हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 222, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( १९० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ क्षुद्रादिपाचन । क्षुद्रा गुडूची सह नागरेण वासाजलं पर्पटकञ्च पथ्याः॥मुस्ता च दुःस्पर्शयुतः कषायः पीतो हितो वातकफज्वरस्य॥१०२॥ कटैली, गिलोय, सोंठ, वांसा, नेत्रवाला, पित्तपापड़ा, हरड़े, नागरमोथा, जवासा इनका काथ वातकफज्वरको नाशता है ॥ १०२ ॥ अथ पर्पटादि क्वाथ । पर्पटनागाख्यवचातन्तुककट्फलैलाभयाविश्वभूतिका ॥ क्वाथो हिङ्गुमधुयुतः कफवाते सहिक्कारोगे सगलग्रहे च ॥ १०३ ॥ पित्तपापड़ा, नागकेशर, वच, रोहिषतृण, कायफल, इलायची, हरड, सोंठ, करंजुवा, इनके क्वाथमें हींग और शहद मिला पीवे यह कफवातज्वर, हिचकी रोग, गलग्रह इनमें हित है॥१०३॥ अथ दशमूल क्वाथ । द्विपञ्चमूलकः क्वाथः कणाचूर्णेन भावितः ॥ देयो वातकफे शूले ज्वरे श्वासे च पीनसे ॥ १०४ ॥ दशमूलके क्वाथमें पीपलका चूर्ण मिला पीवे यह वातकफज्वर, शूल, श्वास, पीनस, इनमें हित है ॥ १०४ ॥ अथ त्रिदोषजज्वरका निदान और चिकित्सा । तन्द्रालस्यं मुखमधुरता ष्ठीवनं कण्ठशोषो निद्रानाशः श्वसन- विकलो मूर्च्छना शोचना च॥जिह्वाजाड्यं परुषमथवा पृष्ठशी- र्षेव्यथा स्यादन्तर्दाहो भवति यदि वा विद्धि दोषं त्रिदोषम् १ ०५॥ तंद्रा और आलस्य आवे, मुखमें मधुरपना रहे और वारंवार थूके, कंठमें शोष उपजे, नींदका नाशहो, श्वाससे विकल होजावे, मूर्च्छा और सोच हो, जीभमें जडपनाहो अथवा करड़ी जीभ होजावे पृष्ठभागमें और शिरमें पीडा हो और शरीरके भीतर दाह हो ये सब लक्षण हों तब त्रिदोषजज्वर जानना ॥ १०५ ॥ त्रिदोषजज्वरकी यशःप्रापक चिकित्सा । दृष्ट्वा त्रिदोषजं घोरं स्वरं प्राणापहारकम्॥तस्मादादौ कफस्या- स्य शोषणं परिकीर्तितम् ॥१०६॥ न कुर्यात्पित्तशमनं यदी- च्छेदात्मनो यशः॥कफवातैर्बलवतः सद्यो हन्ति रुजातुरम् ॥ ॥ १०७ ॥ लङ्घनं वमनं वापि ष्ठीवनं स्यात्रिदोषजे ॥ त्रिरात्रं