो निद्रानाशः श्वसन- विकलो मूर्च्छना शोचना च॥जिह्वाजाड्यं परुषमथवा पृष्ठशी- र्षेव्यथा स्यादन्तर्दाहो भवति यदि वा विद्धि दोषं त्रिदोषम् १ ०५॥ तंद्रा और आलस्य आवे, मुखमें मधुरपना रहे और वारंवार थूके, कंठमें शोष उपजे, नींदका नाशहो, श्वाससे विकल होजावे, मूर्च्छा और सोच हो, जीभमें जडपनाहो अथवा करड़ी जीभ होजावे पृष्ठभागमें और शिरमें पीडा हो और शरीरके भीतर दाह हो ये सब लक्षण हों तब त्रिदोषजज्वर जानना ॥ १०५ ॥ त्रिदोषजज्वरकी यशःप्रापक चिकित्सा । दृष्ट्वा त्रिदोषजं घोरं स्वरं प्राणापहारकम्॥तस्मादादौ कफस्या- स्य शोषणं परिकीर्तितम् ॥१०६॥ न कुर्यात्पित्तशमनं यदी- च्छेदात्मनो यशः॥कफवातैर्बलवतः सद्यो हन्ति रुजातुरम् ॥ ॥ १०७ ॥ लङ्घनं वमनं वापि ष्ठीवनं स्यात्रिदोषजे ॥ त्रिरात्रं

[Header] अ० २] भाषाटीकासमेता । ( १९१ )


पंचरात्रं वा सप्तरात्रमथापि वा ॥ १०८ ॥ लंघनञ्च समुद्दिष्टं ज्ञात्वा दोषबलाबलम्॥कफं विशोषितं ज्ञात्वा ततो वातनिवा- रणम्॥१०९॥ पित्तसंशमनं कार्यं ज्ञात्वा पित्तस्य कोपनम्॥ शोषणीयौ वातकफौ न तु पित्तं विनाशयेत् ॥ ११० ॥ प्राणोंके हरनेवाला और घोररूप ऐसे त्रिदोषजज्वरको देखकर प्रथम कफको शोषनेकी उपाय कहा है ॥ १०६ ॥ जो वैद्य अपने यशकी इच्छा चाहे तो त्रिदोषजज्वरमें पित्तको शांत नहीं करै, क्योंकि कफ और वातकी अधिकतावाले त्रिदोषजज्वररोगीको ज्वर मारदेता है ॥१०७॥ त्रिदोषजज्वरमें लंघन, वमन, ष्ठीवन ये हित हैं और इस रोगमें तीनरात्रि,पांचरात्रि, सातरात्रितक ॥ १०८ ॥ दोषके बल और अबलको जान लंघन करना चाहिये,जब कफके शोषको जानले तब वातको निवारण करे ॥ १०९ ॥ पित्तके कोपको जानकर पित्तकी भी शांति करनी और वात तथा कफको जरूर शोषे और पित्तको कभी भी नहीं नष्ट करे ॥ ११० ॥

अथ सन्निपात ज्वरका लक्षण और चिकित्सा । सत्तृष्णा शूलशोषः श्वसनमथ निशाजागरो वासरस्तु तन्द्रा मोहश्च शोषो भवति च वदने घ्राणजिह्वाधराणाम् ॥ पाकं निष्ठीवते यः कृशतनुश्च भवेन्मण्डलानाञ्च देहे सम्भूतिः श्या- वनेत्राधरवदनमदस्वेद आध्मानशोषः ॥ १११ ॥ क्षुन्नाशो वा भ्रमात्तिर्भवति शिरसो लोडनं वा शिरोऽर्त्तिः स्रोतोरोधो वमिर्वा गलकघुरघुराशूलकैर्वा वृतस्तु ॥ एतैर्लिङ्गैर्युतानां प्रभवति च नृणां सन्निपातेतिसंज्ञा रोगाणामाशुकारी ज्वर अतिदुखदो वाजिनां वा द्विपानाम् ॥ ११२ ॥ अच्छी तृषा, शूल, शोष, श्वास, रात्रिका जागना,दिनमें तंद्रा,मोह,मुखमें शोष ये उपजें और नासिका, जीभ, ओष्ठ इनका पाक होवे और वारंवार थूके और कृशशरीर होजावे और शरी- रमें मंडलोंकी उत्पत्ति हो और कालेनेत्र हो जावें होंठ काले हो जावें, मद और पसीना उपजे, अफारा और शोष भी हो ॥ १११ ॥ भूख जाती रहे, शिर भ्रमे अथवा शिरको हिलावे और शिरमें पीड़ा हो, स्रोत रुक जावे अथवा छर्दि हो और गलेमें घुर्धुरशब्द और शूल उपजे ये सब लक्षण होवें तब मनुष्यके सन्निपातज्वर जानना, यह रोगोंको शीघ्र करता है, घोड़ोंको तथा हाथियोंको भी अतिदुःख देता है ॥ ११२ ॥

अथ सन्निपातज्वरकी चिकित्सा । सन्निपातज्वरे पूर्वं कुर्य्याद्वातकफापहम् ॥ पश्चाच्छ्लेष्मणि संक्षीणे

( १९२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- १निरामे पित्तमारुतौ ॥११३ ॥ सन्निपातज्वरे यत्नं कृत्वा तन्द्रां जयेत्पराम् ॥ उपद्रवः कष्टतमो ज्वराणां च विशेषतः ॥११४ ॥ पथ्यं कारयते यस्तु रोगिणं कफपूरितम् ॥ स एवास्य शत्रुः स्यान्न पथ्यं न च भेषजम् ॥ ११५ ॥ सन्निपातज्वरमें प्रथम वातकफको नाशनेवाली क्रियाको करे। जब कफका क्षय होजावे तब वात और पित्त आपही शांत होजाते हैं ॥ ११३ ॥ सन्निपातज्वरमें यत्नसे तंद्राको दूर करे यह सन्निपातमें अत्यन्त उपद्रव हैं और ज्वरोंके मध्यमें विशेष करके यह उपद्रव बुरा है ॥ ११४ ॥ सन्निपातज्वरमें जो वैद्य कफसे पूरितहुए रोगीको पथ्यदेवे वही वैद्य उसरोगीका वैरी जानना इसवास्ते पथ्यको और ऐसे वैसे औषधको भी नहीं देना ॥ ११५ ॥ अथ दशाङ्ग क्वाथ । शंटी द्विपञ्चमूलकं दुरालभा च कोटजम् ॥ पटोलं पौष्करं वाथ युक्ता भार्गवी पिप्पली ॥ ११६ ॥ निहन्ति सान्निपातिकज्वरा- ग्निमान्द्यं दशाङ्गः ॥ ११७ ॥ कचूर, दशमूल, जवासा, पिस्ते, परवल, पोहकरमूल, श्वेतदूब, पीपल, इन्होंका क्वाथ ॥ ११६॥ सन्निपातज्वर और मन्दाग्निका नाश करता है ॥ ११७ ॥ अथ भूनिम्बादि क्वाथ । भूनिम्बदारुदशमूलमहौषधाब्दतिक्तेन्द्रबीज धनिकाव्यकणाक- षायः ॥ तन्द्राप्रलापभ्रमतृड्रुचिदाहमोहश्वासाग्निमा- न्द्ययुतमाशुज्वरं निहन्ति ॥ ११८ ॥ चिरायता, देवदार, दशमूल, सोंठ, कुटकी, इन्द्रजव, धनियां, गोखरू, पीपल, इनका क्वाथ तंद्रा, प्रलाप, भ्रम, तृषा, अरुचि, दाह, मोह, श्वासहोग, मन्दाग्निज्वर इनको नाशताहै॥ ११८॥ अथ शुंठ्यादि क्वाथ । शुंठीघनागजकणासुरदारुधान्यातिक्ताकलिङ्गदशमूलसमोऽपि कल्कः ॥ श्रेष्ठस्त्रिदोषजनितज्वरनाशनाय श्वासभ्रमारुचिविब- न्धहृदामयघ्नः ॥ ११९ ॥ सोंठ, नागरमोथा, देवदारु, गजपीपल, धनियां, कुटकी, इंद्रयव, दशमूल, ये सब समान भाग ले कल्क बनावे यह त्रिदोषजज्वरको नाशता है और श्वासहोग, भ्रम, अरुचि, विबंध, हृद्रोग इनको नाशता है ॥ ११९ ॥ १ अत्र छन्दोभंग आर्षः ।

अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १९३ ) अथ मुस्तादि क्वाथ । मुस्तोशीरनिशाविशालमधुकं पाठा बला रोहिणी नीली धन्वयवासकङ्गरशटी शुण्ठी समङ्गा त्रिवृत् ॥ यष्टीपिप्पलिमू- लपर्पटफला पिप्पल्यकं दारु च श्यामाहेमगुडूचिकासमपयः क्वाथो ज्वरान्तः स्मृतः ॥ १२० ॥ नागरमोथा, खस, हलदी, सुन्दर मुलहटी, स्योनापाठा, खरैंटी, हरड़ै, नील जवासा, टेंभूर्नी, कचूर, सोंठ, मजीठ, निशोत अथवा मुलहटी, पीपलामूल, पित्तपापड़ा, पीपल, देवदार, काली निशोत, कचनार, गिलोय इनका समान पानीमें क्वाथ बनावे यह ज्वरको नाशता है॥१२०॥ अथ बृहत्यादि क्वाथ । द्वे बृहत्यौ शठी शृङ्गी किरातं कटुरोहिणी ॥ पटोलं पौष्करं भाङ्गीं वत्सकञ्च दुरालभा ॥ १२१ ॥ एतद्वृहत्यादिकपाचनं स्यात्कासादिकोपद्रवनाशनञ्च ॥ शीघ्रं निहन्ति ज्वरसन्निपातं शूलार्तितन्द्राशमने प्रशस्तम् ॥ १२२ ॥ दोनों कटेहली, कचूर, काकड़ासिंगी, चिरायता, कुटकी, परवल, पोहकरमूल, भारंगी, इन्द्रयव, जवासा इन्होंका क्वाथ बनावे ॥१२१॥ यह कटेहलीआदि पाचन है, खांसी आदि उपद्रवको और सन्निपातज्वरको शीघ्र नाशता है, शूल और तंद्राको शांत करनेमें अतिश्रेष्ठ है ॥ १२२ ॥ अथ शटचादि पाचन । शटी किरातं कटुका विशाला गुडूचिभृङ्गी बृहतीद्वयं च॥ महौ- षधं पौष्करधन्वयासरास्नासुराह्वा गजपिप्पली च ॥१२३॥ पीतं तु निष्क्वाथ्य हितं नराणां शट्यादिचातुर्दशकं प्रशस्तम्॥ जघान तन्द्राश्वसनं शिरोऽर्त्तिजाड्यं सशूलं ज्वरमाशु हन्ति १२४ कचूर, चिरायता, कुटकी, इंद्रायण, गिलोय, अतीस,: दोनों कटेली, सोंठ, पोहकरमूल, जवासा, रायसन, देवदारु, गजपीपल ॥ १२३ ॥ इनका क्वाथ बना पीवे, यह चौदह औष- धोंका क्वाथ हितकर है और तंद्रा, श्वास, शिरका रोग, जड़पना, शूल, ज्वर इनको शीघ्र नाशता है ॥ १२४ ॥ अथ भूनिम्बादि क्वाथ । भूनिम्बसुरदारुनागरघनातिक्ताकलिङ्गानि च तद्वद्धस्तिकणा १३

( १९४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने द्विपञ्चकगणैर्युक्तः क्वाथो हितः ॥ पीतः सर्वरुजां विनाशन- करः स्यात्सन्निपातज्वरं हन्ति श्वासविशोषवक्षसिरुजं तन्द्रां जघान द्रुतम् ॥१२५ ॥ चिरायता, देवदारु, सोंठ, नागरमोथा, कुटकी, इन्द्रयव, गजपीपल, दशमूल इन सात चीजोंके क्वाथ बना पीना । यह सब प्रकारके रोगोंको और सन्निपातज्वरको नाशता है और श्वासरोग, शोषरोग, छातीकी पीड़ा, तंद्रा इनको शीघ्र नाशता है ॥ १२५ ॥ अथ बृहद्रास्नादि क्वाथ । रास्त्रा गुडूचीघनपर्पटकं पटोली भूनिम्बवत्सकशटीयुतनागराणा- म् ॥ तिक्तासुराह्वगजमागधिकायवासावासाबलागजबलाक्वथितः समांशः॥ १२६॥ क्वाथो निहन्ति मरुतप्रभवामयानां सश्वास- कासजठरार्तिविषूचिकानाम्॥ श्रेष्ठो नृणां भुवि च पाचनसन्नि- पाते रोगेऽथवा कफसमीरणके प्रदेयः ॥ १२७ ॥ रायसन, गिलोय, नागरमोथा, पित्तपापड़ा, परंवल, चिरायता, इन्द्रयव, कचूर, सोंठ, कुटकी, देवदारु, गजपीपल, जवासा, वांसा, खरैहटी, बड़ी खरैहटी ये सब समानभाग ले क्वाथ बनावे ॥ १२६ ॥ यह क्वाथ वातसे उपजे रोग, श्वासरोग, खांसी, पेटरोग, विषूचिका, इनको नाशता है। यह पाचन मनुष्योंको संसारमें श्रेष्ठ है अथवा कफवातके रोगमें देना चाहिये ॥ १२७ ॥ अथ लघुरास्नादि । रास्त्रात्रिकण्टकघनाशतमोषधीनां भार्ङ्गी सपुष्करयुता सुर- दारुधान्याः ॥ क्वाथो हितः सकलमारुतजिज्ज्वरेषु स्यात्स- न्निपातप्रभवेष्वतिदारुणेषु ॥ १२८ ॥ रायसन, गोखरू, नागरमोथा, शतावरी, भारंगी, पोहकरमूल, देवदारु, धनियां इनका क्वाथ दारुण सन्निपातज्वरोंमें हित है और वायुसे उत्पन्न रोगोंको जीतता है ॥ १२८ ॥ अथ त्रिवृतादि मलभेदन । त्रिवृद्विशाला च तथा सुराह्वमारग्वधस्तिक्तकरोहिणी च ॥ क्वाथोभवेद्भेदनको मलानां स्याद्वातशूले नयतो भयघ्नः॥१२९॥ निसोध, इन्द्रायणकी जड़, देवदारु, अमलतास, कुटकी इनका क्वाथ मलको पतला करता है और वातशूलको करता है ॥ १२९ ॥

अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १९५ ) अथ सन्निपातस्वेदहर । वचा यवानी च महौषधञ्च शुष्कञ्च चूर्णं तनुलेपनाय ॥ शस्तं वदन्ति ज्वरघर्मशान्तिं करोति नूनं परिमर्द्दनञ्च ॥ १३० ॥ मागधी च सुरदारु तथा च विश्वकं तिक्ता च दीप्यकयुतं तनुलेपनाय ॥ चूर्णं प्रशस्तमपि वारयते शरीरे स्वेदञ्च शीतलतनुर्भवेदाशु नूनम् ॥ १३१ ॥ वच, अजमान, सोंठ इनका सूखा चूर्ण बना शरीरपै मालिस करे । यह ज्वरको और पसी- नाको शांत करता है ॥ १३० ॥ पीपल, देवदारु, सोंठ, कुटकी, अजमान इनका चूर्ण बना शरीरपै मालिस करनेसे पसीने दूर होते हैं और शरीर शीतल होजाता है ॥ १३१ ॥ अथ नस्यविधान । मधूकसारं समहौषधेन वचोषणा सैन्धवसंयुता च ॥ मूत्रेण वा चोष्णजलेन पिष्टं प्रनष्टज्ञानप्रतिबोधनाय ॥ १३२ ॥ शोभाञ्जनमूलस्य रसं समरिचान्वितम्॥विसंगितानां नस्यं स्याद्बोधनं चाशु रोगिणाम् ॥१३३ ॥ महुआका सार, सोंठ, बच, मिर्च, सैंधानमक इनको गोमूत्रमें अथवा गरमपानीमें पीस नाकमें चढावे, यह नस्य मूर्च्छाको प्राप्तहुएको जगाता है ॥ १३२ ॥ सहिंजनाकी जड़के रसमें मिरचोंका चूर्ण मिला नासिका में चढ़ानेसे संज्ञासे रहित मनुष्योंको शीघ्र ज्ञान होजाता है ॥ १३३ ॥ अथ प्रधमनविधि । एकं बृहत्याः फलपिप्पलीकं शुण्ठीयुतं चूर्णमिदं प्रशस्तम् ॥ प्रधामयेद्घ्राणपुटे तु संज्ञाचेष्टां करोति क्षवथुप्रबोधः॥ १३४॥ बडी कटेलीका एक फल, पीपल, सोंठ इनका चूर्ण बना पुटलीके द्वारा नासिका में चढानेसे छींक आती है और चेष्टा होजाती है ॥ १३४ ॥ अथ अंजनविधि । शिरीषबीजं मरिचोपकुल्यामूत्रेण घृष्टं सह सैन्धवेन ॥नेत्राञ्जनं स्यान्नयने नराणां प्रनष्टसंज्ञां प्रकरोति बोधः ॥ १३५ ॥ त्रिकटु तथा च करञ्जबीजं त्रिफला सुरदारु सैन्धवम्॥ तुलसी वर्तिर्नयनाञ्जनकं तन्द्रानाशं करोति नयनानाम् ॥ १३६ ॥

( १९६ ) हारीतसंहिता । [तृतीयस्थाने- शिरसके बीज, मिर्च, पीपल, सेंधानमक इनको गोमूत्रमें पीस नेत्रोंमें आंजे । यह अंजन नष्टहुई संज्ञाको फिर उपजाता है ॥ १३५ ॥ सोंठ, मिर्च, पीपल, करंजुवाके बीज, हरडैं, बहेड़ा, आँवला, देवदार, सेंधानमक, तुलसी, इनको पीस बत्ती बना नेत्रोंमें आंजे । यह आंजन तंद्राको नाशता है ॥ १३६ ॥ अथ निष्ठीवनविधि । केसरं मातुलुङ्गस्य शृङ्गवेरं ससैन्धवम् ॥ त्रिकटुसंयुक्तं कृत्वा आकण्ठाद्धारयेन्मुखे ॥ १३७ ॥ दन्तजिह्वामुखं तालुघर्षणं कारयेद्बुधः॥ कुर्य्यान्निष्ठीवनं सर्वं वारंवारं विधानतः॥१३८॥ तेन कण्ठविशुद्धिः स्याच्छ्लेष्माणं चापकर्षति॥जिह्वापटुत्वरु- चिक्कृत्कासः श्वासश्च शाम्यति ॥१३९॥ त्रिकटुचव्यकापथ्या- चूर्णं सैन्धवसंयुक्तम् । तेन दन्तांस्तथा जिह्वां घर्षयेत्तालुकाम- लम् ॥ १४० ॥ निष्ठीवनं गलशुद्धिरुचिकृत्कफसूदनम् ॥ हल्ल्लासो नाशमाप्नोति पटुत्वं कुरुते भृशम् ॥ १४१ ॥ बिजौराकी केसर, अदरख, सेंधानमक, सोंठ, मिरच, पीपल इनको मिला मुखमें धारे ॥ १३७ ॥ पीछे दंत, जीभ, मुख, तालु इन्होंको घिसे पीछे विधानसे बारंबार थूकता जावे ॥ १३८ ॥ इससे कंठकी शुद्धि होती है और कफ दूर होजाता है और जीभ साफ होजाती है और रुचि उपजती है, खांसी और श्वास शांत होजाता है ॥ १३९ ॥ सोंठ, मिरच, पीपल, चव्य, हरडै, सेंधानमक इन्होंके चूर्णसे दंत, जीभ, तालु, इन्होंको घिसे ॥ १४० ॥ यह निष्ठीवनकर्म गलकी शुद्धि और रुचिको करता है, कफको दूर करता है, थुकथुकीको नाशता है और अत्यन्त स्वादको उपजाता है ॥ १४१ ॥ अथ सन्निपातमें विशेषता । यदि वा शीतगात्रे च तदा स्वेदो विधीयते ॥ स्वेदास्त्रयोदश ज्ञेयाः स्वेदवारणकारणाः ॥ १४२ ॥ सङ्करःप्रस्तुतो नाडीप- रिषेकोऽपगाहनः ॥ आतङ्कोऽस्मयनः कर्षः कूटी भूकुम्भिरेव च ॥१४३॥कूपो होलाक इत्येते स्वेदयन्ति त्रयोदश ॥१४४॥ कालस्वेदं घटीस्वेदं वालुकास्वेदमेव च॥ कारयेद्धस्तपादाभ्यां १ स्विद्यतेऽनेनेति स्वेदोऽग्निस्तस्य वारणे कारणाः ।

अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १९७ ) तथा शिरसि चातुरे॥ एवं नो शान्तिर्यदि वा दहेल्लोहशलाक- या ॥१४५॥ पादौ दग्धे न चेच्छैत्यं दहेद्वाऽङ्गुष्ठमूलके ॥ तथा च मणिबन्धे च हृदि मूर्ध्नि तथापि वा ॥१४६॥ स्वेदो ललाटे सुहिमो नरस्य शीतार्दितस्यापि सपिच्छलस्य ॥ कण्ठस्थितो यस्य न याति वक्षो नूनं समभ्येति गृहं हि मृत्योः ॥१४७॥ सप्ताहे वा दशाहे वा द्वादशाहेऽथवा पुनः ॥ त्रयोदशे पञ्चदशे प्रशमं याति हन्ति वा ॥ १४८ ॥ अथ पञ्चादशाहे वा हन्ति रक्षति मानवम् ॥ सन्निपातो महाघोरो ज्वरः कालाग्निसन्निभः ॥१४९॥ एषा त्रिदोषमर्यादा मोक्षाय च वधाय च॥सन्नि- पातस्य दोषस्य नरस्यास्य भिषग्वर॥ १५०॥सन्निपातेऽन्तर्दाहे मनुजं यः शीतवारिणा सिञ्चेत्॥ आतुरः कथमपि जीवेद्वैद्य- श्चासौ कथं पूज्यः॥१५१॥यःसन्निपातजलधौ पतितं मनुष्यं वैद्यः समुद्धरति किन्न कृतं नु तेन ॥ धर्मेण वाथ यशसा विनयेनयुक्तः पूजां च कां भुवितले न लभेत वैद्यः ॥१५२॥ जो शीतल शरीर हो तब पसीना देना चाहिये, अग्नि दूर करनेके कारणरूपी स्वेद अर्थात् पसीने तेरह जानने ॥ १४२ ॥ संकर, नाड़ीपारिषेक, अवगाहन, आर्तक, अस्मयन, कर्ष, कूटी, भूकुंभि ॥ १४३ ॥ कूप होलाका, कालस्वेद, घटीस्वेद, वालुकास्वेद ये तरह प्रकारके स्वेद मनुष्यके पसीनाको लाते हैं ॥ १४४ ॥ इनसे रोगीके हाथ, पैर, शिर इन्होंपै पसीनाको देवे । जो ऐसे शांति नहीं हो तब लोहाकी सलाईसे दाग देवे ॥ १४५ ॥ जो पैरपै दाग दियेसे भी शीतलता नहीं उपजे तब अँगूठाके मूलमें दग्ध करे अथवा मणिबन्ध अर्थात् पहुँचा, हृदय, मस्तक, इन्होंमें दग्ध करे ॥ १४६ ॥ जिसके मस्तकपै ठण्डा पसीना आवे और सब शरीर शीतल होवे, शीतसे पीड़ित और कफकी अधिकतावाला ऐसे मनुष्यके कण्ठ- तक पसीना आवे, छातीमें नहीं प्राप्त होवे वह मनुष्य निश्चय मृत्युको प्राप्त होता है ॥ १४७॥ सातमा अथवा दशमां अथवा बारमां,तेरमां पन्दरमां इन दिनोंमें सन्निपात ज्वर शांत हो जाता है अथवा रोगीको मार देता है॥ १४८ ॥ और पन्द्रहवें दिन निश्चय सन्निपातज्वर शांत होता है अथवा रोगीको मारता है । यह सन्निपातज्वर महाघोररूप है, काल और अग्निके समान कांतिवाला हैं ॥ १४९ ॥ सन्निपातकी शांत होनेकी अथवा मारनेकी यह मर्यादा है ॥ १५० ॥ सन्निपातमें जो शरीरमें दाह उपजे तब वैद्य शीतलपानीके छिड़के दिवाता है तब रोगी नहीं

( १९८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- जीवता और वह वैद्य पूजाको प्राप्त नहीं हो सकता ॥ १५१ ॥ सन्निपातरूपी समुद्रमें पड़े हुए रोगी मनुष्यको जो वैद्य उद्धार करता है उस मनुष्यने क्या नहीं किया और धर्म, यश, तथा विनय करके युक्त वह वैद्य इस भूतलमें कौनसी पूजाको नहीं पाता है ? अर्थात् सर्वत्र य होता है ॥ १५२ ॥ अथ कर्णमूल ( शोज़ा ) का निदान और चिकित्सा । वातपित्तकफैस्त्रिभिर्युक्तस्तथा त्रिदोषजः॥ स च रक्तेन संयुक्तो ज्वरः स्यात्सान्निपातिकः ॥१५३॥ न रक्तेन विना विद्धि ज्वरं वै सान्निपातिकम्॥क्वाथैः पाचनकैर्दोषः प्रशमं यान्ति मानवे ॥ १५४ ॥ तस्मात्प्रशमिते दोषे रक्तं नैव विलीयते ॥ तेनैव जायते शोफः कर्णमूले तु दारुणः ॥१५५॥ तस्मात्तस्य प्रती- कारं कुर्य्याद्रक्तविरेचनम् ॥ जलौकालावुशृङ्गैस्तु ततश्च लेपनं हितम् ॥ १५६ ॥ वातं, पित्त, कफ इन तीनोंसे युक्त त्रिदोषज्वर होता है और रक्तसे संयुक्त हुआ यही ज्वर सन्निपात कहाता है ॥ १५३ ॥ रक्तके विना सन्निपात ज्वरको नहीं जानना । क्वाथ और पाचनसंज्ञक क्वाथोंसे मनुष्यके तीनों दोष शान्त हो जाते हैं ॥ १५४ ॥ इस कारणसे दोष शान्त भी हो जाते हैं परन्तु रक्त नहीं शान्त होता उसकरके कानके जड़में भयंकर शोजा उप- जता है ॥ १५५ ॥ इससे उसकी चिकित्सा रक्तका निकालना है जोंक, तुंबी, शींगी, इनसे रक्तको निकासे पीछे लेप कराना ॥ १५६ ॥ अथ कर्णशोथके ऊपर लेप । बीजपूरकमूलानि अग्निमन्थस्तथैव च ॥ आलेपनमिदं चास्य कर्णमूलस्य नाशनम् ॥ १५७ ॥ बिजौराकी जड़, अरनी इनको पानीमें पीस लेप करना, यह लेप कर्णमूलको नाशता है ॥ अथ दूसरा लेप । आगारधूपरजनीसुमहौषधेन सिद्धार्थसैन्धववचापयसा विमर्द्य॥ लेपोहितो२रक्तविनाशकारी शोफव्रणस्य शमनो मनुजस्य कर्णे ॥ घरका धुआं ( श्रीवेष्टधूप ) हल्दी, सोंठ, सरसों, सेंधानमक, वच, इनको दूधसे १ "सन्निपातज्वरस्यान्ते कर्णमूले सुदारुणः। शोथःसञ्जायते तेन कश्चिदेव प्रमुच्यते" । इति माधवः । २ आस्मिँश्चरणे छन्दोभंगः ।

अ० २ ] भाषाटीकासमेता । (१९९) पीस कर्णमूलपर लेप करना । यह लेप रक्तके विकारको नाशता है, शोजा और वावको शान्त करता है ॥ १६८ ॥ अथ व्रणरोपण औषध । यदा पाको भवेत्तस्य कार्या तत्र प्रतिक्रिया॥ धवार्जुनकदम्ब- त्वग्लेपनं व्रणरोहणम्॥ १६९॥ निम्बारग्वधमूलानां निशायुक्तं प्रलेपनम्॥स्रावणं पूयगन्धानां रोहणं स्याद्व्रणेषु च ॥ १६०॥ जो कानकी जड़में शोजा पक जावे वहां जो क्रिया करनी चाहिये वहकही जाती है, धवकी छाल, अर्जुनवृक्षकी छाल, कदंबकी छाल इनको पीस लेप करनेसे घावपै अंकुर आ जाता है ॥ १६९ ॥ नींवकी छाल, अमलतासकी छाल, हल्दी इनका लेप राध और दुर्गंधको हटाता है और घावोंपर अंकुरको लाता है ॥ १६० ॥ अथ कर्णशोथवालेको पथ्य । वर्जयेच्च दिवास्वप्नं योषित्सङ्गं बहुदकम्॥ शीतांबु जागृतिं रात्रौ व्यायामं शोचनं तथा॥ १६१॥ माषांश्च यवगोधूमतिलपर्णीकमेव च ॥ मसूरत्रिपुटांश्चैतांस्तैलञ्च दूरतस्त्यजेत् ॥ १६२॥ मास- मेकं व्यवायं च पक्षैकं चातिभोजनम्॥ वर्जयेत्कर्णमूलञ्च सुखं तेनोपपद्यते ॥ १६३॥ षष्टिकात्रं पुराणं वा बाल्यं सूपस्तथा- ढकी ॥ कुलत्थमुद्गयूषं वा भोजने च प्रशस्यते ॥ १६४ ॥ वार्त्ताकञ्च पलाण्डु च कन्दशाकान्परित्यजेत् ॥ एतेन सुखमा- प्नोति शीघ्रं रोगाद्विमुच्यते ॥ १६५ ॥ इस कर्णमूलमें दिनका सोना, स्त्रीसंग, पानीका बहुत पीना, शीतल पानी, रात्रिका जागना, कसरत, सोच ॥ १६१ ॥ उड़द, यव, गेहूं, तिलका पदार्थ, मसूर, त्रिपुँटा, तेल इनको दूरसे बर्जे ॥ १६२ ॥ और एक महीनातक मैथुनको और पंद्रह दिनोंतक अत्यन्त भोजनको वर्जेतब सुख होता है ॥ १६३ ॥ साठीचावल, पुरानाअन्न, अरहरकी दाल, कुलथी और मूंगौंकायूष ये सब भोजनमें श्रेष्ठ हैं ॥ १६४ ॥ वार्त्ताकु (बैंगन), प्याज, कंदशाक इनको त्यागे ऐसे कर- नेसे सुखको प्राप्त होता है और शीघ्र रोगसे छूटता है ॥ १६५ ॥ १ मल्लिका, सूक्ष्मैला, त्रिवृत, कर्णस्फोटा, स्थूलैला, कलायू, चमेली, छोटी इलायची, निशोथ, तिरबी कनफोडी, बडी इलायची, खेसारी, मटर । आयुर्वेदशब्दार्णव ।